By एकता | Sep 06, 2026
भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को लेकर इसरो के कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ रही है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च से जुड़े कामों को निजी कंपनियों को दिए जाने की चर्चाओं के बीच संगठन के हजारों कर्मचारियों में अपने भविष्य को लेकर असमंजस पैदा हो गया है।
नौ कर्मचारी संघों ने 4 सितंबर 2026 को वी. नारायणन को संयुक्त पत्र भेजा। इसमें उन्होंने पूछा है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका के बीच इसरो की आगे क्या जिम्मेदारी होगी और मौजूदा कर्मचारियों के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा। कर्मचारी संगठनों ने आने वाली भर्तियों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर इसरो के मौजूदा काम धीरे-धीरे निजी कंपनियों को दिए गए तो संगठन में नई भर्तियों और कर्मचारियों के प्रमोशन के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है।
कर्मचारी संघों की चिंता की बड़ी वजह IN-SPACe के अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका का हालिया बयान बताया जा रहा है। गोयनका ने कहा था कि भविष्य में इसरो खुद लॉन्च व्हीकल यानी रॉकेट का निर्माण नहीं करेगा। यह काम निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) के जरिए किया जाएगा। इसके बाद कर्मचारी संघों ने सवाल उठाया है कि क्या इसरो धीरे-धीरे रॉकेट निर्माण और लॉन्च ऑपरेशन से बाहर होने जा रहा है।
संघों का कहना है कि SSLV (Small Satellite Launch Vehicle) के मामले में बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। अब उन्हें आशंका है कि PSLV और LVM3 जैसे महत्वपूर्ण रॉकेटों के निर्माण और संचालन में भी निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाई जा सकती है। इसके अलावा कुलशेखरपट्टनम में बन रहे नए स्पेस लॉन्च कॉम्प्लेक्स समेत दूसरी अंतरिक्ष सुविधाओं को निजी ऑपरेटरों के लिए खोले जाने और इसरो की करीब 120 तकनीकों को निजी क्षेत्र में ट्रांसफर किए जाने की खबरों ने भी कर्मचारियों की चिंता बढ़ाई है।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि निजी भागीदारी को लेकर कई बयान सामने आए हैं, लेकिन अंतरिक्ष विभाग की ओर से कर्मचारियों को कोई स्पष्ट लिखित नीति नहीं बताई गई है। संघों ने सीधे सवाल किया है कि क्या पवन गोयनका का बयान केंद्र सरकार, अंतरिक्ष आयोग या अंतरिक्ष विभाग की आधिकारिक मंजूरी वाली नीति है?
कर्मचारी संघों ने यह भी पूछा है कि भविष्य में PSLV, LVM3, SSLV और दूसरे रॉकेटों का डिजाइन, विकास, निर्माण, टेस्टिंग और लॉन्च इसरो के काम का हिस्सा रहेगा या नहीं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि देश के टैक्सपेयर्स के पैसे और इसरो के वैज्ञानिकों की कई दशकों की मेहनत से तैयार की गई तकनीक, टेस्टिंग सुविधाओं और लॉन्च पैड को निजी कंपनियों को देने की प्रक्रिया किस नियम और व्यवस्था के तहत होगी। इसके साथ ही संघों ने NewSpace India Ltd (NSIL) और IN-SPACe की भूमिका को लेकर भी स्पष्ट जानकारी मांगी है।
कर्मचारी संघों का कहना है कि रॉकेट की डिजाइनिंग, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और लॉन्चिंग सिर्फ कोई सामान्य मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। ये इसरो की मुख्य विशेषज्ञता और कई दशकों से विकसित अनुभव का हिस्सा हैं। उनका डर है कि अगर इसरो रॉकेट और सैटेलाइट निर्माण से पीछे हटता है तो संगठन के अंदर काम कम हो सकता है। इससे स्वीकृत पदों पर भर्तियां रुक सकती हैं और तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रशासनिक, खरीद, स्टोर और सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों के प्रमोशन के अवसर भी कम हो सकते हैं।
कर्मचारी संगठनों ने आशंका जताई है कि अगर मौजूदा काम निजी कंपनियों को सौंपे गए तो इसरो में कुछ कर्मचारी सरप्लस हो सकते हैं या उनके पास पहले की तुलना में कम काम रह सकता है। इसके अलावा ग्रुप A, B और C पदों पर नियमित भर्तियां कम होने की स्थिति में देश के युवाओं के लिए इसरो में सरकारी नौकरी के अवसर भी घट सकते हैं।
कर्मचारी संघों ने साफ किया है कि वे प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि NSIL के जरिए सीमित दायरे में व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने पर उन्हें आपत्ति नहीं है। उनकी मुख्य मांग सिर्फ इतनी है कि सरकार एक स्पष्ट और आधिकारिक नीति दस्तावेज जारी करे। इसमें यह साफ होना चाहिए कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका कितनी होगी और इसरो की अपनी तकनीकी एवं निर्माण क्षमता को किस हद तक बरकरार रखा जाएगा।
कर्मचारी संघों ने कहा है कि उन्होंने यह पत्र विरोध के बजाय रचनात्मक और लोकतांत्रिक भावना से लिखा है। उन्होंने इसरो को GSLV-F17/EOS-05 मिशन की सफलता के लिए बधाई भी दी। संघों का कहना है कि उनकी निष्ठा इसरो और देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रति पूरी तरह बनी हुई है। हालांकि, उनका मानना है कि मौजूदा अनिश्चितता आगे चलकर स्थायी नीति का रूप ले, उससे पहले सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।