ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?

अली खामनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ हवाई अड्डे से मशहद तक लाया गया। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफ़न) किया गया।
28 फरवरी के बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी शांति दूत बन जाते हैं। कभी दुनिया के सबसे बड़े सेनापति, लेकिन ईरान के मामले में चिट भी मेरी और पट भी मेरी का इरादा रखने वाले ट्रंप की एक न चली। अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध विराम खत्म करके दोबारा हमले की शुरुआत ऐसे समय में की, जब ईरान अयातुल्लाह अली खामनेई को सुपर्द-ए-खाक करने के लिए एक विश्वस्तर का बड़ा आयोजन शुरू कर चुका था। अमेरिकी अखबरा गार्डियन की खबर के अनुसार 6 दिनों के आयोजन में अली खामनेई के तकरीबन 3 करोड़ समर्थकों के शामिल होने की बात सामने आई है। अली खामनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ हवाई अड्डे से मशहद तक लाया गया। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफ़न) किया गया। यह दफ़न एक हफ़्ते से चल रही उस ऐतिहासिक और लंबी शवयात्रा का अंतिम पड़ाव थी, जो ईरान और इराक के सबसे मुकद्दस (पवित्र) धार्मिक केंद्रों तेहरान, कोम, नजफ और कर्बला की गलियों से गुज़रती हुई... आज अपने आखिरी ठिकाने मशहद पहुंची है।
इसे भी पढ़ें: ईरान युद्ध के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ऐसा पोस्ट, मची खलबली!
क्या है मशहद का इतिहास
ईरान का सबसे पवित्र और दूसरा सबसे बड़ा शहर खामनेई का जन्म भी इसी शहर में हुआ था। मशहद देश के उत्तरपूर्वी कोने में पड़ता है। यह तेहरान से करीब 900 किमी दूर है और खुरासान रजवी प्रांत की राजधानी है। यह अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की सीमाओं के काफी करीब है। इसी वजह से सदियों से यह मध्य एशिया और ईरान के बीच सांस्कृतिक यात्रा और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र रहा है। मशहद की आबादी करीब 30 लाख है। लेकिन यहां भीड़ काफी ज्यादा रहती है क्योंकि पर्यटक और तीर्थ यात्री बड़ी संख्या में आते हैं। हर साल दुनिया भर से इतने पर्यटक और तीर्थ यात्री मशहद आते हैं कि कई मौकों पर बाहर से आने वालों की संख्या यहां की मूल आबादी से भी ज्यादा हो जाती है। मशहद का मतलब होता है शहादत की जगह यानी जहां कोई शहीद हुआ हो। शियाओं के आठवें इमाम इमाम रजा यहीं शहीद हुए थे। मशहद पहले सनाबाद नाम की एक बस्ती के रूप में जाना जाता था। इमाम रजा के दफन होने के बाद इसका नाम पड़ा मशद रज़वी जो आगे चलकर सिर्फ मशहद रह गया। इमाम रजा का पूरा नाम अली इब्न मूसा अल रजा था। उनका जन्म 765 ईवी में मदीना में हुआ था। नवीं सदी की शुरुआत में अब्बासी खलीफा अल मामून ने उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया और मदीना से खुरासान बुलाया। लेकिन कुछ समय बाद 818 ईसवी में तूस के पास उनकी मृत्यु हो गई। शिया परंपरा का मानना है कि उन्हें जहर देकर शहीद किया गया था। जबकि कुछ ऐतिहासिक स्रोत इसे स्वाभाविक मृत्यु भी बताते हैं। इसी कारण इस स्थान को मशहद यानी शहादत की जगह कहा जाने लगा। बाद में यहीं उनकी मजार बनी और उसके चारों ओर धीरे-धीरे आज का मशहद शहर विकसित हुआ।
इसे भी पढ़ें: मोजतबा की 15 हजार मिसाइलें तैनात! अगला टारगेट कौन?
ईरान का सबसे मुकद्दस मुकाम
मशहद... जो ईरान में शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल, 'इमाम रज़ा दरगाह' का घर है। यह वही पावन दरगाह है जहाँ शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रज़ा का मक़बरा है जो ईरान की सरज़मीं पर दफ़न होने वाले इकलौते शिया इमाम हैं। ऐसे में इसी पाक दरगाह के साए में अयातुल्ला खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जाना... न सिर्फ बेहद गहरा धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि उनके पूरे जीवन और उनकी विरासत को हमेशा-हमेशा के लिए शिया इस्लाम के इस सबसे पवित्र मुकाम से जोड़ देता है।
ईरान के बड़े नेताओं के लिए दफ़नाने की जगह
इमाम रज़ा श्राइन ईरान की कई जानी-मानी हस्तियों के लिए भी अंतिम विश्राम स्थल बन गया है। 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को वहीं दफ़नाया गया था। इस श्राइन में खामेनेई को दफ़नाए जाने से इस्लामिक रिपब्लिक के नेताओं के लिए एक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण विश्राम स्थल के तौर पर इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।
दफ़नाने में चार महीने से ज़्यादा की देरी क्यों हुई?
