By अभिनय आकाश | Jul 29, 2026
कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए Gen Z के प्रदर्शनों के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा सुधारों के वादे के साथ ही यह जन-आंदोलन तो थम गया, लेकिन भारत भी दक्षिण एशिया के उन देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है जहाँ छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने सियासी कुर्सी को हिला कर रख दिया। साल 2022 से 2025 के बीच छात्रों के आंदोलन से बांग्लादेश और नेपाल में में सरकारें गिरी, इंडोनेशिया में मंत्रियों की वीआईपी सुविधाएं छीनी गई, कई रिफॉर्म हुए। अब भारत में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी हो गया। लेकिन छात्रों के इन आंदोलनों से अछूता रहा । हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, लेकिन भला क्यों? आखिर श्रीलंका से लेकर भारत तक दक्षिण एशिया को मथ देने वाली यह 'युवा क्रांति' रेडक्लिफ रेखा के उस पार जाकर क्यों थम जाती है? क्यों पाकिस्तान में छात्र आंदोलन उस तरह इतिहास नहीं बदल पा रहे हैं जैसे उसके पड़ोसियों में हुआ? आइए समझते हैं इस खामोशी की असली वजह।
1968 में अयूब खान के दौर में पाकिस्तान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए तो उनमें सबसे आगे नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन था। प्रदर्शन की वजह से एनएसएफ के कई छात्र जेल भी गए। लेकिन इन प्रदर्शनों की वजह से जनरल अयूब खान की सरकार चली गई। इसलिए बाद में जाकर जब जिया उल हक की सरकार आई तो उन्होंने कोई रिस्क ही नहीं लिया। पहले तो एनएसएफ को बैन किया। इसके अलावा पूरे पाकिस्तान में छात्र राजनीति पर बट्टा लगा दिया गया। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में स्टूडेंट यूनियन पर बैन लग गया। ये बैन आज तक लगा हुआ है।
दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों के उलट, पाकिस्तान में छात्र राजनीति की कोई मज़बूत परंपरा नहीं है। यह भारत और बांग्लादेश जैसे देशों से बिल्कुल अलग है, जहाँ बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपने असरदार छात्र और युवा संगठन बनाए रखती हैं। ये संगठन राजनीतिक गतिविधियों को संगठित और सक्रिय करने का काम करते हैं और हाल के युवा-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में इन्होंने अहम भूमिका निभाई है। माइकल कुगेलमैन के अनुसार, इसकी जड़ें काफी हद तक जनरल ज़िया-उल-हक के सैन्य शासन की विरासत से जुड़ी हैं, जिसने छात्र राजनीति पर रोक लगा दी थी। उन्होंने एक्स पर लिखा जनरल ज़िया ने 1980 के दशक में छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया था और ज़्यादातर मामलों में उन्हें फिर से बहाल नहीं किया गया है। पाकिस्तान में युवाओं की बड़ी आबादी और एक्टिविज़्म में छात्रों/युवाओं की अहम भूमिका को देखते हुए, उस प्रतिबंध के असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि इस प्रतिबंध से पहले पाकिस्तान में छात्र राजनीति खूब फल-फूल रही थी। 1968-69 के बड़े जन-आंदोलन में छात्र समूह सबसे आगे थे; इस आंदोलन के कारण राष्ट्रपति अयूब खान को महीनों तक चले देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था। हालाँकि, ज़िया के शासनकाल में छात्र यूनियनों को दबाने की कार्रवाई एक अहम मोड़ साबित हुई, जिससे राजनीतिक लामबंदी के केंद्र के तौर पर कैंपस की भूमिका कमज़ोर पड़ गई। तब से, पाकिस्तान में युवाओं के नेतृत्व वाले बहुत कम देशव्यापी आंदोलन हुए हैं। एक उल्लेखनीय अपवाद 'स्टूडेंट्स सॉलिडैरिटी मार्च' था, जो 2018 से 2022 के बीच हर साल आयोजित किया गया। इसमें छात्र यूनियनों को बहाल करने और छात्रों को ज़्यादा अधिकार देने की मांग की गई थी। कार्यकर्ताओं की बार-बार की मांगों के बावजूद, छात्र यूनियनों पर प्रतिबंध ज़्यादातर बना हुआ है। नतीजतन, पाकिस्तान में उस तरह के संगठित कैंपस नेटवर्क का अभाव है, जिन्होंने दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में युवा आंदोलनों को मज़बूती दी है।
