By अभिनय आकाश | Jul 15, 2026
कोई खुफिया एजेंसी कितनी दुस्साहसी हो सकती है? दुश्मन देश में जासूस भेज देगी। ऑपरेशन कर देगी, राज चुरा लेगी। इससे ज्यादा कुछ आपके दिमाग में आ रहा है क्या? लेकिन दुनिया में एक एजेंसी है जो हर बार ऐसा कुछ करती है कि गेम एक नए लेवल पर चला जाता है। हम मोसाद की बात कर रहे हैं। वही मोसाद जो पेजर में बम छुपा देती है और महीनों बाद उसे डेटोनेट करती है। अगले ही दिन वायरलेस सेट में धमाका करती है, उसका भी किसी को अंदेशा नहीं होता। लेकिन क्या आप ये कल्पना कर सकते हैं कि किसी देश का पूर्व राष्ट्रपति अपने ही दुश्मन देश का एजेंट बन जाए। ये कहानी ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की है। अमेरिका के एक बहुत बड़े अखबरा द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ये दावा किया है कि अहमदीनेजाद को इजरायल ने अपने जासूस की तरह इस्तेमाल किया। महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति थे। उस दौरान वो ईरान के सबसे कट्टर नेताओं में गिने जाते थे। जब वो राष्ट्रपति थे तो अक्सर इजरायल के खिलाफ बड़े बड़े बयान दिया करते थे। इजरायल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताते थे। उन्हीं के शासनकाल में ईरान ने अपना यूरेनियम प्रोग्राम शुरू किया था। जिसके बाद दुनिया के कई देशों को शक हुआ कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। उस समय ऐसा लगता था कि उन्हें इजरायल से सबसे ज्यादा नफरत है। लेकिन ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को लेकर अब सबसे बड़ा ट्विस्ट आया है कि वही राष्ट्रपति पद से हटने के बाद से इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे। यानी वो मोसाद के एजेंट बन गए थे।
अहमदीनेजाद 2005 से 2013 यानी दो टर्म्स के लिए ईरान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। चार-चार साल का वहां कार्यकाल होता है। ईरानी सिस्टम में एक शख्स दो टर्म्स तक राष्ट्रपति रह सकता है। इसके बाद उसे न्यूनतम एक साल का गैप देना होता है। लगातार तीन नहीं लड़ सकते। 2017 में जब अहमदीनेजाद पर्चा भरते हैं तो कानूनी रूप से सही थे। अगर उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी मिलती तो उनका सामना सर्विंग प्रेसिडेंट हसन रूहानी से होता। अब रूहानी जो थे अलोकप्रिय नहीं थे। रिजीम की ही पसंद के थे। लेकिन रूहानी और अहमदन एजाद के बीच अगर पॉपुलैरिटी कॉन्टेस्ट होता तो कौन जीतता ईरान में हर कोई जानता था। इसके बाद अहमदीनेजाद 2021 में चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं। जब रईसी जीतते थे। खामनेई की अनुमति उन्हें नहीं मिली। रईसी की असल में मृत्यु हो जाती है तो 2025 में फिर चुनाव होते हैं। तो एक बार फिर अहमदीनेजाद पर्चा भरना चाहते हैं। लेकिन रहबर साथ नहीं देते। यहां तक आते-आते अहमदन इजाज समझ जाते हैं कि खामनेई अपने जीते जी उन्हें प्रेसिडेंट बनने नहीं देंगे और अब अगर उन्हें सत्ता हासिल करनी है तो कोई दूसरा तरीका अपनाना होगा।
मोसाद के इस ऑपरेशन की शुरुआत साल 2022 के आसपास हुई। मोसाद को लग रहा था कि अहमदीनेजाद ईरानी सत्ता से नाराज है और दोबारा देश की कमान संभालना चाहते हैं। फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइली अधिकारियों का मानना था कि अहमदीनेजाद की ईरान के कामकाजी और कम कमाई वाले लोगों के बीच अब भी पकड़ है। ऊपर से वह ईरान के पुराने पॉलिटिकल स्ट्रक्चर का जाना माना चेहरा भी थे। ऐसे में अगर ईरान की मौजूदा सत्ता गिरती तो उन्हें नए नेता के तौर पर सामने लाया जा सकता था। यह अपने आप में एक बहुत हैरान करने वाली एक योजना थी। जिस नेता ने खुद के राष्ट्रपति रहते हुए इजराइल को कभी मुंह नहीं लगाया, उसी नेता को इजराइल अपना एजेंट बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन मोसाद का मकसद सिर्फ खुफिया जानकारी हासिल करना नहीं था। क्योंकि खुफिया जानकारी के लिए मोसाद इतना बड़ा रिस्क नहीं लेता। उसका असली मकसद ईरान की गद्दी पर अहमदीनेजाद को बैठाना था। अब मोसाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अहमदीनेजाद से बात कैसे हो और उसके लिए मुनासिब जगह क्या होगी? इसके लिए हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट को चुना गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 की शुरुआत में हंगरी सरकार के एक आला अधिकारी ने लुडोविका यूनिवर्सिटी ऑफ पब्लिक सर्विस के रेक्टर गिरगली डेली से संपर्क किया। उनसे क्लाइमेट चेंज पर एक कॉन्फ्रेंस करने और उसमें अहमदीनेजाद को बुलाने के लिए कहा गया। लेकिन यह कॉन्फ्रेंस केवल एक दिखावा था। असली मकसद था अहमदीनेजाद और इजराइली खुफिया अधिकारियों के बीच सीक्रेट मीटिंग करवाना। