By अभिनय आकाश | Oct 09, 2026
हपश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के एक आम किसान सहदुल शेख की और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मजदूरी करने गए चार बेगुनाह मजदूरों की जिन्हें सिर्फ एक संदेह के आधार पर डिटेंशन सेंटर में डाल दिया गया और देश से बाहर निकालने की तैयारी कर ली गई। तभी एंट्री होती है कोलकाता हाईकोर्ट की। कोर्ट ने जो कहा उसे देश की सियासत, पुलिसिया रोड और नागरिकता के पूरे खेल को झजझकोर कर रख दिया है। कोर्ट ने सीधे पूछा क्या किसी के शक करने से मात से कोई विदेशी हो जाता है? क्या आप इंसानों को इस तरह देश से बाहर फेंक देंगे? साहिद उल्लाह शेख एक सीधा साधा किसान पुलिस आती है और उसे अवैध बांग्लादेशी बताकर उठा लेती है। आनन-फानन में फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस यानी एफ आरआरओ उसे देश से डिपोर्ट करने यानी भारत से बाहर निकालने का फरमान सुना देता है। तर्क क्या था? पुलिस ने कहा कि पड़ोसियों और परिवार के कुछ कथित लोगों ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया। सैदुल्लाह की पत्नी कोर्ट पहुंचती है। वो चीख-चीख कर कहती है कि मेरे पति के पास आधार कार्ड है, पैन कार्ड है, स्कूल का सर्टिफिकेट है। उनके बाप दादा इसी मिट्टी में पैदा हुए लेकिन प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं होता। इसी दौरान एक और मामला सामने आता है।
कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद उन चार मजदूरों को डिटेंशन सेंटर से रिहा करना पड़ा। लेकिन यहां एक बहुत बड़ा कानूनी पेच है जिसे आपको जानना बेहद जरूरी है। भारत में एक कानून है फॉरेनर्स एक्ट 1946। इसकी धारा नौ आम कानूनों से बिल्कुल अलग है। मई 2025 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे बांग्लादेश और म्यांमार से आए ऐसे लोगों की पहचान की पुष्टि करें, जिनके बारे में बिना वैध दस्तावेज़ों के रहने वाले प्रवासी होने का संदेह है। पश्चिम बंगाल के सांसद समीरुल इस्लाम ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्रशासन ने मुर्शिदाबाद के ज़िला मजिस्ट्रेट से सत्यापन रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन कथित तौर पर पश्चिम बंगाल प्रशासन ने वह रिपोर्ट नहीं दी। उन्होंने कहा कि इसके बाद परिवारों को कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख करना पड़ा और अदालती दखल के बाद ही उन चार लोगों को रिहा किया गया।