कोरोना काल में बड़ा संदेश देती है International Yoga Day की थीम- 'योग के साथ रहें, घर पर रहें'

By डॉ. शंकर सुवन सिंह | Jun 20, 2021

योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया हैं। योग शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में बांधती है। योग जीवन जीने की कला है। योग दर्शन है। योग स्व के साथ अनुभूति है। योग से स्वाभिमान और स्वतंत्रता का बोध होता है। योग मनुष्य व प्रकृति के बीच सेतु का कार्य करती है। योग मानव जीवन में परिपूर्ण सामंजस्य का द्योतक है। योग ब्रह्माण्ड की चेतना का बोध कराती है। योग बौद्धिक व मानसिक विकास में सहायक है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना, जीवन में संयम का होना, और समाधि,यही योगिक क्रियाएं योग कहलाती हैं। योग सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का संघ है। योग का जन्म प्राचीन भारत में हजारों साल पहले हुआ था। यह माना जाता है कि शिव पहले योगी या आदियोगी और पहले गुरु हैं। हजारों साल पहले हिमालय में कंटिसारोकर झील के तट पर आदियोगी ने अपने ज्ञान को महान सात ऋषियों के साथ साझा किया था क्योंकि इतने ज्ञान को एक व्यक्ति में रखना मुश्किल था। ऋषियों ने इस शक्तिशाली योग विज्ञान को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैलाया जिसमें एशिया, उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका शामिल हैं। भारत को अपनी पूरी अभिव्यक्ति में योग प्रणाली को प्राप्त करने का आशीष मिला हुआ है। आज योग भारत की बदौलत ही दुनिया भर में फैला है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता के जीवाश्म अवशेष प्राचीन भारत में योग की मौजूदगी का प्रमाण हैं। इस उपस्थिति का लोक परंपराओं में उल्लेख है। यह सिंधु घाटी सभ्यता, बौद्ध और जैन परंपराओं में शामिल है। सूर्य को वैदिक काल के दौरान सर्वोच्च महत्व दिया गया था और इसी तरह सूर्य नमस्कार का बाद में आविष्कार किया गया था। महर्षि पतंजलि को आधुनिक योग के पिता के रूप में जाना जाता है। हालाँकि उन्होंने योग का आविष्कार नहीं किया क्योंकि यह पहले से ही विभिन्न रूपों में था। उन्होंने इसे प्रणाली में आत्मसात कर दिया। उन्होंने देखा कि किसी को भी अर्थपूर्ण तरीके से समझने के लिए यह काफी जटिल हो रहा है। इसलिए उन्होंने आत्मसात किया और सभी पहलुओं को एक निश्चित प्रारूप में शामिल किया जिसे योग सूत्र कहते हैं।

योग सूत्र, योग दर्शन का मूल ग्रंथ है। यह छः दर्शनों में से एक शास्त्र है और योग शास्त्र का एक ग्रंथ है। योग सूत्रों की रचना 3000 साल के पहले पतंजलि ने की। योगसूत्र में चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है। पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है। अर्थात मन को इधर-उधर भटकने न देना, केवल एक ही वस्तु में स्थिर रखना ही योग है। महर्षि पतंजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने 'योग सूत्र' नाम से योग सूत्रों का एक संकलन किया जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग (आठ अंगों वाले योग) का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं: 1) यम, 2) नियम, 3) आसन, 4) प्राणायाम, 5) प्रत्याहार, 6) धारणा 7) ध्यान 8) समाधि।

