By अभिनय आकाश | Jul 24, 2026
आज बात उस सवाल की, जिसने देश के लाखों छात्रों और युवाओं के दिल में एक कसक छोड़ दी है। लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांगचुक जिन्होंने नीट (NEET) के छात्रों की आवाज़ बनकर 26 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं उठाया, जब उन्होंने मंत्रियों से मुलाकात के बाद अपना अनशन तोड़ा... तो जश्न की जगह सन्नाटा और सवालों का बवंडर खड़ा हो गया! अजीबोगरीब मोड़ देखिए जो लोग 26 दिन से सोनम वांगचुक को कोस रहे थे, आज वही उन्हें ‘महान’ और ‘समझदार’ बता रहे हैं। जो छात्र, जो समर्थक कल तक उनके नाम का नारा लगा रहे थे, आज वही दबी ज़ुबान में पूछ रहे हैं- सोनम सर, ये क्या कर दिया? क्या यह बेवफ़ाई है? तो आज सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही है-क्या सोनम वांगचुक ने छात्रों का भरोसा तोड़ा या फिर उन्होंने दूरदर्शिता और समझदारी दिखाई? क्या सोनम सच में बेवफ़ा हैं... या फिर आंदोलन की बाज़ी पलटने वाले सबसे समझदार खिलाड़ी? आइए, आज के एमआरआई में इसी गुत्थी की इनसाइड स्टोरी से पर्दा उठाते हैं।
अपनी मांगों को लेकर साफ शब्दों में गुजारिश कर रहे थे। यह सोचकर कि सरकार उनकी सुनेगी। लेकिन जुलाई के आखिरी हफ्ते तक आते-आते इस शांतिपूर्ण प्रतिरोध की तस्वीर अचानक बदल गई। पुलिस और छात्रों के बीच खूनी झड़पें हुई। मीडिया के कैमरे तोड़े गए और पुलिस की गाड़ियों पर तलवारें लहराई गई। सीजेपी का आंदोलन 6 जून को शुरू हुआ था। 28 जून को सोनम वांगचुक के अनशन पर बैठने के साथ ही इसे एक मजबूत नैतिक केंद्र मिल गया। लेकिन सरकार ने हफ्तों तक इन छात्रों की कोई सुध नहीं ली। कोई बातचीत का दरवाजा नहीं खोला गया। इसके उलट 18 जुलाई को पुलिस ने वाकचुक को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल पहुंचा दिया। जब आप एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मांग को पुलिस के बूटों तले कुचलने की कोशिश करते हैं तो सड़क पर गुस्सा फटना तय हो जाता है। 20 जुलाई को चलो संसद मार्च के दिन हालात बेकाबू हो गए। 1400 पुलिसकर्मियों की घेराबंदी, बैरिकेड्स और आंसू गैस के गोलों ने दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया। दर्जनों छात्रों के सर फूटे। जब सत्ता संवाद के बजाय डंडे की भाषा बोलती है तो भीड़ का सब्र भी जवाब दे देता है।
23 जुलाई की आधी रात के कुछ देर बाद, वांगचुक ने 26 दिनों से चल रहा अपना अनशन खत्म किया। राजधानी के मेदांता अस्पताल का एक वीडियो दिखाता है कि यह सब कैसे हुआ। केंद्रीय मंत्री नड्डा और सिंह का हाथ थामे हुए वांगचुक ने कहा कि अपना अनशन खत्म करके मैं आभारी और खुश हूँ। धन्यवाद। फिर अपनी पत्नी की ओर मुड़कर उन्होंने कहा गीतांजलि हमेशा मेरे साथ रही हैं। मैं आपको धन्यवाद नहीं देना चाहता, बल्कि अपनी भावनाएं ज़ाहिर करना चाहता हूँ। बाद में जेपी नड्डा वांगचुक को सरकार के आश्वासन पढ़कर सुनाते हुए दिखे। मंत्री ने कहा कि सरकार दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और 20 जुलाई, 2026 को संसद तक मार्च में शामिल होने वालों के खिलाफ़ केस दर्ज न करने को लेकर सकारात्मक है। सरकार पहले ही बातचीत के ज़रिए पेपर लीक और परीक्षाओं से जुड़े शिक्षा सुधारों का समाधान निकालने का भरोसा दे चुकी है। इसके अलावा, सरकार हाल ही में हुए NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वालों के परिवारों को उचित मुआवज़ा देने पर भी सकारात्मक रूप से विचार कर रही है। खास बात यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का कोई ज़िक्र नहीं किया गया, जो 28 जून को भूख हड़ताल शुरू करते समय वांगचुक की शुरुआती मांग थी।
