भारत में 10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर सवाल, गिग वर्कर्स के दबाव में कंपनियों का रुख बदला

By Ankit Jaiswal | Jan 15, 2026

दुनिया के कई देशों में जहां इंस्टेंट डिलीवरी मॉडल टिक नहीं पाया, वहीं भारत में यह बीते कुछ वर्षों में तेज़ी से फैलता चला गया। शहरी इलाकों में उपभोक्ता अब यह उम्मीद करने लगे हैं कि किराने का सामान हो या फिर महंगे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, सब कुछ 10 से 15 मिनट के भीतर घर तक पहुंच जाए। यही वजह है कि क्विक-कॉमर्स भारत के ई-कॉमर्स इकोसिस्टम का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।


बता दें कि इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए ज़ेप्टो, ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने सैकड़ों मिलियन डॉलर का निवेश किया है। ये कंपनियां रिहायशी इलाकों के आसपास तथाकथित “डार्क स्टोर्स” बना रही हैं, जो छोटे गोदामों की तरह काम करते हैं और वहीं से ऑर्डर तुरंत भेजे जाते हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में डिलीवरी कर्मियों की भर्ती भी की गई है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा लगातार तेज़ होती जा रही है।


गौरतलब है कि सेक्टर के विस्तार के साथ ही डिलीवरी से जुड़े कर्मचारियों पर दबाव भी बढ़ा है। मौजूद जानकारी के अनुसार, नए साल की पूर्व संध्या पर देश के कई बड़े शहरों में दो लाख से अधिक गिग वर्कर्स ने प्रदर्शन किया। ये प्रदर्शन उस वक्त हुए, जब डिलीवरी की मांग चरम पर थी। कर्मचारियों की मांगों में कानूनी सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा लाभ, बेहतर मेहनताना और ऑटोमेटेड पेनल्टी सिस्टम में बदलाव शामिल रहे, जो देर से डिलीवरी पर उनकी रेटिंग गिरा देता है।


कई विशेषज्ञों ने सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। तेज़ समयसीमा के दबाव में डिलीवरी कर्मियों को ट्रैफिक के बीच जल्दबाज़ी करनी पड़ती है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। मानव संसाधन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि 10–15 मिनट की डिलीवरी का मॉडल गिग वर्क की तनाव और जोखिम प्रोफ़ाइल को पूरी तरह बदल देता है।


इसी पृष्ठभूमि में, श्रमिक संगठनों के विरोध और श्रम मंत्रालय के दबाव के बाद ब्लिंकिट ने अपने ऐप और प्रचार से “10 मिनट में डिलीवरी” वाला संदेश हटा दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में अन्य क्विक-कॉमर्स कंपनियां भी ऐसा कदम उठा सकती हैं।


यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब हाल ही में भारत सरकार ने नए श्रम कानूनों के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानूनी मान्यता दी है। इन नियमों के तहत फूड डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसी कंपनियों को अपने वार्षिक राजस्व का एक हिस्सा सरकार द्वारा संचालित सामाजिक सुरक्षा कोष में जमा करना होगा।


गौरतलब है कि सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक, भारत की गिग अर्थव्यवस्था में 2020-21 के दौरान लगभग 77 लाख लोग काम कर रहे थे। यह संख्या 2029-30 तक बढ़कर करीब 2.35 करोड़ होने का अनुमान है। ऐसे में क्विक-कॉमर्स की रफ्तार के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकारों पर संतुलन बनाना आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती रहने वाली है।

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