By महेन्द्र तिवारी | Oct 14, 2026
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर के अनुमान को 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक और सकारात्मक संकेत है। वैश्विक पटल पर जब कई बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी, महंगाई और अस्थिरता के दौर से गुजर रही हैं, तब भारत की विकास दर में इस तरह का सकारात्मक संशोधन देश की आर्थिक नीतियों और मजबूत आधारभूत संरचना की सफलता को प्रमाणित करता है। यह केवल एक संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय के उस अटूट भरोसे का प्रतीक है जो उसने भारत की आर्थिक संभावनाओं पर जताया है। सात प्रतिशत की यह जादुई विकास दर भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की सूची में सबसे ऊपर रखती है और यह स्पष्ट करती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश का आर्थिक पहिया तेज गति से घूम रहा है।
इस शानदार आर्थिक वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण देश की अपनी मजबूत घरेलू मांग है। पश्चिमी देशों की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से केवल निर्यात पर निर्भर नहीं है, बल्कि यहां का विशाल मध्यवर्ग और उसकी उपभोग क्षमता अर्थव्यवस्था को एक मजबूत ढाल प्रदान करती है। जब वैश्विक बाजारों में मांग कम होती है, तब देश के भीतर की खपत उत्पादन को गिरने नहीं देती। पिछले कुछ वर्षों में लोगों की क्रय शक्ति में जो सुधार आया है, उसने बाजार में उत्पादों और सेवाओं की मांग को निरंतर बनाए रखा है। यह घरेलू मांग ही है जिसके कारण छोटे से लेकर बड़े उद्योगों तक का चक्र सुचारू रूप से चल रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खपत बढ़ने से विनिर्माण और खुदरा व्यापार को भारी लाभ मिल रहा है, जो अंततः सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है।