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योग करने से तनाव नहीं होता है। योग जीवन को तनाव मुक्त बनाता है। तनाव सारी बीमारियों की जड़ है। तनाव शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। "तन"+"आव" तन का तात्पर्य शरीर से है "और आव" का तात्पर्य घाव से है। अर्थात वह "शरीर" जिसमे घाव हैं। कहने का तात्पर्य तनाव एक मानसिक बीमारी है जो दिखाई नहीं देती है। शरीर का ऐसा घाव जो दिखाई न दे, तनाव कहलाता है। तनाव से ग्रसित इंसान को सारा समाज पागल दिखाई देता है। तनाव वो बीमारी है जिसमे इंसान हीन भावना से ग्रसित होता है। तनाव मूल रूप से विघर्सन है। घिसने की क्रिया ही विघर्सन कहलाती है। घिसना अर्थात विचारों का नकारात्मक होना या मन का घिस जाना। अतएव तनाव मनोविकार है। तनाव नकारात्मकता का पर्यायवाची है। एक कहावत है- “भूखे भजन न होए गोपाला। पहले अपनी कंठी माला”। भूखे पेट तो ईश्वर का भजन भी नहीं होता है। कहने का तात्पर्य जब हम स्वयं का आदर व सम्मान करते हैं तभी हम देश और समाज की सेवा कर सकते हैं। तनाव से ग्रसित इंसान जो खुद बीमार है वो दूसरों को भी बीमार करता है। तनाव से ग्रसित इंसान दूसरों को भी तनाव में डालता है। ऐसे नकारात्मक लोगों से दूर रहना चाहिए। समाज की अवनति का कारण है तनाव। योग करने से सकारात्मक विचारों का उदभव होता है। योग सकारात्मकता की जननी है।

सकारात्मकता से तनाव पर विजय पाई जा सकती है। अतएव

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मामृतं गमय ॥– बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28 ।।

अर्थ- मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥ यही अवधारणा समाज को चिंतामुक्त और तनाव मुक्त बनाती है। स्व को विकसित करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया ही योग है। अर्थात योग अपनेपन को विकसित करता है। अपनापन, अकेलापन को दूर करता है। अपनापन का शाब्दिक अर्थ है -आत्मीयता/स्वाभिमान/आत्माभिमान। आत्मीयता अर्थात अपनी आत्मा के साथ मित्रता। स्वाभिमान अर्थात स्व के साथ जुड़ना। आत्माभिमान अर्थात आत्मा के साथ जुड़ना। कहने का तात्पर्य- मनुष्य कभी अकेला नहीं होता है। मनुष्य जब नकारात्मक विचारों से ग्रसित होता है तो वह आत्मीयता/स्वाभिमान/आत्माभिमान का अनुभव नहीं करता है। नकारात्मकता अकेलेपन को जन्म देती है। सकारात्मकता अपनेपन को जन्म देती है। अपनापन ही अकेलापन को दूर करता है।

भीड़/लोगों में शामिल होने से हम अपने को अपनेआप से अलग करते हैं। भीड़ में शामिल होना अर्थात अपने को अपने आप से अलग करना हुआ। अलग होना आत्मीयता/स्वाभिमान/आत्माभिमान के लक्षण नहीं हैं। अपनेआप को अपने से अलग करके कभी भी अकेलापन दूर नहीं किया जा सकता है। अतएव अपनी आत्मीयता/स्वाभिमान/आत्माभिमान को बनाए रखें। जिससे जीवन में अकेलेपन का अनुभव न हो। कोई भी व्यक्ति इस धरती पर अकेला नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक रूप से भौतिक संसाधनो व चारो ओर के आवरण से घिरा हुआ है। देखा जाए तो भौतिक रूप से भी व्यक्ति अकेला नहीं है। अतएव हम कह सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति न तो आध्यात्मिक रूप से अकेला है और नहीं भौतिक रूप से। योग से रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। योग रोग को ख़त्म करता है। आयुष मंत्रालय का मानना है की मानव अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर कोविड-19 महामारी से लड़ सकता है। इस महामारी से बचने का कारगर उपाए है योग। तनावमुक्त जीवन जीने की कला है योग। सकारात्मकता से ही सदगुणों का विकास होता है। सकारात्मकता, योग करने से आती है। योग, सदगुणों के विकास का वाहक है। अतएव हम कह सकते है योग, वैश्विक स्वास्थ्य का द्योतक है।

-  डॉ. शंकर सुवन सिंह

वरिष्ठ स्तम्भकार एवं विचारक

असिस्टेंट प्रोफेसर, शुएट्स, नैनी, प्रयागराज (यू.पी.)

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