IREF ने इराक को तीन जहाजों से 1.02 लाख टन Basmati Rice भेजा

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 12, 2026

भारतीय चावल निर्यातकों के संगठन ने पश्चिम एशिया के साथ व्यापार को प्रभावित कर रही जहाजरानी संबंधी बाधाओं, कंटेनर की कमी और बढ़ती लॉजिस्टिक लागत के बीच इराक को तीन बड़े मालवाहक जहाजों से 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की व्यवस्था की है। इसका लक्ष्य माल ढुलाई की लागत में 74 प्रतिशत की कमी लाना है। भारतीय चावल निर्यातक संघ (आईआरईएफ) ने कहा कि सिंगापुर स्थित एक्सिमवाला सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर इस व्यवस्था से माल ढुलाई की लागत करीब 350 डॉलर प्रति टन के कंटेनर परिवहन के प्रस्तावित शुल्क के मुकाबले घटकर लगभग 90 डॉलर प्रति टन रह जाएगी।

आईआरईएफ ने कहा कि इस कार्यक्रम के तहत तीन जहाज इराक के उम्म कसर बंदरगाह जाएंगे। 36,810 टन चावल ले जा रहा जहाज एमवी लामार एस बंदरगाह पहुंच चुका है। यह तीसरे ‘बर्थ’ पर खड़ा है और चावल उतारने का काम शुरू हो गया है।

दो अन्य जहाज एमवी लोलो गेट और एमवी आउटलैंडर को क्रमशः 25,500 टन और 39,900 टन चावल लेकर जाएंगे। यह पहल ऐसे समय में की गई है, जब निर्यातकों को खाड़ी देशों में खेप भेजने के दौरान माल ढुलाई की ऊंची दरों और लॉजिस्टिक संबंधी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र बासमती चावल के लिए भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार है।

आईआरईएफ के हवाले से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान भारत ने पश्चिम एशिया को 45.64 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया, जिसका मूल्य 34,284 करोड़ रुपये था। यह भारत के कुल बासमती चावल निर्यात की मात्रा का करीब 70 प्रतिशत है। गैर-बासमती चावल को भी शामिल करने पर इस क्षेत्र को कुल 56.48 लाख टन चावल का निर्यात किया गया, जिसका मूल्य 39,657 करोड़ रुपये रहा।

फेडरेशन ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के बासमती चावल के लिए पश्चिम एशिया में सऊदी अरब सबसे बड़ा बाजार रहा। वहां 8,324 करोड़ रुपये मूल्य का चावल निर्यात किया गया। इसके बाद ईरान में 6,970 करोड़ रुपये, इराक में 5,583 करोड़ रुपये और संयुक्त अरब अमीरात में 4,132 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल भेजा गया।

इस अवधि में इराक ने भारत से करीब 7.64 लाख टन बासमती चावल आयात किया। यह प्रतिस्पर्धी माल ढुलाई लागत और भरोसेमंद आपूर्ति मार्ग बनाए रखने के महत्व को दर्शाता है। आईआरईएफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग ने कहा, ‘‘पश्चिम एशिया भारत के बासमती चावल निर्यात में करीब 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और जहाजरानी की बढ़ती लागत का हमारी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

माल ढुलाई की लागत 350 डॉलर से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करने का लक्ष्य रखकर हम दिखा रहे हैं कि बेहतर लॉजिस्टिक व्यवस्था से भारतीय निर्यातकों और विदेशों में खरीदारों, दोनों को फायदा हो सकता है। हमारा उद्देश्य खाड़ी के अन्य बाजारों के लिए भी इसी तरह के व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य समाधान विकसित करना, भारत के चावल निर्यात को मजबूत करना और पूरी मूल्य श्रृंखला में लाभ बढ़ाना है।’’ माल ढुलाई की लागत घटने से निर्यातकों को अपने लाभ मार्जिन को बचाए रखने और विदेशी बाजारों में कीमतों के लिहाज से प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद मिल सकती है। खासकर उन बाजारों में इसका फायदा हो सकता है, जहां लॉजिस्टिक खर्च चावल की अंतिम कीमत को प्रभावित करता है।

यदि दूसरे बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था अपनाई जाती है, तो कंटेनर की कमी के समय बड़े मालवाहक जहाजों से परिवहन निर्यातकों को एक वैकल्पिक रास्ता मिल सकता है। इस व्यवस्था से मिलने वाला वास्तविक लाभ बड़े मालवाहक जहाजों की नियमित उपलब्धता, बंदरगाह पर माल चढ़ाने-उतारने की लागत, खेप भेजने के कार्यक्रम और अलग-अलग खेपों तथा खरीदारों के लिए बड़े जहाजों से परिवहन की उपयुक्तता पर निर्भर करेगा। यह पहल 23 से 25 अक्टूबर तक नयी दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाले भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन (बीआईआरसी) 2026 से पहले की गई है।

सम्मेलन में ‘जहाजरानी : बड़े जहाज एवं कंटेनर—लाभ मार्जिन बचाना और विवादों को कम करना’ विषय पर एक विशेष सत्र होगा। इसमें माल ढुलाई की लागत, बड़े जहाजों और कंटेनर से परिवहन के बीच अंतर, माल बीमा, बंदरगाहों पर देरी, समुद्री परिवहन अनुबंध और विवादों की रोकथाम पर चर्चा की जाएगी।

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