इस्लाम में आम तौर पर शव को जल्द से जल्द, अक्सर 24 घंटे के भीतर दफ़ना दिया जाता है। इसलिए खामेनेई के अंतिम संस्कार में हुई देरी बहुत असामान्य थी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनकी हत्या के बाद देश की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अंतिम संस्कार को टाल दिया गया था। खामेनेई की मौत का कारण बने हमले उस समय हुए जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच ज़बरदस्त सैन्य टकराव चल रहा था। अधिकारियों का तर्क था कि हमले के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने से सुरक्षा का गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता था, क्योंकि लाखों शोक मनाने वाले लोग और हमलों की चपेट में आ सकते थे। साथ ही, अधिकारियों को देश के भीतर अशांति का भी सामना करना पड़ रहा था; जहाँ एक तरफ़ उनके समर्थक शोक मना रहे थे, वहीं सरकार-विरोधी समूह उनकी मौत का जश्न मना रहे थे, जिससे सुरक्षा से जुड़ी और चुनौतियाँ पैदा हो गई थीं। जून में एक नाज़ुक युद्धविराम समझौता होने के बाद ही ईरानी अधिकारियों ने देश भर में अंतिम संस्कार के कार्यक्रम आयोजित किए।
इसे भी पढ़ें: भाड़ में गया सीजफायर, धुआं-धुआं हुआ मिडिल ईस्ट, ईरान ने पैट्रियट सिस्टम और ड्रोन बेड़े को उड़ाया
खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था?
इतनी लंबी देरी की वजह से यह अटकलें भी लगने लगीं कि खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था। ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, चार महीने की इस पूरी अवधि के दौरान उनके शव को सुरक्षित और तापमान-नियंत्रित मेडिकल रेफ्रिजरेशन सुविधा में रखा गया था। केमिकल एम्बामिंग (रसायनों से शव को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया) के विपरीत, जिसे आमतौर पर इस्लामी परंपराओं में सही नहीं माना जाता, रेफ्रिजरेशन से शव में कोई बदलाव किए बिना उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। जानकारों का कहना है कि शिया इस्लामी कानून युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे जैसी असाधारण स्थितियों में शव को दफनाने में देरी करने और उसे कोल्ड स्टोरेज में रखने की इजाज़त देता है। इससे ईरानी अधिकारियों को धार्मिक नियमों का पालन करते हुए खामेनेई के शव को सुरक्षित रखने में मदद मिली।
ईरान और इराक में अंतिम संस्कार का जुलूस
खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में सात दिनों तक चलीं और आज मशहद में दफ़नाए जाने से पहले कई शहरों से गुज़रीं।
इस रास्ते में ये जगहें शामिल थीं:
तेहरान, जहाँ मुख्य राजकीय अंतिम संस्कार शुरू हुआ
कोम, जो शिया धार्मिक शिक्षा का ईरान का प्रमुख केंद्र है
इराक में नजफ़ और कर्बला, जो शिया इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर हैं
मशहद, जहाँ इमाम रज़ा दरगाह में खामेनेई को दफ़नाया गया।
मशहद में दफ़नाए जाने के साथ ही, खामेनेई के हफ़्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हो गई।
कोहिनूर को लूटने वाले ने मशहद को बनाई अपनी राजधानी
18वीं सदी में ईरान के बादशाह नादिर शाह जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता था। उसने मशहद को अपनी राजधानी बनाया। नादिर शाह वही बादशाह है जिसने 1739 में दिल्ली पर हमला किया था और कोहिनूर हीरा लूट कर अपने साथ ले गया था। 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा अफगान सेनापति अहमद शाह दुरानी को मिल गया। इसके बाद यह शाह शुजा दुरानी के पास पहुंचा। जिन्होंने सैन्य सहायता और राजनीतिक शरण के बदले कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह को दे दिया था। उनकी मौत के बाद लाहौर की संधि के तहत नाबालिग महाराजा दिलीप सिंह से कोहिनूर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। जहां से यह क्वीन विक्टोरिया के पास पहुंचा और तब से अब तक यह ब्रिटिश शाही खजाने का हिस्सा है।
अन्य न्यूज़