पाकिस्तान की सत्ता को चुनौती देने वाले विरोध आंदोलनों की कोई कमी नहीं है। बलूचिस्तान में, कार्यकर्ताओं ने ज़्यादा प्रांतीय स्वायत्तता, ज़बरदस्ती लोगों को गायब करने की प्रथा को खत्म करने और प्रांत की विशाल खनिज संपदा में उचित हिस्सेदारी की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किए हैं, हालांकि उनके अभियान अक्सर लंबे समय से चल रहे हिंसक बलूच विद्रोह की वजह से दब जाते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में अशांति की लहर देखी गई है। इस कमेटी ने बिजली की बढ़ती कीमतों से लेकर शरणार्थियों के लिए विधानसभा में 12 सीटें आरक्षित करने जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। हालांकि, अहम फ़र्क यह है कि ये आंदोलन ज़्यादातर अपने-अपने इलाकों और मुद्दों तक ही सीमित रहे हैं। पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों में युवाओं के नेतृत्व में हुए आंदोलनों के उलट, ये आंदोलन एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन में नहीं बदल पाए हैं जो इस्लामाबाद को चुनौती दे सके। पाकिस्तान के कई युवा भी इसी बात से सहमत हैं। बीबीसी उर्दू से बात करते हुए, एक युवा ने कहा कि भारत में CJP के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों से सबसे बड़ी सीख यह मिली कि प्रदर्शनकारी एक साझा मकसद के लिए एकजुट हो सकते हैं। पाकिस्तान में छात्रों, कंटेंट क्रिएटर्स और यहां तक कि अखबारों के संपादकीय लेखों ने भी CJP के नेतृत्व वाले Gen Z आंदोलन की तारीफ़ की है, जिसके कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर भी, युवाओं को एकजुट करने में सक्षम मज़बूत संगठनों की कमी और पाकिस्तान के मौजूदा विरोध आंदोलनों के एक संयुक्त मोर्चे के रूप में एकजुट होने में असमर्थ या अनिच्छुक होने के कारण, ऐसा नहीं लगता कि देश की Gen Z उस तरह के युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों को दोहरा पाएगी जिन्होंने बाकी दक्षिण एशिया को हिलाकर रख दिया है।
हाल ही में साउथ एशिया में हुए सभी प्रदर्शन नेपाल में बांग्लादेश में, श्रीलंका में इन सब का जो संदर्भ था वो अलग-अलग था। जैसे नेपाल में करप्शन का मुद्दा सबसे बड़ा था। जब सोशल मीडिया में मंत्रियों के बच्चों की आलीशान जिंदगी दिखने लगी तो सरकार ने सोशल मीडिया ही बैन कर दिया। फिर आंदोलन भड़का और हिंसा के बाद वहां सरकार गिरी नेपाल में। बांग्लादेश में सरकारी नौकरी में शेख हसीना ने सेना से जुड़े हुए सेना के जो बच्चे थे उनको रिजर्वेशन दे रही थी। इसलिए आम छात्रों ने इसका विरोध किया और जब प्रदर्शनकारियों पर क्रैक डाउन हुआ तो हिंसा भड़क गई और फिर शेख हसीना की भी वहां से सरकार चली गई। उसी तरह इंडोनेशिया में सरकार के मंत्रियों के वीआईपी प्रोटोकॉल पर उनके वीआईपी कल्चर पर पाबंदी लगाने के लिए छात्रों ने प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के बाद सरकार ने कई बदलाव किए और वहां पे उनकी मांगे मानी गई और भारत का उदाहरण तो आप जानते ही हैं कि नीट पेपर लीक में सरकार की जवाबदेही मांगी गई और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा गया। यानी इन सभी देशों में आप देखिए कि आंदोलन की जो वजह है वो आपको अलग-अलग मिलेंगी। जबकि जो आंदोलन अतीत में हुए और एक दूसरे को इंस्पायर किया।