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक मोसाद के तत्कालीन चीफ डेविड बर्निया खुद अहमदीनेजाद से मिलने बुडापेस्ट पहुंचे। दावा है कि अहमदीनेजाद के स्पोक्सपर्सन और करीबी इलाय अली अकबर जवनफेकर को इजराइल की ओर से कई अंडर दी टेबल पेमेंट्स भी किए गए। इजराइली अफसरों ने अहमदीनेजाद की ट्रिप्स और स्टे का खर्च तक उठाया। इसके बाद उनके खेमे और मोसाद के अफसरों के बीच और भी कई मुलाकातें हुई।
कुछ मीडिया रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि अहमदीनेजाद ने पिछले कुछ सालों में अपनी पुरानी कट्टर छवि को बदलने की भी कोशिश की। उन्होंने अंग्रेजी सीखी, अपने पहनावे और पब्लिक इमेज में बदलाव किया। यहां तक कि ईरानी सत्ता की पॉलिसीज को क्रिटिसाइज करना भी शुरू किया। इजराइली खुफिया अधिकारियों को कथित तौर पर यह लग रहा था कि इस इमेज के साथ अहमदीनेजाद को आगे चलकर ईरान के एक नए लीडर के तौर पर पेश किया जा सकता है। लेकिन इस कहानी में सबसे ड्रामेटिक फेस फरवरी 2026 में आया। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के घर के प्रेमाइसेस पर इजराइली हवाई हमला हुआ। इसमें उनके सुरक्षाकर्मियों और बख्तरबंद गाड़ी को निशाना बनाया गया। इसके बाद मोसाद के एजेंट कथित तौर पर अहमदीनेजाद को वहां से निकालकर तेहरान के एक सीक्रेट लोकेशन पर ले गए। लेकिन इसके बाद सब कुछ उतना स्मूथ नहीं रहा जैसा पहले था। दावा है कि अहमदीनेजाद इस पूरी कार्यवाही और युद्ध से नाराज हो गए थे। वे कुछ समय बाद उस सीक्रेट लोकेशन से बाहर निकल गए। न्यूयॉर्क टाइम्स ने चार सीनियर ईरानी अफसरों के हवाले से दावा किया गया कि इसके बाद ईरानी आलाकमान को अहमदीनेजाद के इजराइल से नजदीकियों की भनक लग गई थी। जिसके बाद आईआरजीसी की इंटेलिजेंस ब्रांच ने उन्हें हिरासत में लेकर नजरबंद कर दिया।
13 जुलाई को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया है कि खामनेई के साथ विवाद के बाद अहमदीनेजाद अपने विश्वास पात्रों और सलाहकारों से विदेशी मदद के जरिए सत्ता हासिल करने पर बात करते थे। यह बात अखबार को अहमदीनेजाद के ही एक करीबी सहयोगी ने बताई है। अखबार ने एक डिटेल रिपोर्ट छापी जिसका टाइटल है इनसाइड इजराइल सीक्रेट ऑपरेशन टू कल्टीवेट अहमदीनेजाद। इसे मार्क मज़िटी, जुलनी बांस, फरनास फसीही और रन बर्गमन ने मिलकर लिखा है। इसमें दावा किया गया है कि 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया तो उनका लक्ष्य केवल इस्लामिक रिजीम को खत्म करना नहीं था। एक ऐसे व्यक्ति को सत्ता भी सौंपना चाहते थे जो ईरान को अंदर से अच्छी तरह जानता हो। यह व्यक्ति ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद थे। वही अहमदीनेजाद जिन्हें सबसे कट्टर राष्ट्रपतियों में से एक माना जाता है ईरान के जितने हुए इस्लामिक क्रांति के बाद मोसाद ने बाकायदा इसके लिए प्लान बनाया था। कई ऑपरेशंस तैयार हुए थे। हमले के पहले मोसाद के मुखिया और दूसरे अधिकारी अहमदीनेजाद से विदेश में कई बार मिले भी और इस प्लान की पूरी जानकारी सीआईए को भी दी जा रही पर अंततः प्लान फेल हो गया। अखबार का दावा है कि अब इस प्लान के बारे में आईआरजीसी को पता चल चुका है। अखबार की रिपोर्ट से नहीं उससे काफी पहले। इसलिए अहमदीनेजाद ईरान में किसी जगह नजरबंद रखे गए हैं। हालांकि अहमदीनेजाद की तरफ से इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है। गाजा मीडिया पैलेस्टाइन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के दफ्तर ने मोसाद से संपर्क उन्हें भर्ती करने की कोशिश और उनकी नजरबंदी से जुड़े दावों को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया है।