न खाऊंगा का वादा तो पूरा हुआ लेकिन ना खाने दूँगा की हुंकार ने पूरा असर नहीं दिखाया है

By ललित गर्ग | Dec 09, 2021

अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोध दिवस प्रतिवर्ष 9 दिसम्बर को पूरे विश्व में मनाया जाता है। भ्रष्टाचार एक दीमक की तरह है जो देश एवं दुनिया को, उसकी अर्थव्यवस्था को और कुल मिलाकर नैतिकता एवं मूल्यों को खोखला कर रहा है। यह उन्नत एवं मूल्याधारित समाज के विकास में बड़ी बाधा है। दुनिया का लगभग हर देश इस समस्या से ग्रसित है। इसीलिये 31 अक्टूबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र ने एक भ्रष्टाचार-निरोधी समझौता पारित किया था और तभी से यह दिवस मनाया जाता है।

भ्रष्टाचार एक गंभीर अपराध है जो सभी समाजों में नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास को कमजोर करता है। आज के समय में भ्रष्टाचार से कोई देश, क्षेत्र या समुदाय बचा नहीं है। यह दुनिया के सभी हिस्सों में फैल गया है, जो राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों को भी कमजोर करता है, सरकारी अस्थिरता में योगदान देता है और आर्थिक विकास को भी धीमा करता है, तभी इस विकराल होती समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये संयुक्त राष्ट्र ने भ्रष्टाचार निरोध दिवस को आयोजित करने का निश्चय किया।

दुःखद स्थिति है कि भारत अपनी आजादी के अमृत महोत्सव तक पहुंचते हुए भी स्वयं को ईमानदार नहीं बना पाया, चरित्र सम्पन्न राष्ट्र नहीं बन पाया। यह सत्य है कि जब राजनीति भ्रष्ट होती है तो इसकी परछाइयां दूर-दूर तक जाती हैं। हमारी आजादी की लड़ाई सिर्फ आजादी के लिए थी- ईमानदार एवं आदर्श व्यवस्था के लिए नहीं थी। यही कारण है कि आजादी के बाद बनी सरकारों के भ्रष्टाचार का विष पीते-पीते भारत की जनता बेहाल हो गई। हजारों लोग बेकसूर जेलों में पड़े हैं। रोटी के लिए, शिक्षा के लिये, चिकित्सा के लिये, रोजगार के लिए तरसते हैं। उपचार के लिए अस्पतालों के धक्के खाते हैं। आयुष्मान जैसी योजना भी भारत में भ्रष्टाचार की शिकार हो गई। कुछ सत्तापतियों की सात पीढ़ियों सुरक्षित हो गयी। आज हमारी व्यवस्था चाहे राजनीति की हो, सामाजिक हो, पारिवारिक हो, धार्मिक हो, औद्योगिक हो, शैक्षणिक हो, सब चरमरा गई है। दोषग्रस्त एवं भ्रष्ट हो गई है। उसमें दुराग्रही इतना तेज चलते हैं कि ईमानदार बहुत पीछे रह जाता है। जो सद्प्रयास किए जा रहे हैं, वे निष्फल हो रहे हैं। प्रगतिशील कदम उठाने वालों ने और समाज सुधारकों ने अगर व्यवस्था सुधारने में मुक्त मन से सहयोग नहीं दिया तो आजादी के कितने ही वर्ष बीत जायें, हमें जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं हो पायेंगे, लगातार भ्रष्ट होते चले जायेंगे।

भारत अभी भी विकासशील देशों में से एक है। पूर्ण रूप से विकसित ना होने का सबसे बड़ा कारण यहां देश में बढ़ता भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार की बढ़ती विभीषिका को नियंत्रित करने के लिये 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा की थी। इसका असर भी देखने को मिला है। देश में भ्रष्टाचार कम हो रहा है। यह बात विश्वसनीय नहीं लगती, लेकिन ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया’ (टीआईआई) ने अपनी ‘इंडिया करप्शन सर्वे-2019’ नाम से जारी रिपोर्ट में यही दावा किया है। यह एक गैरसरकारी संगठन है, जो भ्रष्टाचार रोधी अभियान चलाने के साथ, भ्रष्टाचार की स्थिति पर वार्षिक सर्वेक्षण करके रिपोर्ट भी देता है। इस संगठन ने पहली बार भ्रष्टाचार कम होने की रिपोर्ट दी है। यह सुखद स्थिति है।

भ्रष्टाचार निरोध दिवस मनाते हुए दुनिया के कतिपय राष्ट्रों ने ईमानदार शासन व्यवस्था देने का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिनमें भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश में एक नयी चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति को जन्म दिया है, इस तथ्य से चाह कर भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा अपनी जगह कायम है लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार अभी अपना असर नहीं दिखा पा रही है। सरकार को भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये सख्ती के साथ-साथ व्यावहारिक कदम उठाने की अपेक्षा है। पिछले 75 वर्षों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति ने देश के विकास को अवरूद्ध किया। आजादी के बाद से अब तक देश में हुये भ्रष्टाचार और घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो देश में विकास की गंगा बहायी जा सकती थी। दूषित राजनीतिक व्यवस्था, कमजोर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत ने पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार के अंधेरे कुएं में धकेलने का काम किया।

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देखना यह है कि क्या वास्तव में हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त होगा? यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार देश की रगों में बह रहे भ्रष्टाचार के दूषित रक्त से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान सरकार की नीति और नियत दोनों देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है, लेकिन उसका असर दिखना चाहिए। भारत विश्व में अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये प्रसिद्ध है लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से इसको भारी क्षति पहुँचती रही है। इसके लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार हमारे यहाँ के राजनीतिज्ञ हैं जिनको हम अपनी ढेरों उम्मीदों के साथ वोट देते हैं, चुनाव के दौरान ये भी हमें बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं लेकिन चुनाव बीतते ही ये अपने असली रंग में आ जाते हैं। कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों से भ्रष्टाचार मुक्ति की आशा करना, अंधेरे में सूई तलाशना है। हमें यकीन है कि जिस दिन ये राजनीतिज्ञ अपने लालच को छोड़ देंगे, उसी दिन से हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। विभिन्न राजनीतिक दल जनता के सेवक बनने की बजाय स्वामी बन बैठे। मोदी ने इस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने का बीड़ा उठाया और उसके परिणाम भी देखने को मिले। प्रधानमंत्री का स्वयं को प्रधानसेवक कहना विपक्ष के लिये जुमलेबाजी का विषय हो सकता है लेकिन मोदी ने लोकतंत्र में लोक को स्वामी होने का एहसास बखूबी कराया है। लोकतंत्र में लोक विश्वास, लोक सम्मान जब ऊर्जा से भर जाए तो लोकतंत्र की सच्ची संकल्पना आकार लेने लगती है। लेकिन प्रश्न यह है कि यही लोक अब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृत क्यों नहीं हो रहा है? जन-जागृति के बिना भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

लोगों की लालसा, स्वार्थ और सत्ता पाने की चाहत, मानव को भ्रष्टाचार की तरफ ढकेलती है। हमें अपने देश के लिये भ्रष्टाचारमुक्त शासन-व्यवस्था को स्थापित करने के लिये सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, अटलबिहारी वाजपेयी, नरेन्द्र मोदी जैसे ईमानदार और भरोसेमंद नेता को चुनना चाहिए क्योंकि केवल उन्हीं जैसे नेताओं ने ही भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम किया। हमारे देश के युवाओं को भी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये आगे आना चाहिये। साथ ही बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये किसी ठोस कदम की आवश्यकता है।

- ललित गर्ग

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