By नीरज कुमार दुबे | Oct 17, 2026
भारतीय सेना के एक मेजर पर दो साथी अफसरों की पत्नियों समेत चार महिलाओं से कथित संबंध रखने के गंभीर आरोप लगे हैं। इस मामले में सेना प्रमुख ने मेजर को कारण बताओ नोटिस जारी कर उनकी सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। मामला अब सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) पहुंच चुका है, जहां मेजर ने जांच में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए कार्रवाई को चुनौती दी है। वहीं, उनकी पूर्व पत्नी द्वारा पुरानी शिकायत वापस लिए जाने के बावजूद सेना की कार्रवाई जारी है।
अक्टूबर 2023 में मुख्यालय 55 (आई) मैकेनाइज्ड ब्रिगेड ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी गठित की। जांच का एक प्रमुख आरोप साथी अधिकारियों की पत्नियों से अनुचित संबंध स्थापित करने और एक सैन्य अधिकारी से अपेक्षित आचरण के उल्लंघन से जुड़ा था। बाद में अतिरिक्त जांच समितियां भी गठित की गईं।
दूसरी ओर मेजर का आरोप है कि पूरी जांच अनिवार्य सैन्य नियमों की अनदेखी करते हुए आगे बढ़ाई गई। उनका दावा है कि आर्मी रूल 180 के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और जिन महिलाओं के नाम शिकायत में थे, न तो उन्हें बुलाया गया और न ही उनके पतियों के बयान दर्ज किए गए। अधिकारी के मुताबिक, बार-बार अनुरोध के बावजूद संबंधित व्यक्तियों को जांच में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने मोबाइल फोन, लैपटॉप और पेन ड्राइव जैसे डिजिटल उपकरणों को जब्त करने तथा उनके आवास की तलाशी में भी अनियमितताओं का आरोप लगाया है। बताया जा रहा है कि मार्च 2025 में सेना ने आर्मी एक्ट की धारा 45 और 63 के तहत संभावित आरोपपत्र तैयार किया था। इसके बाद समरी ऑफ एविडेंस और अतिरिक्त समरी ऑफ एविडेंस की कार्यवाही हुई। इस दौरान भी मेजर ने संबंधित महिलाओं को बुलाकर पूछताछ करने की मांग दोहराई थी।
वहीं दूसरी ओर, सेना प्रमुख की ओर से 10 अगस्त को जारी कारण बताओ नोटिस में आर्मी रूल 19 और 14 का हवाला देते हुए पूछा गया कि अधिकारी की सेवा प्रशासनिक रूप से समाप्त क्यों न कर दी जाए? नोटिस में कहा गया है कि परिस्थितियों के मद्देनजर कोर्ट मार्शल के जरिए मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
देखा जाये तो यही कदम अब विवाद के केंद्र में है। आरोपी अधिकारी का तर्क है कि जिन जांच और साक्ष्य प्रक्रियाओं पर कार्रवाई आधारित है, वे कथित अनियमितताओं के कारण ही दोषपूर्ण हैं। ऐसे में उन्हीं कार्यवाहियों के आधार पर सेवा समाप्त करना कानूनसम्मत नहीं है।
हम आपको यह भी बता दें कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ 30 मार्च 2026 को आया था, जब मेजर और उनकी तत्कालीन पत्नी का अनंतनाग के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के आदेश से आपसी सहमति के आधार पर तलाक हो गया। समझौता ज्ञापन में पत्नी ने अगस्त 2023 की शिकायत वापस लेते हुए कहा कि वैवाहिक विवाद के दौरान शिकायत अनजाने में दर्ज हुई थी और उसके पास निर्विवाद आधार नहीं थे। उन्होंने संबंधित अधिकारियों के समक्ष बयान देने का आश्वासन भी दिया था। मेजर ने इसी आधार पर कारण बताओ नोटिस को चुनौती देते हुए एएफटी से राहत मांगी। उन्होंने आर्मी रूल 184 के तहत कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट और राय तथा आर्मी रूल 22 के तहत सुनवाई संबंधी कार्यवाही की प्रतियां भी मांगीं।
वहीं 14 अक्टूबर को न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन और लेफ्टिनेंट जनरल सी.पी. मोहंती की पीठ ने कारण बताओ नोटिस पर रोक लगाने से इंकार करते हुए मेजर को निर्देश दिया कि वे अपनी आपत्तियां नोटिस के जवाब में उठाएं। साथ ही, सेना अधिकारियों को कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के निष्कर्षों और सुनवाई की कार्यवाही की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। बहरहाल, अब मेजर का भविष्य सेना के जवाब, उपलब्ध दस्तावेजों और आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।