ईरान-इजरायल युद्ध से दुनिया के सामने नई चुनौती

By ललित गर्ग | Jun 17, 2025

इजरायल ने ईरान के ‘परमाणु कार्यक्रम ठिकानों’ पर अचानक हमला करके न सिर्फ दुनिया को चौंका दिया है बल्कि पश्चिमी एशिया के पूरे क्षेत्र को अनिश्चितता, भय, अशांति एवं संकट के भंवर में डाल दिया है। ईरान जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल को करारा जवाब दे रहा है। जहां इस्राइल इन हमलों को अपने अस्तित्व को बचाने की कार्रवाई बता रहा है, वहीं ईरान जवाबी कार्रवाई कर शीघ्र बदला लेने की बात कर रहा है। लेकिन इन दो राष्ट्रों के संघर्ष एवं युद्ध में समूची दुनिया पीस रही है। एक और युद्ध से दुनिया में विकास का रथ थमेगा, महंगाई बढ़ेगी, तेल के दाम आसमान छूने लगेंगे, व्यापक जनहानि होगी। युद्ध कभी भी किसी के हित में नहीं होता, आखिर समझौते के लिये टेबल पर बैठना ही होता है, तो पहले ही टेबल पर क्यों न बैठा जाये? विनाश एवं सर्वनाथ करने के बाद युद्ध विराम करना कैसे बुद्धिमत्ता है?

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जिसने परमाणु-शस्त्रों के निर्माण और फैलाव से विश्व को तनाव और संत्रास का वातावरण दिया, अनिश्चय और असमंजस की विकट स्थिति दी, उसने विश्व शांति के धरातल छिन लिया है। इन विनाशकारी स्थितियों में मानवीय सहृदयता, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना को कैसे अक्षुण्ण रखा जा सकता है? अभय का वातावरण, शुभ की कामना और मंगल का फैलाव कर तीसरी दुनिया को विकास के समुचित अवसर और साधन देने की संभावनाएं कैसे बलशाली बन सकती है? मनुष्य के भयभीत मन को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति देना वर्तमान की बड़ी जरूरत है। क्योंकि वर्तमान युद्ध की जटिल से जटिलतर होती परिस्थितियों को देखें तो यह पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और समग्र वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत खतरनाक समय है। यदि अन्य देश भी इस संघर्ष में खेमेबाजी का शिकार होकर जुड़ते गए तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। अच्छी बात यही है कि अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है। भारत के लिए बेहतर यही होगा कि शांति एवं कूटनीतिक विकल्पों की वकालत करता रहे, लेकिन उसे खुद भी किसी भी प्रकार की स्थितियों के लिए तैयार रहना होगा।

दुनिया में पहले से ही काफी उथल पुथल मची हुई है। अरब देश संघर्ष लंबा खिंचने पर क्या रूख अख्तियार करते हैं। मुस्लिम देशों की जनता में यह सोच पहले से है कि यहूदी सरकार मुस्लिमों पर अत्याचार कर रही है। ऐसे में उनके लिए भी अपनी जनता की भावनाओं को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा। वहीं इजरायल के सामने भी एक बड़ी चुनौती है कि अगर उसने संघर्ष शुरू किया है तो वह ईरान के खतरे को हमेशा के लिए खत्म करे। ऐसे में इजरायल का सैन्य अभियान लंबा चल सकता है। वह लक्ष्य हासिल होने तक युद्ध को जारी रख सकता है। इसके लिए ईरान की सत्ता में बदलाव या राजनीतिक नेतृत्व को खत्म करना होगा। यहां अमेरिका का समर्थन अहम होगा। बेहतर होगा दुनिया को भारी नुकसान से बचाने के लिये पूतिन एवं ट्रंप युद्ध की आग बुझाने की कोशिश करें। उनका आपस का दोस्ताना संवाद फिलहाल दुनिया के लिये अकेली उम्मीद की किरण है, हालांकि यूरोपीय संघ को और विशेषतः चीन कुछ हद तक यह अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन युद्ध के अंधेरों एवं शांति के उजालों के लिये यही एक रास्ता है।

ईरान पर इजरायल के हमले ने पहले से युद्धरत एवं अस्थिर दुनिया को अधिक वैश्विक संघर्ष की ओर ढकेल दिया है। ईरान भी अपनी पूरी क्षमता के साथ इजरायल पर मिसाइलों से हमला कर रहा है। उधर, इजरायल इस बात पर अड़ा है कि जब तक वह ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता और मिसाइलों के जखीरे को खत्म नहीं कर देता है तब तक हमले जारी रहेंगे। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। आगे चलकर इसमें अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियां शामिल हो सकती हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से दुनिया पहले ही दो खेमों में बंटी दिख रही है। ईरान ऐसी जगह पर हैं, जहां से वह बहुत सीमित संसाधनों के साथ समुद्र से होने वाले वैश्विक व्यापार को बाधित कर सकता है। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन चरमरा सकती है, विश्व व्यापार ठप्प हो सकता है और विश्व में तेल आपूर्ति का संकट पैदा हो सकता है।

इजरायल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। खासकर उसे लगता है कि अगर ईरान ने परमाणु बम बना लिया तो उसके लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। यह खतरा इजरायल के साथ अन्य देशों के लिये भी होगा। इसलिए इजरायल के प्रधानमंत्री बंेजामिन नेतन्याहू कह रहे हैं कि हम ईरान को परमाणु बम नहीं बनाने देंगे। जो आपरेशन शुरु किया है, उसे लक्ष्य हासिल होने तक जारी रखेंगे। ईरान का परमाणु शक्ति बनना एक बड़ा खतरा है, इस बड़े खतरे को समाप्त करना ही ऑपरेशन राइजिंग लायन का लक्ष्य है। इसी समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आना भी इजरायल के बेहतर मौका लेकर आया और यहां अमेरिका का समर्थन अहम हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिये कहा है कि ईरान ने परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रस्ताव को बार-बार खारिज किया है। बहरहाल, इस घटनाक्रम से मध्यपूर्व में इजरायल-ईरान के बीच सीधे युद्ध की आशंका बढ़ गई है। कहा जा रहा है कि इजरायल और हमास, हिजबुल्ला व हूती विद्रोहियों के बीच पहले से जारी संघर्ष से संवेदनशील बने इलाके में पूर्ण युद्ध की आशंका बढ़ गई है।

इजरायल और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसके जटिल परिणाम सामने आते हैं और सभी जीवन-निर्वाह की चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। जिससे भारतीय रूपया कमजोर होने, मुद्रास्फीति बढ़ने और देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ने का खतरा भी है। भारत अपनी जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, ऐसी घटनाओं का महंगाई से लेकर व्यापार संतुलन, रोजगार से लेकर जीवन-निर्वाह तक के महत्वपूर्ण संकेतकों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष भारत के हितों को चोट पहुंचाने वाला है। आर्थिक हित के साथ दोनों देशों के साथ भारत के सामरिक तथा रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं। भारत को संतुलित रवैया अपनाना होगा, क्योंकि ईरान हमारा पुराना मित्र है, जो कश्मीर  मुद्दे को लेकर इस्लामिक देशों के संगठन तक भारत का साथ देता रहा है। इजरायल हमारा महत्वपूर्ण सामरिक एवं नवाचार साझेदार है। किसी के भी पक्ष में झुकाव दुविधा को ओर बढ़ायेगा।

ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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