By अभिनय आकाश | Jun 30, 2026
एक दिन आप सुबह-सुबह सोकर उठे देखा तो हर तरफ हड़कंप मचा था जानने की इच्छा हुई कि आखिर हुआ क्या आंख मलते हुए मोबाइल पर तुरंत न्यूज़ पढ़ी तो होश उड़ गए खबर थी कि दुनिया में कच्चा तेल खत्म यानी पेट्रोल डीजल कुछ भी नहीं बचा बूंद भर भी नहीं सुनकर टेंशन तो होगी घर के दरवाजे पर कार खड़ी है बाइक खड़ी है अब उनका क्या होगा लेकिन कुछ देर की टेंशन थी जो दो बातें सोचकर कम हुई पहली अरे यह दर्द केवल हमारा थोड़ी है यह तो जगत भर की समस्या है। दूसरा कोई नहीं सीएनजी और इलेक्ट्रिक कार्स तो मार्केट में आ गई हैं घर की लाइट और एसी वसी भी चल रहा है तेल रुकने से यह कुछ भी बंद नहीं हुआ लेकिन कुछ रोज महंगाई का सामना करना पड़ेगा क्योंकि कुछ समय के लिए सही देश की अर्थव्यवस्था के चक्के तो जम ही जाएंगे। लेकिन कुल मिलाकर ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे आपको यह लगे कि आप 170 साल पहले पहुंच गए 170 साल पहले की बात इसलिए क्योंकि तब पेट्रोल और डीजल कुछ भी इजाद नहीं हुआ था या कहिए खोजा नहीं गया था। बल्ब भी नहीं जला था, पंखा भी नहीं था और एसी भी नहीं था। लेकिन तब लोग जीते कैसे थे। क्या रात को घरों में अंधेरा ही रहता था? अगर नहीं तो रातों को घरों में रोशनी आखिर होती कैसे थी फिर केरोसिन ऑइल यानी मिट्टी के तेल की खोज कैसे हुई और फिर किसका दिमाग घूमा और दुनिया बदलने वाले पेट्रोल डीजल की खोज हुई। तो चलिए, आज ग्लोब को थोड़ा घुमाते हैं और चलते हैं इतिहास के उस दौर में... जहाँ से इंसानियत का यह 'ऑयल एडवेंचर' शुरू हुआ था। लेकिन इस 'ब्लैक गोल्ड' यानी कच्चे तेल की कहानी सिर्फ कुओं से निकलने वाले काले गाढ़े लिक्विड की नहीं है... यह कहानी है इंसानी लालच, महाशक्तियों के दबदबे और दुनिया को मुट्ठी में करने की जंग की!
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज। हिंदी में कहें तो तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन या समूह। दुनिया के 11 मेजर ऑयल प्रोड्यूसिंग देश सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, लिबिया, नाइजीरिया, द रिपब्लिक ऑफ कांगो, इक्वेटोरियल, गिनी, गेबोन और वेनेजुएला। यह मिलकर तय करते हैं कि इस महीने हम सब दुनिया में कितना कच्चा तेल देंगे। इन्हें दाम ऊपर करने होते हैं तो सप्लाई को टाइट कर देते हैं। दाम इजी करने होते हैं तो सप्लाई बढ़ा देते हैं। इसकी जो शुरुआत थी वो हुई थी 1960 में बगदाद में जब पांच देशों ने मिलकर इसे बनाया था। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसमें शामिल थे। इन देशों का मकसद एक था तेल की कीमतें कैसे तय हो, कितना तेल निकाला जाए, कितना प्रोड्यूस किया जाए, यह फैसला अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के हाथ से वापस लेकर खुद करना। यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ। आज ओपेक में 12 देश हैं और दुनिया का करीब 38% तेल यही ग्रुप प्रोड्यूस करता है।
इसके अलावा एक और ग्रुप है जिसका नाम है ओपेक प्लस। उसमें थोड़े से और देश हैं वो मिलकर भी कच्चे तेल की सप्लाई को अफेक्ट करते हैं। उसमें है रूस, कजाकिस्तान, अज़रबजान, मेक्सिको, ओमान, बरीन, मलेशिया, ब्रूने, दक्षिण सूडान और सूडान। ओपेक एक कार्टल की तरह काम करता था। इसकी असली ताकत थी इसका डिसिप्लिन। 2016 के आसपास ओपेक ने रूस जैसे कुछ बड़े गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ एक एक्सटेंडेड अलायंस बनाया था। इसी को कहा जाता है ओपेक प्लस। यह ग्रुप मिलकर तय करता है कि दुनिया में कितना तेल बेचा जाएगा ताकि कीमतें ना बहुत ज्यादा गिरे और ना बहुत ज्यादा चढ़े। यूएई ने अब इन देशों से नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है।
ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। जनवरी 2026 की शुरुआत में, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हद्रा मौत प्रांत में यूएई समर्थित सदन ट्रांजिशनल काउंसिल के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। तब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में अलगाववादी समूहों को हथियारों की आपूर्ति करने और अपने देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था।
यूएई के ओपेक से बाहर निकलने से पूरा गेम बदल सकता है। वह अपनी मर्जी से प्रोड्यूस कर सकता है। 30 35 लाख बैरल हर दिन के बजाय वह 50 लाख बैरल हर दिन तक जा सकता है। इसका सीधा मतलब है ज्यादा तेल, ज्यादा एक्सपोर्ट और ज्यादा कमाई। तेल की सप्लाई बाजार में बढ़ेगी तो बेसिक मैथ्स है कच्चा तेल दुनिया भर में सस्ता हो जाएगा। लेकिन क्या यह सब इतना आसान है जितना हमें सुनाई दे रहा है? क्या यूएई जितना मन चाहे उतना तेल बना सकता है और बेच सकता है? नहीं। यूएई की पहली प्रॉब्लम है पाइपलाइन की। स्टेट ऑफ हॉर्मोस के अलावा यूनाइटेड अरब एमिरेट्स के पास एक ही बड़ा पाइपलाइन है जो स्टेट ऑफ हॉर्मोस को बाईपास करता है जिसे हब्शन फजेरा पाइपलाइन कहते हैं। ये हब्शन से शुरू हो के फजेरा पोर्ट तक जाती है। इस पाइप लाइन पर ईरान का या किसी और देश का इन्फ्लुएंस नहीं है। जैसा स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर ईरान का है। ये पाइपलाइन एक तरीके से आप समझिए कि पानी की पाइपलाइन है। इसकी क्षमता कितनी है कि एक दिन में 15 लाख बैरल तेल पहुंचा सकता है। अभी कितना पहुंचा रहा है? लगभग 10.5 लाख बैरल। कितना और भेज सकता है? 4.5 लाख बैरल हर दिन। और इसकी क्षमता कितनी बढ़ाई जा सकती है? 18 लाख बैरल हर दिन। एक दूसरी पाइपलाइन का प्लान बनाया था लेकिन उसका कंस्ट्रक्शन अभी शुरू भी नहीं हुआ है। मतलब 2026 में तो पॉसिबल नहीं है कि यूएई अचानक से दुनिया के बाजार में इतना तेल डाल दे कि प्राइसेस क्रैश हो जाए।