नरवणे की नेपाल यात्रा दोनों देशों के संबंधों की सुधार की दिशा में मील का पत्थर

By नीरज कुमार दुबे | Nov 07, 2020

भारतीय सेना के अध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे का नेपाल दौरा और वहां प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से उनकी बातचीत कई मायनों में महत्वपूर्ण रही। एक तो जबसे दोनों देशों के बीच सीमा विवाद शुरू हुआ है, तब से यह सबसे बड़े स्तर की वार्ता है दूसरा सेनाध्यक्ष से मुलाकात के ठीक बाद जिस तरह नेपाल के उग्र स्वर बदले हैं वह एक बड़ी कामयाबी है। सेनाध्यक्ष नरवणे से मुलाकात के दौरान ओली ने इस बात पर जोर दिया है कि दोनों देशों के बीच अच्छी दोस्ती है और किसी भी समस्या को बातचीत से सुलझाया जा सकता है। अब नेपाल के सुर क्यों बदले हैं और क्यों वह अपने बड़े भाई और सबसे पुराने सहयोगी देश भारत के पास लौटा है इसके कारणों पर चर्चा करेंगे और आपको इस लेख में आगे बताएंगे कि कैसे भारत ने बेहद ही सधे हुए तरीके से नेपाल को अपने चंगुल में फँसाने की चीनी साजिश को नाकाम कर दिया है।

नरवणे का सम्मान

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने भारतीय थल सेना के प्रमुख जनरल एमएम नरवणे को एक विशेष समारोह में नेपाली सेना के जनरल की मानद उपाधि प्रदान की। यह दशकों पुरानी परंपरा है जो दोनों सेनाओं के बीच के मजबूत संबंधों को परिलक्षित करती है। इस परंपरा की शुरूआत 1950 में हुयी थी। जनरल केएम करियप्पा पहले भारतीय थलसेना प्रमुख थे, जिन्हें 1950 में इस उपाधि से सम्मानित किया गया था। पिछले साल जनवरी में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नयी दिल्ली में नेपाली थल सेना के प्रमुख जनरल पूर्ण चंद्र थापा को भारतीय सेना के मानद जनरल की उपाधि दी थी।

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भारत-नेपाल सेना के बीच समन्वय बढ़ा

जनरल नरवणे ने नेपाली सेनाध्यक्ष जनरल थापा से उनके कार्यालय में मुलाकात कर काफी विस्तार से चर्चा की। नेपाल के थलसेना मुख्यालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, "उन्होंने द्विपक्षीय हितों के मुद्दों के अलावा दोनों सेनाओं के बीच मित्रता और सहयोग के मौजूदा बंधन को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की।" नरवणे सेना मुख्यालय में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए और ‘आर्मी पैविलियन’ में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बाद उन्हें सेना मुख्यालय में ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया। उन्होंने पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए सेना मुख्यालय में एक पेड़ भी लगाया। अपने नेपाल दौरे के दौरान जनरल नरवणे ने काठमांडू के बाहरी इलाके शिवपुरी में सैन्य कमान एवं स्टाफ कॉलेज में मध्यम स्तर के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित भी किया। उन्होंने इस दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों के साथ अपने अनुभव साझा किया। 

विवाद से समाधान तक

जनरल नरवणे की इस यात्रा का उद्देश्य भारत और नेपाल के बीच संबंधों में नए सिरे से सामंजस्य स्थापित करना भी है। नेपाल ने इस वर्ष की शुरुआत में एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था और उत्तराखंड के कई क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताया था जिसके बाद दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों में तनाव आ गया था। तब से दोनों देशों के बीच भारत की ओर से यह काठमांडू की पहली उच्चस्तरीय यात्रा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा आठ मई को उत्तराखंड के धारचूला को लिपुलेख दर्रे से जोड़ने वाली 80 किलोमीटर लंबी रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किए जाने के बाद नेपाल ने विरोध जताया था। नेपाल ने दावा किया था कि यह सड़क उसके क्षेत्र से होकर गुजरती है। कुछ दिनों बाद, उसने लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को अपने क्षेत्र के तौर पर दिखाते हुए नया नक्शा जारी किया था। भारत ने भी नवंबर 2019 में एक नया नक्शा प्रकाशित किया था जिसमें इन क्षेत्रों को भारत के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था। नेपाल द्वारा नक्शा जारी किए जाने के बाद भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, इसे ‘‘एकतरफा कृत्य’’ बताया था और काठमांडू को आगाह करते हुए कहा था कि क्षेत्रीय दावों का ऐसा ‘‘कृत्रिम विस्तार’’ उसे स्वीकार्य नहीं होगा। भारत ने कहा था कि नेपाल का यह कदम दोनों देशों के बीच बातचीत के माध्यम से सीमा मुद्दों को हल करने के लिए बनी सहमति का उल्लंघन करता है।

