By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 04, 2026
नयी दिल्ली, चार नवंबर भारत में बैटरी कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत समान आयातित उत्पादों की तुलना में 60 प्रतिशत तक अधिक है। उद्योग संगठन ‘नेट जीरो एनर्जी ट्रांजिशन अलायंस (एनईटीआरए) और अन्य संस्थाओं की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। इस सप्ताह की शुरुआत में जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कैथोड और एनोड सामग्री, इलेक्ट्रोलाइट, सेपरेटर तथा तांबे की पन्नी बनाने वाली कंपनियों की लागत आयातित उत्पादों की तुलना में 18 से 61 प्रतिशत तक अधिक है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब सरकार देश में बैटरी के कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों को समर्थन देने के लिए एक विशेष योजना लाने पर विचार कर रही है। ‘एक्सेलरेटिंग इंडियाज एसीसी कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में वैश्विक बैटरी कलपुर्जों की आपूर्ति में चीन के लगभग पूर्ण वर्चस्व की ओर ध्यान दिलाया गया है। नेट जीरो एनर्जी ट्रांजिशन के सह-संस्थापक एवं कार्यकारी निदेशक देबी प्रसाद दास ने कहा कि रिपोर्ट में लागत से जुड़े आंकड़े उन भारतीय कंपनियों से लिए गए हैं, जो इन संयंत्रों को स्थापित कर रही हैं या लगाने की योजना बना रही हैं।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग कलपुर्जों के मामले में लागत का अंतर होने के कारण भी अलग-अलग हैं। एनईटीआरए के संस्थापक एवं अध्यक्ष राहुल वालावलकर ने कहा कि नए विनिर्माताओं को शुरुआती पांच से छह साल तक उत्पादन में अधिक सामग्री की बर्बादी का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, बैटरी सेल के कुल विनिर्माण खर्च में कलपुर्जों की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत होती है।
भारत में बैटरी की मांग 2025 के करीब 33 गीगावाट घंटे (जीडब्ल्यूएच) से बढ़कर 2032 में 236 जीडब्ल्यूएच और 2037 तक करीब 600 जीडब्ल्यूएच होने का अनुमान है।