By रेनू तिवारी | Jul 10, 2026
अमेरिका और इजराइल के हवाई हमलों में मारे गए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को कई दिनों के सार्वजनिक शोक के बाद शुक्रवार तड़के सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। उन्हें उनके गृहनगर मशहद में पूरे राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। करीब 37 वर्षों तक ईरान पर एकछत्र राज करने वाले खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों में मौत हो गई थी, जिसके बाद से ही ईरान युद्ध की शुरुआत हुई थी।
अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के इतिहास के ऐसे दूसरे शासक बन गए हैं, जिन्हें मशहद शहर में दफनाया गया है। उनसे पहले साल 1747 में ईरान के मशहूर शासक नादिर शाह को इस शहर में दफनाया गया था। नादिर शाह ने करीब 11 वर्ष तक ईरान पर शासन किया था और 1747 में उनकी हत्या कर दी गई थी।
अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, थम गई थी तेहरान की रफ्तार
खामेनेई की अंतिम यात्रा शनिवार को शुरू हुई थी, जिसके बाद कई दिनों तक देश में शोक का माहौल रहा। सुरक्षा और श्रद्धांजलि सभाओं के मद्देनजर ईरानी अधिकारियों ने राजधानी तेहरान और अन्य प्रमुख शहरों में सड़कों, हवाई क्षेत्र (एयरस्पेस) और तमाम सार्वजनिक गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर दिया था। अपने नेता को अंतिम विदाई देने के लिए सड़कों पर भारी संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ा।
अयातुल्ला अली खामेनेई को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जा रहा है जिसने दशकों तक बेहद कड़े नियंत्रण के साथ देश की कमान संभाली और पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इजराइल के खिलाफ ईरान के रुख को बेहद सख्त बनाए रखा।
अयातुल्ला अली खामेनेई का जीवन परिचय: एक मदरसे के छात्र से ईरान के सर्वोच्च नेता बनने तक का सफर
अयातुल्ला अली खामेनेई आधुनिक इतिहास में मध्य पूर्व (Middle East) के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजनेताओं में से एक रहे हैं। उन्होंने लगभग 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) के रूप में देश की कमान संभाली। उनका जीवन राजनीतिक संघर्षों, इस्लामी क्रांति और पश्चिमी देशों के साथ लगातार टकराव से भरा रहा।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
अली हुसैनी खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के पवित्र शहर मशहद में हुआ था। वह एक रूढ़िवादी धार्मिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता एक मौलवी थे, इसलिए खामेनेई का झुकाव बचपन से ही धार्मिक शिक्षा की ओर था। उन्होंने मशहद और बाद में शिया धर्म के सबसे बड़े केंद्र 'कोम' (Qom) के मदरसों से इस्लामी शिक्षा प्राप्त की। कोम में ही वे इस्लामी क्रांति के जनक अयातुल्ला रुहोल्लाह खमेनी के संपर्क में आए, जिन्हें वे अपना गुरु मानते थे।
शाह के शासन का विरोध और जेल यात्राएं
1960 और 1970 के दशक में खामेनेई ईरान के तत्कालीन शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी के पश्चिमीकरण और तानाशाही शासन के मुखर विरोधी बन गए। शाह की खुफिया एजेंसी 'सावाक' (SAVAK) ने उन्हें सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए कई बार गिरफ्तार किया और जेल में डाला। इन जेल यात्राओं के दौरान उन्हें भारी प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने शाह के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।
1979 की इस्लामी क्रांति और राजनीति में उदय
1979 में जब शाह का शासन उखड़ गया और अयातुल्ला खमेनी के नेतृत्व में 'इस्लामी क्रांति' सफल हुई, तब अली खामेनेई नई सरकार के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। वह रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने तेहरान के जुम्मे की नमाज के इमाम के रूप में कार्य किया, जिससे उनकी जनता पर पकड़ मजबूत हुई।
जानलेवा हमला (1981): जून 1981 में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान एक टेप रिकॉर्डर में छिपे बम से उन पर जानलेवा हमला हुआ। इस हमले में वह बाल-बाल बचे, लेकिन उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए पैरालिसिस (लकवाग्रस्त) हो गया।
ईरान के राष्ट्रपति (1981-1989)
अक्टूबर 1981 में खामेनेई भारी बहुमत से ईरान के तीसरे राष्ट्रपति चुने गए। वह इस पद पर बैठने वाले पहले धर्मगुरु (मौलवी) थे। उनके राष्ट्रपति रहते हुए ही ईरान ने इराक के साथ 8 साल लंबा और खूनी युद्ध (1980-1988) लड़ा, जिसमें उन्होंने सेना का मनोबल बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई।
सर्वोच्च नेता के रूप में 37 साल का शासन (1989-हालिया मृत्यु)
3 जून 1989 को इस्लामी क्रांति के संस्थापक अयातुल्ला खमेनी के निधन के बाद, 'विशेषज्ञों की परिषद' (Assembly of Experts) ने अली खामेनेई को ईरान का नया 'सर्वोच्च नेता' चुना। ईरान के संविधान के अनुसार, सर्वोच्च नेता का पद राष्ट्रपति से ऊपर होता है और सेना, न्यायपालिका व विदेश नीति पर उसी का अंतिम नियंत्रण होता है।
कट्टर पश्चिम-विरोधी नीति: खामेनेई ने अपने पूरे कार्यकाल में अमेरिका और इजराइल के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने अमेरिका को "महान शैतान" और इजराइल को एक "कैंसर की गांठ" करार दिया।
परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध: उनके नेतृत्व में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया, जिसके कारण अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों के बावजूद खामेनेई ने कभी पश्चिमी देशों के सामने घुटने नहीं टेके।
क्षेत्रीय प्रभाव (रजिस्टेंस फ्रंट): उन्होंने मध्य पूर्व में 'एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस' (जिसमें हिजबुल्लाह, हमास और हूथी विद्रोही शामिल हैं) को मजबूत किया, ताकि क्षेत्र में अमेरिकी और इजराइली प्रभाव को चुनौती दी जा सके।
घरेलू नीतियां: देश के भीतर उन्होंने इस्लामी कानूनों को कड़ाई से लागू रखा। कई बार उनके शासन के खिलाफ देश में हिंसक प्रदर्शन भी हुए (जैसे 2009 और 2022 के विरोध प्रदर्शन), लेकिन उन्होंने कड़े नियंत्रण के साथ अपनी सत्ता को बनाए रखा।
दशकों तक ईरान को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले और मध्य पूर्व की राजनीति की दिशा तय करने वाले अयातुल्ला अली खामेनेई का सफर 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हवाई हमलों के साथ समाप्त हो गया, जिसके बाद उन्हें उनके जन्मस्थान मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
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