नेपाल को समझाने के प्रयास रंग लाये

भारत के साथ विवाद खड़ा करके नेपाल बार-बार बेतुके बयान देता रहा लेकिन भारत ने सार्वजनिक रूप से ज्यादा सख्ती नहीं दिखाई और नेपाल में चल रहे सहयोग कार्यों को विवाद के बावजूद जारी रखा। नेपाल की सरकार भले भारत विरोध का झंडा बुलंद कर चुकी थी लेकिन नेपाल की जनता भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहती है क्योंकि दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है। नेपाल की सरकार चीनी चाल में उलझती रही और वहां की जनता अपनी सरकार को चेताती रही, यही नहीं भारत के साथ संबंधों को बिगाड़ने को लेकर सत्तारुढ़ पार्टी में भी प्रधानमंत्री के खिलाफ बगावत शुरू हो गयी। लेकिन भारत की ओर से नेपाल को समझाने के राजनयिक प्रयास जारी रहे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कुछ समय पहले रॉ प्रमुख ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे में उन्होंने प्रधानमंत्री ओली के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बात की, साथ ही पूर्व प्रधानमंत्रियों पुष्प कमल दहल प्रचंड, माधव कुमार नेपाल और शेर बहादुर देउबा से भी मुलाकात की। इस बैठक पर नेपाल के कुछ नेताओं ने सवाल भी उठाया कि विदेश मंत्रालय की जानकारी में लाए बगैर यह बैठक अपारदर्शी तरीके से हुई। इन बैठकों में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, यह स्पष्ट नहीं है। इसके ठीक बाद भारतीय सेना प्रमुख को नेपाल के साथ संबंधों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए काठमांडू भेजने के भारत के फैसले को चीन द्वारा क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों के मद्देनजर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत इन दिनों म्यांमार, मालदीव, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए काफी व्यापक प्रयास कर रहा है।

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चीन को कैसे आयी अक्ल

अब आपको यह भी बताते हैं कि कैसे चीन की चालबाजी को नेपाल पहचान कर अपने भाई भारत के पास लौट चुका है। दरअसल ब्रिटेन के एक प्रमुख अखबार ने दावा किया है कि चीन ने नेपाल के क्षेत्र में 150 हेक्टेयर से अधिक जमीन हड़प ली है, जिस पर चीन के विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह पूरी तरह बेबुनियाद अफवाह है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन की प्रतिक्रिया द टेलीग्राफ अखबार की खबर पर आई है जिसने नेपाल के राजनेताओं के हवाले से खबर प्रकाशित की थी कि चीन ने सीमा के पास पांच क्षेत्रों में 150 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर कब्जा कर लिया है और उसने पूर्ववर्ती डूब क्षेत्र पर दावे के लिए एक नदी के बहाव की दिशा को भी बदला है। द टेलीग्राफ अखबार के संवाददाता ने इस संदर्भ में कहा, ‘‘हमारे पास प्रमाण हैं। हमने नेपाल के राजनेताओं से बात की है और उन्होंने ऐसा कहा है। अखबार की खबर के अनुसार, चीन ने मई में पांच सीमावर्ती जिलों में कथित तौर पर नेपाली जमीन को हड़पना शुरू किया था और इसके लिए उसने पीएलए जवानों को सीमा के उन क्षेत्रों में भेजा जहां पहरेदारी नहीं है।

बहरहाल, नेपाल का बदला रुख चीन के तेवर और तीखे करेगा लेकिन भारत उस पर नकेल कसने के लिए पूरी तरह तैयार है। चीन से जिस तरह मालदीव, श्रीलंका और अब नेपाल ने पीछा छुड़ाया है वह दर्शाता है कि कैसे यह विस्तारवादी देश दोस्त के वेश में सबको छलने के लिए आता है।

-नीरज कुमार दुबे

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