By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jun 20, 2026
पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान भारत ने एलपीजी आयात के स्रोतों में विविधता लाते हुए अमेरिका, ईरान और अन्य देशों से खरीद बढ़ाई। इससे खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई और आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिली। इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का बड़ा हिस्सा खुद वहन कर घरेलू उपभोक्ताओं को राहत दी। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, संघर्ष शुरू होने से पहले भारत के कुल एलपीजी आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता था, जिससे देश क्षेत्रीय व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील था।
हालांकि इसके कारण आपूर्ति श्रृंखला लंबी हुई और मालभाड़ा लागत बढ़ गई। इसके बावजूद व्यवधान का असर मांग पर पड़ा। सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के कारण एलपीजी की खपत फरवरी के 32 लाख टन से घटकर अप्रैल में 24.7 लाख टन रह गई। वित्त वर्ष 2025-26 में एलपीजी खपत छह प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 3.32 करोड़ टन पर पहुंचने के बाद मार्च और अप्रैल में सालाना आधार पर 13 प्रतिशत घट गई, जबकि मई में इसमें 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं पर इसका सबसे अधिक असर पड़ा। बाजार आधारित मूल्य व्यवस्था के तहत आने वाले इन उपभोक्ताओं की खपत ऊंची कीमतों और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण घरेलू उपभोक्ताओं की तुलना में अधिक घटी। क्रिसिल ने कहा कि संघर्ष के कारण वैश्विक एलपीजी कीमतों में भी तेज उछाल आया। हालांकि, इस वृद्धि का पूरा बोझ घरेलू उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया।
दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत फरवरी से जून के बीच लगभग 10 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 19 किलोग्राम वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 79 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू रसोई गैस की कीमतों में सीमित वृद्धि के कारण तेल विपणन कंपनियों पर लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर बढ़ गया। मई में दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर यह अंतर बढ़कर 651 रुपये प्रति सिलेंडर पहुंच गया। मार्च से मई के दौरान खुदरा ईंधन विक्रेताओं द्वारा वहन किया गया कुल घाटा लगभग 22,000 करोड़ रुपये आंका गया।