By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 07, 2026
(विजय जोशी) फॉरसाइथ काउंटी (अमेरिका), सात नवंबर लगभग दो सदी पहले, ज़मीन और सोने (गोल्ड) के लालच में गोरे यूरोपीय प्रवासियों ने उत्तरी जॉर्जिया में मूल निवासी अमेरिकी इंडियन्स को उनकी पुश्तैनी ज़मीन से खदेड़ दिया और उस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। अब, तेलुगू, हिंदी और तमिल बोलने वाले दूसरी तरह के भारतीय हज़ारों की संख्या में आकर उस ज़मीन पर बस रहे हैं। वे लाखों डॉलर के आलीशान घर खरीद रहे हैं और उत्तरी जॉर्जिया की हरी-भरी ढलानी पहाड़ियों के बीच पूरे फ़ॉरसाइथ काउंटी में ‘लघु भारत’ बना रहे हैं।
हालांकि, यह बात स्थानीय लोगों को हमेशा रास नहीं आती है। सामुदायिक नेताओं का कहना है कि भारतीय लोग सामाजिक रूप से श्वेत अमेरिकियों के साथ बहुत कम मेल-जोल रखते हैं और उनकी एक तरह से खुद को अलग-थलग रखने की आदत होती है। उनका कहना है कि इससे स्थानीय लोगों में नाराज़गी पैदा होती है और प्रवासी-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा मिलता है, जो हाल के वर्षों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘मागा’ आंदोलन के बढ़ने के साथ और तेज़ हुई हैं।
भारतीय सबसे पहले 1960 के दशक में शिक्षाविदों या छात्रों के रूप में स्थानीय एमोरी यूनिवर्सिटी और जॉर्जिया टेक में आए थे। लेकिन तब उनकी संख्या बहुत कम थी। आधिकारिक जनगणना के अनुसार, 1990 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका में प्रवासियों की आमद बढ़ने के बाद भी, साल 2000 में फ़ॉरसाइथ काउंटी में केवल 160 भारतीय थे।
आज यह संख्या बढ़कर लगभग 52,000 हो गई है, जिसने फ़ॉरसाइथ काउंटी के पूरे चरित्र को पूरी तरह से बदल दिया है। भारतीय अब काउंटी की आबादी का 16 प्रतिशत हिस्सा हैं, जो श्वेत निवासियों (63.5 प्रतिशत) के बाद दूसरा सबसे बड़ा जातीय समूह है। अमेरिका में एक ‘काउंटी’ मोटे तौर पर भारत के एक ज़िले के बराबर होती है, जिसमें कई शहर और कस्बे शामिल होते हैं, लेकिन इसका प्रशासन निर्वाचित अधिकारियों द्वारा चलाया जाता है।
‘यूएसए इंडिया बिजनेस समिट’ के कार्यक्रम अध्यक्ष एनी अग्निहोत्री ने कहा कि जॉर्जिया आने वाले नए भारतीय प्रवासियों के लिए फ़ॉरसाइथ पहली पसंद है, क्योंकि यहां एक सुस्थापित सहायता तंत्र मौजूद है: जैसे भारतीय दुकानें, मंदिर और अच्छे स्कूल। उन्होंने रेखांकित किया कि यहां भारतीयों की औसत वार्षिक आय लगभग 1,50,000 अमेरिकी डॉलर है, जो आम अमेरिकियों की औसत आय से काफी अधिक है, और यही बात स्थानीय लोगों की नाराज़गी का एक और कारण बन जाती है। साल 1991 में एमबीए छात्र के रूप में जॉर्जिया आए अग्निहोत्री ने कहा, ‘‘भारतीय क्या चाहते हैं?