इस प्रोटेस्ट को और ज्यादा मजबूती तब मिली जब सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। एक तरह से कहें तो उस दिन के बाद सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट की रीड बन गए थे। क्योंकि सोनम वांगचुक के जुड़ने के बाद वो लोग भी इस प्रोटेस्ट में आए जो दरअसल पर्यावरण को बचाने की देख रखते हैं। एक गंभीरता उन्होंने गंभीरता उन्होंने दे दी इस प्रोटेस्ट को। मगर लंबे वक्त के बाद अब लगभग 26 दिन के अनशन के बाद भूख हड़ताल के बाद। अब उन्होंने मतलब जूस पिया वो भी जेपी नड्डा के हाथ से। जेपी नड्डा के हाथ से इस इस वजह से जरूरी हो जाता है क्योंकि उसी सरकार के खिलाफ यह लोग लगातार आवाजें उठा रहे थे। इस मुलाकात का एक वीडियो जारी होता है। जिसमें स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा सोनम वांगचुक को जूस पिला रहे हैं। सिर्फ जेपी नड्डा ही वहां पर नहीं होते बल्कि सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय में जो राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की भी मौजूदगी होती है। सरकार ने बताने की कोशिश की कि पीएमओ से भी एक मिनिस्टर को भेजा गया है। जेपी नड्डा भी अंग्रेजी में अपनी बात रख रहे हैं और सोनम मानचुक भी अपनी बात को अंग्रेजी में ही रखा है। तो कुछ दो ढाई मिनट का वीडियो है। दोनों साइड्स का जहां वो सेटिस्फेक्शन खोजना चाहती थी वो आपको सुनने को मिल जाएगा। जेपी नड्डा भरोसा दिलाते हैं कि सरकार पॉजिटिव है। मतलब सरकार की नियत है कि जो जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट जो पीसफुल कर रहे थे उनके खिलाफ हम मुकदमा नहीं लिखने जा रहे हैं। उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि हम पॉजिटिव हैं। मतलब हम यह करेंगे। उसके बाद उन्होंने कहा कि जिन्होंने 20 तारीख को मार्च किया उन पर भी मुकदमे या कोई पनिटिव एक्शन ना हो उसे लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। जेपी नड्डा ये भी कहते हैं कि जो विक्टिम ऑफ पेपर लीक जिन बच्चों ने अपना जीवन समाप्त किया नीट पेपर लीक होने के बाद में रीट से पहले 20 बच्चे हैं। उनके लिए सूटेबल कंपनसेशन को लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। गौरतलब है कि सोनम वागंचुक ने पिछला खत लिखा था उसमें उन्होंने यही कहा था कि लगातार सत्ता के और विपक्ष के सांसद मुझसे संपर्क कर रहे हैं। आग्रह कर रहे हैं कि मैं अपना अनशन समाप्त कर दूं और मैं इस बारे में गंभीरता से सोचूंगा। मैं कर दूंगा यह। यदि सरकार पहले उन्होंने कहा पहले इस्तीफे की मांग की। फिर उसके बाद उन्होंने यह कहा कि यदि सदन में चर्चा हो जाए और मुझसे आकर के कोई अस्पताल में मिल ले। अब जो आखिरी हालिया खत था उसमें उन्होंने लिखा था कि यदि सरकार यह वादा कर दे कि जिन बच्चों ने आंदोलन किया है उन पर कोई मुकदमा नहीं किया जाएगा। उनको उस चीज के लिए सजा नहीं दिया जाएगा तो फिर मैं अनशन छोडूंगा। तो वो बातें होती दिख रही हैं।
सोनम अंग्रेजी में वो भी कहते हैं कि मुझसे मुझे जानकर खुशी है कि सरकार और विपक्ष की ओर से यह आश्वासन मुझे दिया गया है कि जो नीट है और जो दूसरी मतलब शिक्षा से जुड़ी जो बाकी यंत्रणाएं हैं उनमें रिफॉर्म को लेकर और अकाउंटेबिलिटी एनश्योर करने के लिए या जो लैप्सेस हुए हैं उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पार्लियामेंट के फ्लोर पर डिस्कशन होगा। फिर उसके बाद की तरफ से कहा ही जा रहा था। उसके बाद और बड़ी रोचक भाषा में उन्होंने कहा कि एट अ सूटेबल टाइम एक मुफीद वक्त पर जो आगे वो कहते हैं, आई एम नो वन टू डिक्टेट। मैं नहीं तय करूंगा वो। उसमें यह जो नीट वाला मामला हुआ है। उसमें शिक्षा मंत्रालय कंसर्न मिनिस्ट्री वो कह रहे हैं अकाउंटेबिलिटी इन द मिनिस्ट्री एंड द मिनिस्टर यानी कि मंत्री और मंत्रालय में जो लोग हैं उनकी जो जवाबदेही होगी उसको लेकर के कदम उठाए जाएंगे जो कि