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में प्रदर्शन होने की कोई वजह ही नहीं है। वहां की अर्थव्यवस्था कई बरस से वेंटिलेटर में है। आईएमएफ के इंजेक्शन से वो सर्वाइव कर रही है। शिक्षा व्यवस्था का भी यही हाल है। चुनाव फेयर नहीं है। सेना के इशारे पर सब कुछ चल रहा है। यहां तक कि न्यायपालिका पर भी वहां सवालों के घेरे में उसे लिया जा रहा है। यानी मुद्दे पर्याप्त हैं प्रदर्शन करने के लिए। लेकिन सेना वहां के लोगों को आंदोलन खड़े करने का मौका ही नहीं देती है। आपने इमरान खान, गजा, ईरान या किसी पश्चिमी देश में हुई किसी घटना के खिलाफ पाकिस्तान में प्रदर्शनों के बारे में तो सुना होगा। लेकिन शिक्षा व्यवस्था या रोजगार पर प्रदर्शन के बारे में अक्सर वहां से कोई ऐसी घटना या ऐसी कोई खबर सुनाई नहीं देती है क्योंकि वहां के आम लोग इस तरह के मुद्दों में पड़ना ही नहीं चाहते हैं। वो सीधी वजह है क्योंकि वहां की सेना क्रैक डाउन कर देती है। आखिरी बार अक्टूबर 2025 में कराची में बढ़ती महंगाई और कम वेतन की वजह से कई संगठन इकट्ठे हुए थे। इनमें सिंध एंप्लाइज एयंस एसईए सबसे आगे था। लेकिन क्या हुआ? वहां भी आंदोलन को दबा दिया गया। ईरान, गजा या पश्चिमी देश में हुई घटना पर भी जब आंदोलन होते हैं तो उन्हें भी सरकार कुचल देती है। जब पाकिस्तान ट्रंप के गजा पीस प्लान में शामिल हुआ था तब तहरीकलबैक पाकिस्तान ने एक हाईवे ही बंद कर दिया था। अंत में क्या हुआ? हिंसा हुई। इसी तरह ईरान के मुद्दे पर प्रदर्शन जब बहुत बढ़ने लगे तो आसिम मुनीर ने ये कह दिया कि जिन्हें ईरान से ज्यादा प्यार है वो ईरान ही चले जाएं। इस आंदोलन को भी कुचल दिया गया।
जो प्रदर्शन आंदोलन में बदल भी पाए हैं उन्हें मेन स्ट्रीम पॉलिटिक्स और मेन स्ट्रीम मीडिया से ही साइडलाइन कर दिया गया। बलूचिस्तान और पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर यानी पीओके का उदाहरण ही देख लीजिए। बलूचिस्तान में कई बरसों से प्रदर्शन चल रहे हैं। वहां लोगों की मांग यह है कि उन्हें भी पाकिस्तान के दूसरे शहरियों की तरह यानी पंजाबियों की तरह सिंधियों की तरह अधिकार मिले। जो गैस बलोचिस्तान से निकाली जाती है वो पहले कराची तक पहुंच जाती है। लेकिन बलोच लोगों को लकड़ी जलाकर चूल्हे में खाना बनाना क्यों पड़ता है? उसी तरह पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर पीओके में प्रदर्शन जो है वो महंगाई को लेकर बहुत लंबे वक्त से चल रहे हैं। और अब इलेक्शन में रिफॉर्म की मांग भी वहां की जा रही है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में जबरदस्त बवाल चल रहा है। खबरें हैं कि पाकिस्तानी सेना की गोलियों में 14 आम लोग मारे गए हैं। लगभग पूरे पीओके में घेराबंदी है। कम्युनिकेशन ब्लैकआउट है। इंटरनेट नदारद है। चौक चौराहों पर सिर्फ सुरक्षा बलों की बंदूके दिखाई दे रही हैं। पैरामिलिट्री फोर्स बुलाई गई है। दूसरे सूबों से पुलिस के दस्ते मंगाए जा रहे हैं। पाकिस्तान के 14,000 रेंजर्स सड़कों पर कश्त कर रहे हैं। लेकिन यह सब किसी दंगे या हंगामे की वजह से नहीं हो रहा। यह सब वहां के चुनाव की तैयारियों का हिस्सा है। पीओके में चुनाव शुरू हो चुके हैं। पहले चरण के नतीजे भी आ गए हैं और चुनाव का विरोध करने वालों पर पाकिस्तान की पुलिस फायरिंग कर रही है। 28 जुलाई को पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में पहले फेस के चुनाव के नतीजे घोषित हुए। 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर हुए चुनाव में नौ पर नवाज शरीफ की पीएमएलएन पार्टी ने जीत दर्ज की। जबकि चार सीटों पर भुट्टो परिवार की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी पीपीपी ने जीत दर्ज की। पाकिस्तान की सत्ता में इस वक्त इन दोनों पार्टियों ने मिलकर गठबंधन की सरकार बना रखी है। नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन पीओके में यह दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। वोटिंग के दौरान हिंसा की खबरें भी सामने आई।