हम इन पांच लक्ष्यों के साथ अमेरिका आते हैं: हम बड़े घर खरीदना चाहते हैं, बड़ी कार चाहते हैं, अच्छा पैसा कमाना चाहते हैं, मंदिरों में जाना चाहते हैं, और अपने बच्चों को आइवी लीग कॉलेजों में भेजना चाहते हैं।’’ आइवी लीग अमेरिका के आठ सबसे पुराने, सबसे प्रतिष्ठित और दुनिया के बेहतरीन निजी विश्वविद्यालयों का एक समूह है। समृद्ध समुदायों का केंद्र बना फ़ॉरसाइथ कभी एक ग्रामीण और पिछड़ा इलाका हुआ करता था, जो नस्लवाद के एक काले इतिहास से कलंकित था। यह नस्लवाद पहले 1830 के दशक में चेरोकी आदिवासियों के खिलाफ था और बाद में उन अश्वेतों के खिलाफ जो हाल ही में गुलामी से आज़ाद हुए थे।
हाल ही में फ़ॉरसाइथ काउंटी के मुख्य शहर कमिंग में रहने आए जॉर्जिया के पुराने निवासी वेणु चल्ला ने कहा, ‘‘बहुत कम भारतीय इस विडंबना से वाकिफ हैं कि वे एक ऐसी मिट्टी पर बस रहे हैं जो दो सदियों तक नस्ली हिंसा के खून से सनी रही है।’’ चल्ला 56 विशाल और आलीशान पांच-बेडरूम वाले घरों की एक नव-निर्मित सोसायटी में रहते हैं, जिनमें से प्रत्येक घर की कीमत लगभग 15 लाख डॉलर है। इनमें से 45 घरों के मालिक और निवासी भारतीय हैं। एक घर में एक श्वेत अमेरिकी परिवार रहता है, एक में एक अफ्रीकी अमेरिकी परिवार और बाकी घरों में पूर्वी एशियाई लोग रहते हैं।
यह सोसायटी सुवेनी कस्बे के एक बाजार से कुछ ही दूरी पर है, जहां हाल ही में शनिवार की एक शाम ‘सुविधा’ सुपरमार्केट के गलियारों में धीमी आवाज़ में बातचीत गूंज रही थी, जिसमें ज़्यादातर बातें तेलुगु में और कुछ हिंदी में सुनाई दे रही थीं। लोग अपनी शॉपिंग ट्रॉलियों में डोसा और इडली के बैटर (घोल) के डिब्बे, दही के कैन और आटे के थैले भर रहे थे। दीवाली पास होने के कारण डोडा बर्फी, चमचम और हैदराबादी मीठी बालूशाही भारी मात्रा में सजाकर रखी गई थी।
ठीक बगल में स्थित ‘फ्रेश रोटी’ दुकान-जो ‘चाइनीज ढाबा’ और ‘सारा सैलून’ के बीच में है-वहां कई तरह की चपातियां बिक रही थीं। मार्केट के अंत में लगे इलेक्ट्रॉनिक बिलबोर्ड पर राहुल क्लोदिंग, दृष्टि फ्लॉवर्स, स्पोर्ट्स अड्डा जैसी दुकानों के साथ मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स के विज्ञापन चमक रहे थे। अग्निहोत्री ने बताया कि अकेले ग्रेटर अटलांटा क्षेत्र में ही 100 हिंदू मंदिर हैं, जिसमें विशाल बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर भी शामिल है।
इसका उद्घाटन 2007 में हाथियों के साथ एक भव्य नगर यात्रा निकालकर किया गया था, जो इस इलाके में पहले कभी नहीं देखी गई थी। यहां हर साल गणेश चतुर्थी पर किराए के हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा की जाती है। इस क्षेत्र में अमीर भारतीयों की मौजूदगी से स्थानीय अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से फायदा हुआ है, लेकिन अग्निहोत्री का कहना है कि भारतीयों को स्थानीय लोगों के साथ घुलने-मिलने और समाज में अधिक योगदान देने का प्रयास करना चाहिए।
चल्ला का मानना है कि घुलने-मिलने की यह कमी सभी देशों के पहली पीढ़ी के प्रवासियों में आम बात होती है। आमतौर पर, दूसरी पीढ़ी समाज में बेहतर तरीके से घुल-मिल जाती है। उन्होंने कहा कि जो चीज़ भारतीय अमेरिकियों को अलग बनाती है, वह यह है कि उनके क्षेत्रीय, भाषाई, पहनावे और जातिगत विभाजन एक गैर-यूरोपीय संदर्भ से आते हैं, जिससे आम अमेरिकी कम परिचित हैं।
