क्या नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक, प्रशासनिक व राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है?

By कमलेश पांडे | Apr 15, 2026

हमारे देश के राजनेता भले ही चुनावों के दौरान दलित-महादलित-आदिवासी, ओबीसी-ईबीसी, अल्पसंख्यक-पसमांदा और गरीब सवर्ण आदि से जुड़े सामाजिक न्याय सम्बन्धी तरह-तरह की बातें करते हैं, ममनगढ़ंत आंकड़े गिनाते/बताते हैं, लेकिन उनकी नाक के नीचे श्रमजीवियों का अंतहीन शोषण होता रहता है, जिससे उनका मुंह फेरे रहना या फिर किसी बड़े आंदोलन के बाद सक्रिय होना उनके नेतृत्वकारी भूमिका पर सवाल उठाता है।

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यक्ष प्रश्न यह कि जिस देश में महंगी शिक्षा, महंगा स्वास्थ्य और खर्चीला शहरी जीवन का बोलबाला हो, वहां पर निजी क्षेत्र के असमान वेतन स्तर के लिए हमारे नीति निर्माता जिम्मेदार नहीं हैं तो कौन है, वही बताएं। विपक्ष का काम संसद में, विधान मंडल में इन्हीं पहलुओं पर तर्कसंगत बहस करना है, लेकिन वह भी नीतिगत नकारापन का शानदार नमूना बन चुका है। दिलचस्प तो यह कि पहले सत्ताधारी यूपीए के वक्त एनडीए विपक्ष में था और अब सत्ताधारी एनडीए के वक्त यूपीए/इंडिया गठबंधन विपक्ष में है। 

चूंकि दोनों पूंजीवादी गठबंधन हैं और अपने आर्थिक मोहपाश में जनोन्मुखी समाजवादी व वामपंथी सियासत को बांध चुके हैं, जिससे सबकुछ गड्डमड्ड हो चुका है। कहीं जातिवाद, कहीं क्षेत्रवाद और कहीं सम्प्रदायवाद के नाम पर परस्पर बंटी हुई जनता को अपनी मौलिक जरूरतों का एहसास ही नहीं है।

काबिलेगौर है कि शहरों/महानगरों या गांवों में जो आमतौर पर वेतन स्ट्रक्चर होता है, उससे कोई युवा या वयस्क अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का सम्यक निर्वहन कर सकता है क्या? जवाब होगा- संभव नहीं! कोढ़ में खाज यह कि तरह तरह के मित्रों- शिक्षा मित्र, स्वास्थ्य मित्र आदि के मार्फ़त सरकारी क्षेत्र भी इन्हीं पूंजीवादी मानसिकता को तरजीह देता आया है, जिस पर उदार हृदय से बहस करने और भारतीयों के जीवन स्तर को सुधारने की जरूरत है। 

सवाल है कि जिन शहरों में फ्लैट्स या जमीन की कृत्रिम कीमतें आसमान छूती हों, वहां के दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी, अंशकालिक/पूर्णकालिक श्रमिकों के वेतनमान, और भारतीय कानूनों से अधिकारियों/उद्योगपतियों के खिलवाड़ से पूरी श्रम व्यवस्था विस्फोटक कगार पर खड़ी है। शहरों में बढ़ता झुग्गी-झोपड़ी कल्चर किसी नैतिक महामारी जैसा प्रतीत होता है।

सुलगता सवाल है कि निजी क्षेत्र में कितने लोगों को नियुक्ति पत्र, पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी, सामूहिक स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा और पेंशन आदि की सुविधाएं निजी कम्पनियों में मिलती है। प्रोपर्टी इंडस्ट्री की तरह आधा ब्लैक सैलरी और आधा व्हाइट सैलरी वाली आंखों में धूल झोंकने वाली व्यवस्था से खुफिया तंत्र अनजान क्यों है? सरकारी क्षेत्रों की तरह आवासीय सुविधाओं से निजी क्षेत्र के श्रमिकों को वंचित क्यों रखा जाता है? नौकरी बाजार में श्रम ठेकेदार पैदा करने से किसके हित सधते हैं? सवाल अनेक हैं, लेकिन उत्तर एक- राजनीतिक, प्रशासनिक और औद्योगिक सांठगांठ से जारी नीतिगत भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है, जो किसी बड़ी जनक्रांति के बाद ही करवट लेगी।

जरा कल्पना कीजिए कि जब नरेंद्रमोदी सरकार और योगी आदित्यनाथ की सरकार में ऐसी मजदूर विरोधी परिस्थिति है तो पूर्व की सरकारों में कैसा जंगलराज रहा होगा, विचारणीय पहलू है। मजदूर शोषण कांड की एसआईटी और न्यायिक जांच होनी चाहिए, क्योंकि आम भारतीयों के भविष्य के साथ एफडीआई आकर्षित करने के चक्कर में घोर अन्याय हो रहा है, जिससे बचे जाने की जरूरत है।

