क्या सच में यूरेनियम सौंपने को ईरान तैयार? Trump के आगे तेहरान के हथियार डालने की इनसाइड स्टोरी

By अभिनय आकाश | May 25, 2026

मिडिल ईस्ट में जिस तरह की तनावपूर्ण स्थिति थी उससे पूरे दुनिया में तहलका मचा हुआ था। लेकिन अब क्या एक बड़े युद्ध के मुहाने से वापस लौट रहे हैं? क्या वही ईरान जिसने सालों तक अमेरिका के सामने झुकने से इंकार किया। अब अपना सबसे बड़ा हथियार एनरिच्ड यूरेनियम सौंपने को तैयार हो गया है। क्या डोनाल्ड ट्रंप का वो लंबा पोस्ट सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि आने वाले मिडिल ईस्ट के रिश्तों का एक रिसेट का संकेत माना जाए। कहा गया कि ईरान ने अपने हाईली इनरड्ड यूरेनियम का स्टॉक छोड़ने पर हामी भर दी है। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ अमेरिका ईरान के रिश्तों में नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ माना जाएगा। क्योंकि पिछले कई महीनों से हालात ऐसे थे कि कभी भी बड़ा युद्ध छिड़ सकता था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच बहुत जल्द ऐसा समझौता हो सकता है जिससे जंग रुक सकती है और हॉर्मोज स्टेट फिर से पूरी तरह खुल सकता है। आज के एमआरआई में बताएंगे कि आखिर अमेरिका बार-बार ईरान के यूरेनियम पर इतना जोर क्यों दे रहा था? स्टेट ऑफ हॉर्मूस क्यों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या ईरान हकीकत में अपना संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंप देगा? क्योंकि अगर यह डील सच में हो गई तो इसका असर तेल से लेकर भारत से लेकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरीके से पड़ने वाला है।

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अमेरिका और ईरान के बीच बड़े समझौते की तैयारी

अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच जो बड़े समझौते की तैयारी हो रही है उसमें ईरान अपने उस यूरेनियम स्टॉक को छोड़ सकता है जिसे हथियार बनाने के बेहद करीब माना जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले 30 से 60 दिनों में इस पर बातचीत होगी कि ईरान अपने यूरेनियम का क्या करेगा। अभी सिर्फ शुरुआती सहमति बनी है। यानी यह तय नहीं हुआ है कि यूरेनियम देश के बाहर भेजा जाएगा या उसकी क्षमता कम की जाएगी या उसे किसी और तरीके से बेअसर किया जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इसकी टेक्निकल डिटेल्स बाद की न्यूक्लियर मुद्दे पर होने वाली बातचीत में तय होगी। यह बदलाव इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में ईरानी सूत्रों ने दावा किया था कि देश के सर्वोच्च नेता यानी कि मोजतबा खामेनई ने निर्देश दिया था कि यूरेनियम देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के मुताबिक इस समय ईरान के पास करीब 400 किलो यूरेनियम है जिसे 60% तक एनरच किया जा चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के काफी करीब होता है। यूरेनियम को एक प्रक्रिया से गुजारा जाता है जिससे उसमें काम आने वाला हिस्सा बढ़ जाता है। इसे ही यूरेनियम एनरचमेंट कहते हैं। 

यूरेनियम पर टिका पूरा मुद्दा

इजराइल भी लंबे समय से कहता रहा है कि अगर इस यूरेनियम को और एनरिच किया गया तो उससे कई परमाणु बम बनाए जा सकते हैं। यही वजह थी कि बातचीत में सबसे बड़ा अड़ंगा यही मुद्दा बना हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान चाहता था कि यूरेनियम वाला मुद्दा बाद में देखा जाए। लेकिन अमेरिका ने साफ कह दिया था कि शुरुआती समझौते में ही इस पर कम से कम शुरुआती वादा तो किया ही जाना चाहिए। वरना बातचीत खत्म हो सकती है और सैन्य कारवाई फिर से शुरू हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में अमेरिकी सेना ने ईरान के यूरेनियम स्टॉक पर हमला करने के कई विकल्प तैयार किए थे। माना जाता है कि ईरान का काफी यूरेनियम न्यूक्लियर फैसिलिटी के नीचे जमीन के अंदर रखा गया है। इस ठिकाने पर पिछले साल अमेरिकी टॉमहोक मिसाइलों से हमला किया गया था। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने ऐसे बंकर बस्टर बम इस्तेमाल करने का विकल्प भी तैयार किया था जो जमीन के अंदर बने ठिकानों को तबाह कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एक समय पर ट्रंप ने अमेरिका और इजराइल के संयुक्त कमांडो ऑपरेशन पर भी विचार किया था। मकसद था कि ईरान के

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क्या ईरान सच में अपना न्यूक्लियर लेवरेज छोड़ देगा? 

यह अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है और इसी के पीछे अमेरिका बार-बार ईरान के ऊपर दबाव भी बना रहा है। क्योंकि फिलहाल अभी जो यह युद्ध रुका है, यह सिर्फ टेंपरेरी पॉज है। तूफान से पहले की शांति भी इसे कहा जा सकता है। अब आने वाले समय में देखना यह होगा कि किस तरीके से सीज फायर की तरफ बढ़ते हैं। क्या ईरान सच में अपने संवर्धित यूरेनियम को सौंप देगा? क्या अमेरिका जो लंबा चौड़ा पोस्ट लिख रहा है कि अब शायद हो सकता है कि हम बहुत ज्यादा क्लोज टू सीज फायर की डील पर पहुंच चुके हैं। वो हकीकत है। इन सारी बातों को देखना होगा। ये परिस्थितियां भारत के लिए भी बुरी हैं। इकॉनमी की रफ्तार को बनाए रखने के लिए ईंधन चाहिए, जिसके लिए भारत बुरी तरह से आयात पर निर्भर है। पेट्रोल-डीजल की खरीद में विविधता के बावजूद संकट महसूस हो रहा है, और तभी पिछले कुछ अरसे में तीन बार दाम बढ़ाने पड़े हैं।

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