सरकार कंसीडर ही कर रही होगी। यानी जो सरकार की पहले ही मंशा है लेकिन सूटेबल टाइम और आई एम नो वन टू डिक्टेट। ये दो बातें कि सरकार को कोई ये डिक्टेट नहीं करेगा कि कब लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे भरोसा दिलाया गया। फिर आगे वो कहते हैं फिर वो जो छात्रों से अपनी अपील करते हैं कि आप अभी संयम बना के रखें। हिंसा ना करें। उन्होंने कहा कि मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता हूं। फिर उसके बाद उन्होंने ये भी कहा कि जो एंटी सोशल एलिमेंट्स हैं उनकी जो करतूतें हैं उनका समर्थन नहीं करता हूं। उन्होंने कहा कि जो मांग है उस पर जरूर ध्यान दिया जाए।
गुरुवार रात 11:52 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सेल्फी वीडियो संदेश पोस्ट करके सीधा छात्रों से संपर्क साधा और NEET पेपर लीक विवाद के बीच उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार उनके साथ खड़ी है। यह स्वीकार करते हुए कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है, उन्होंने कड़ी कार्रवाई का वादा किया। इसमें शुक्रवार को कैबिनेट द्वारा एक प्रस्तावित कानून पर निर्णय लेना भी शामिल है, जिसमें परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों और कड़े दंड का प्रावधान है। प्रधानमंत्री का यह प्रयास उनके संचार के पारंपरिक तरीके से काफी अलग था। किसी आधिकारिक स्थान से टीवी पर दिए जाने वाले संबोधन के बजाय, मोदी ने तीन मिनट से भी छोटा सेल्फी वीडियो चुना—जो विशेष रूप से युवाओं और डिजिटल-फ़र्स्ट दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया प्रतीत होता है। छात्रों को दोस्तों कहकर संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है। इससे लाखों छात्रों और उनके माता-पिता को भारी कष्ट हुआ है। इसीलिए, पेपर लीक की घटना के बाद से पिछले ढाई महीनों में कई कदम उठाए गए हैं। दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और वे अब जेल में हैं। पीएम मोदी ने कहा कि सरकार केवल इतनी कार्रवाई से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उन्होंने बताया कि आज उन्होंने संबंधित विभागों को पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश दिए थे। विभागों ने लगातार मेहनत करके देर रात इसका मसौदा तैयार कर उन्हें सौंप दिया है।
जब आंदोलन सड़क पर पुलिस से भिड़ने लगता है, वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाता है। महात्मा गांधी ने चौराचोरी की हिंसक घटना के बाद अपना पूरा असहयोग आंदोलन ही वापस ले लिया था। क्योंकि वह जानते थे कि हिंसा से हासिल की गई जीत कभी स्थाई नहीं होती। यहां हमें यह भी समझना होगा कि महात्मा गांधी ने जब साल 1917 में चंपारण सत्याग्रह किया या फिर साल 1920 में असहयोग आंदोलन तो इन बड़े आंदोलनों से लगभग एक दशक पहले उन्होंने अपने समर्थकों को अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। साल 1909 में उनकी किताब हिंस स्वराज छपी थी। जिसमें उन्होंने अहिंसक आंदोलन की वकालत की थी और जब वह आंदोलन करने उतरे तो उनके समर्थकों के लिए अहिंसा का विचार कोई नया नहीं था। लेकिन सीजेपी के मामले में कहानी थोड़ी अलग है क्योंकि उनके आंदोलन में अहिंसा की ऐसी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मौजूद नहीं है और यह बात सिर्फ आंदोलन करने वाले युवाओं पर ही नहीं इस आंदोलन के अगवा माने जाने वाले लड़कों पर भी लागू होती है। महात्मा गांधी सत्य पर भी उतना ही जोर देते थे और सीजेपी के प्रोटेस्ट में भी यह फर्क तब दिखता है जब इनके लीडर्स एक तरफ कहते हैं कि वह इस मंच को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देंगे। लेकिन बाद में तमाम विपक्षी नेता उनके ही मंच से अपना स्कोर सेटल करते नजर आते हैं।