अब नोएडा में मजदूरों के हिंसक आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ की बात करते हैं। चूंकि नोएडा में मजदूरों का हिंसक आंदोलन वेतन वृद्धि की मांग पर केंद्रित है, जो हरियाणा की 35% न्यूनतम मजदूरी बढ़ोतरी से प्रेरित है। लिहाजा, योगी सरकार को तुरंत इसे लागू करना चाहिए। बताया गया कि यह प्रदर्शन फेज-2 होजरी कॉम्प्लेक्स से शुरू होकर पूरे नोएडा में फैल गया, जहां पेशेवर विपक्षी आंदोलनों के तर्ज ओर तोड़फोड़ और आगजनी हुई।

आंदोलन के पृष्ठभूमि की यदि बात की जाए तो मजदूर न्यूनतम वेतन 20,000 रुपये तक बढ़ाने, बोनस और ओवरटाइम भत्ते की मांग कर रहे हैं। चूंकि हरियाणा से जुड़े एक फैसले ने उत्तर प्रदेश के मजदूरों में असंतोष पैदा किया, क्योंकि यहां अनस्किल्ड वर्कर को 15,000 से कम वेतन मिलता है। यही वजह है कि योगी सरकार ने संवाद के लिए हाई लेवल कमेटी गठित की है और अविलंब इसके निर्णयों को लागू करने की जरूरत है।

जहां तक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं की बात है तो योगी सरकार ने आंदोलन को साजिश, नक्सलवाद या राजनीतिक हाथ बताया, जिससे सहमत होना मुश्किल है, लेकिन आंदोलन के हिंसक होने के दृष्टिगत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गलत भी नहीं हैं। वहीं, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भाजपा की 'पूंजीपति पक्षधर' नीति को जिम्मेदार ठहराया और मजदूर शोषण का आरोप लगाया, जो अतिरेक है। चूंकि कांग्रेस और सपा ने सरकार की आलोचना की, इसलिए केंद्र भी सतर्क है।

इस अप्रत्याशित आंदोलन का प्रमुख निहितार्थ यह है कि यह आंदोलन श्रम नीतियों पर बहस तेज कर सकता है, क्योंकि पड़ोसी राज्यों के फैसलों से अंतरराज्यीय दबाव बढ़ा रहा है। एक तरफ जहां विपक्ष को मजदूर वोट बैंक मजबूत करने का मौका मिला, वहीं दूसरी तरफ भाजपा को कानून-व्यवस्था पर खुद को साबित करने की चुनौती बढ़ी।दिल्ली-एनसीआर में इसके फैलाव का खतरा है, जो आगामी चुनावों में यदि बड़ा मुद्दा बना तो सत्ताधारी भाजपा के लिए 2027 के राज्य विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव में राजनीतिक मुश्किलों का कारण बन सकता है। इसलिए पार्टी के रणनीतिकार समय रहते ही सचेत हो जाएं। इसी में राजनीतिक बुद्धिमानी होगी।

यह कोरा सच है कि नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक-प्रशासनिक-राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है। नोएडा मजदूर आंदोलन 2027 यूपी विधानसभा चुनावों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि यह श्रमिक असंतोष को विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बना रहा है। हालांकि अभी ताजा घटना होने से विश्लेषण अनुमानित हैं, लेकिन राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हो रहा है। इससे विपक्ष को लाभ मिलता प्रतीत हो रहा है, क्योंकि अखिलेश यादव ने इसे भाजपा की 'पूंजीपति नीति' बताकर मजदूरों का समर्थन किया, जो पीडीए (PDA) यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत कर सकता है। इस मामले में कांग्रेस ने भी सरकार को जिम्मेदार ठहराया, और विपक्षी एकता का संकेत दिया। नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक वोट (गौतमबुद्धनगर सीटें) प्रभावित हो सकते हैं।

इससे भाजपा की जमीनी चुनौती बढ़ेगी और हिंदुत्व दम तोड़ देगा, इसलिए योगी सरकार ने वेतन, ओवरटाइम सम्बन्धी निर्देश देकर क्षतिपूर्ति की कोशिश की, लेकिन इसे 'साजिश' बताकर विपक्ष को और हवा मिली। कानून-व्यवस्था का सवाल उठा, जो भाजपा के 'मजबूत सरकार' वाले नैरेटिव को कमजोर करता है। इससे दिल्ली-एनसीआर में आंदोलन के फैलाव से पश्चिम यूपी की सीटें जोखिम में पड़ सकती हैं। वहीं, श्रम मुद्दा, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी से जुड़कर 2027 में प्रमुख हो सकता है, खासकर ग्रेटर नोएडा-जेवर जैसे क्षेत्रों में। इसलिए यदि समाधान न हुआ तो विपक्ष मजबूत, वरना भाजपा इसे 'विकास' के पक्ष में पलट सकती है। कुल मिलाकर, नोएडा रणभूमि बन चुका है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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