भारतीय अमेरिकियों की दूसरी पीढ़ी इस पुराने ढर्रे को लेकर नहीं चलती। उदाहरण के लिए सुचिता पटेल को लीजिए, जो दूसरी पीढ़ी की भारतीय अमेरिकी हैं और जिन्होंने हाल के चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर फ़ॉरसाइथ काउंटी कमीशन की सीट के लिए चुनाव लड़ा था। वह हार गईं, लेकिन बहुत कम अंतर से, जो यह दिखाता है कि भारतीयों को अब केवल भारतीय बस्तियों में रहने वाले आईटी क्षेत्र के पढ़ाकू लोगों के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिकियों के रूप में देखा जा रहा है।
इसी तरह, कई अन्य दूसरी पीढ़ी के भारतीय अमेरिकियों ने भी तीन नवंबर के मध्यावधि चुनावों में अपनी छाप छोड़ी। सार्वजनिक सेवा में पटेल की यह भागीदारी 1987 तक अकल्पनीय होती, जब फ़ॉरसाइथ पूरी तरह से गोरे लोगों का और घोर नस्लवादी इलाका था। उस साल जनवरी में, अटलांटा के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जो फ़ॉरसाइथ में एक शांति मार्च निकालना चाहते थे, उन्हें श्वेत निवासियों द्वारा हिंसक रूप से रोक दिया गया और खदेड़ दिया गया।
पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने कमिंग शहर के बाहरी इलाके में ‘गो होम, निगर्स’ (अश्वेतों के लिए अपमानजनक शब्द) के नारों और ‘फ़ॉरसाइथ स्टेस व्हाइट’ (फ़ॉरसाइथ सिर्फ गोरों का रहेगा) के पोस्टरों के साथ शांति मार्च करने वालों की बस का रास्ता रोक दिया था। साल 1912 में कमिंग में 18 वर्षीय श्वेत लड़की, मे क्रो से दुष्कर्म और उसकी हत्या के बाद फ़ॉरसाइथ पूरी तरह से केवल गोरों का इलाका बन गया था। बदले की कार्रवाई में, एक अश्वेत व्यक्ति रॉब एडवर्ड्स को भीड़ ने काउंटी जेल से बाहर खींच लिया, उसे गोली मार दी, उसका सिर कुचल दिया और उसकी हत्या कर दी।
जब उसका बेजान शरीर एक टेलीग्राफ के खंभे से लटक रहा था, तो लोग पिस्तौल और बन्दूक लेकर बारी-बारी से उसकी लाश को और क्षत-विक्षत करते रहे। बाद में, एकतरफा मुकदमे के बाद दो अन्य अश्वेत पुरुषों को भी फांसी दे दी गई। पैट्रिक फिलिप्स ने फ़ॉरसाइथ में नस्लवाद पर लिखी अपनी 2016 की किताब ‘ब्लड एट द रूट्स’ में लिखा है, ‘‘1912 के जॉर्जिया में किसी अश्वेत व्यक्ति की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या करना कोई असामान्य बात नहीं थी, और अगली सुबह कोर्टहाउस के लॉन में पड़ी एडवर्ड्स की लाश ने प्रतिशोध के भूखे लोगों को संतुष्ट कर दिया था।’’ इसके बाद, श्वेत वर्चस्ववादियों द्वारा इलाके के सभी अश्वेतों को वहां से खदेड़ दिया गया और यह दशकों तक पूरी तरह से श्वेत लोगों का समुदाय बना रहा, यहां तक कि जॉर्जिया 1915 में 45 साल के अंतराल के बाद पुनर्जीवित ‘कु क्लक्स क्लान’ का जन्मस्थान भी बना।
ब्रिटेन के श्वेत उपनिवेशवादी 1733 में जॉर्जिया आए थे, जहां चेरोकी इंडियन्स सदियों से रह रहे थे। 1800 के दशक की शुरुआत तक, बढ़ते श्वेत प्रवासियों ने चेरोकी आदिवासियों को आज के फ़ॉरसाइथ वाले जॉर्जिया के एक छोटे से हिस्से में सिमटने पर मजबूर कर दिया। साल 1828 में सोने की खोज के बाद, श्वेत लोगों ने चेरोकी इंडियन्स को धमकियों, ज़बरदस्ती और कानूनी चालबाज़ियों के ज़रिए सामूहिक रूप से आज के ओक्लाहोमा में स्थित आरक्षित क्षेत्रों में खदेड़ दिया।
इतिहास में उनके इस जबरन विस्थापन को ‘ट्रेयल ऑफ टियर्स’ के रूप में जाना जाता है। आज, फ़ॉरसाइथ में प्रत्यक्ष नस्लवाद की बातें लगभग न के बराबर हैं, और शायद ही किसी भारतीय को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। चल्ला कहते हैं, ‘‘लेकिन भारतीयों के लिए उस ज़मीन के अतीत को जानना बहुत ज़रूरी है जहाँ आप एक नया जीवन शुरू करना चाहते हैं।
यह आपको एक सही समझ (कॉन्टेक्स्ट) देता है और आपको ढलने तथा अपने व्यवहार को सुधारने में मदद करता है।’’