By अभिनय आकाश | Jul 22, 2026
एक तस्वीर... बहता खून... और बदल गई पूरी कांग्रेस की राजनीति! सियासत में सही वक्त पर सही 'ऑप्टिक्स' का दांव बड़े-बड़े समीकरण बदल देता है। मंगलवार को दिल्ली में 7, लोक कल्याण मार्ग के बाहर जो नाटकीय तस्वीरें सामने आईं, उसने कांग्रेस के लिए ठीक यही काम किया। पुलिस की ज़ोर-जबरदस्ती के बीच लहूलुहान नाक, धूल में सने कपड़े और एक पैर से लापता जूते के साथ जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को हिरासत में लिया गया, तो खबर सिर्फ विरोध प्रदर्शन की नहीं रही। पेपर लीक मामले में CJP के भारी-भरकम प्रदर्शनों के बाद कांग्रेस जो मुख्य विपक्षी जगह गंवाती दिख रही थी, राहुल की इस एक आक्रामक तस्वीर ने पार्टी को सीधे फिर से फ्रंटफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है। राहुल और प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस के सीनियर नेता 7, लोक कल्याण मार्ग के बाहर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। वे प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई का विरोध कर रहे थे, तभी उन्हें घसीटकर हिरासत में ले लिया गया।
कांग्रेस के लिए, इन घटनाक्रमों ने इस मुद्दे पर विपक्ष की जगह फिर से हासिल करने का मौका दिया। सोमवार के विरोध-प्रदर्शनों से पता चला कि युवाओं के एक वर्ग में सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी नाराज़गी थी। जब से पिछले महीने जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) ने अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया है, कांग्रेस उसे समर्थन देने को लेकर हिचकिचाती रही है। पार्टी खुद को मुश्किल में नहीं डालना चाहती थी क्योंकि ऐसी अटकलें थीं कि CJP को 'आम आदमी पार्टी' (AAP) का समर्थन हासिल है। पिछले ही हफ़्ते कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से मिलने गए, जो पिछले तीन हफ़्तों से भूख हड़ताल पर हैं। हालांकि, राहुल गांधी CJP के विरोध-प्रदर्शन से दूर ही रहे। जहां एक तरफ़ CJP का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था, वहीं कांग्रेस का अपना कैंपेन 'छात्रों की गूंज' राहुल के विदेश दौरे के लंबा खिंचने की वजह से ठंडा पड़ गया। इस बात पर BJP ने उनकी आलोचना भी की। हालांकि, पिछले हफ़्ते राहुल ने देहरादून में एक कार्यक्रम किया, जिसमें उन्होंने छात्रों के हितों की रक्षा करने में केंद्र सरकार की नाकामी को उजागर किया। विरोध-प्रदर्शन को प्रधानमंत्री के दरवाज़े तक ले जाकर, राहुल ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की। सबसे पहले, इससे राहुल एक बार फिर इस आंदोलन के चेहरे के तौर पर सुर्खियों में आ गए।
लोगों के बीच यह धारणा बन रही थी कि CJP पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ़ आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। कांग्रेस ऐसा होने नहीं दे सकती थी क्योंकि राहुल भी कुछ समय से इन्हीं मुद्दों को उठाते रहे हैं। इससे कांग्रेस को नैरेटिव बदलने में मदद मिली सिर्फ़ शिक्षा मंत्री के बजाय सीधे प्रधानमंत्री मोदी को ज़िम्मेदार ठहराने का नैरेटिव। इससे बीजेपी पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ेगा कि वह संसद में सिर्फ़ चर्चा करने से कहीं ज़्यादा मज़बूत कदम उठाए। असल में राहुल ने विरोध प्रदर्शन को इसी नज़रिए से पेश किया। गांधी ने कहा हम युवा छात्रों के साथ हुई बर्बरता के बारे में प्रधानमंत्री से जवाब मांगने के लिए उनके घर तक मार्च करके आए हैं। पेपर लीक को लेकर सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। इस बात पर बहस जारी रहेगी कि क्या राहुल गांधी ने मंगलवार को कोई लक्ष्मण रेखा पार की थी। हालाँकि, कांग्रेस के लिए मंगलवार की अफ़रा-तफ़री ने एक ऐसी तस्वीर छोड़ी जो लंबे समय तक याद रहेगी। विपक्ष के नेता की तस्वीर, जो प्रधानमंत्री आवास के बाहर खून से लथपथ हैं और जिन्हें पुलिस घसीटकर ले जा रही है। राजनीति में धारणा उतनी ही मायने रखती है जितनी नीयत।