Jan Gan Man: Swami Avimukteshwaranand Saraswati क्या सचमुच Shankaracharya नहीं हैं? आखिर क्या कहा था Supreme Court ने?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 21, 2026

प्रयागराज माघ मेला क्षेत्र में रविवार को उस समय तनाव की स्थिति बन गई जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम में स्नान के दौरान रोके जाने का आरोप लगा। इस घटना के बाद मेला प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों के बीच विवाद गहरा गया। इसके बाद प्रशासन ने सोमवार को एक नोटिस जारी कर उनसे यह स्पष्ट करने को कहा कि वह अपने नाम के साथ शंकराचार्य की उपाधि किस आधार पर उपयोग कर रहे हैं?

इस घटना के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भोजन और जल त्याग कर विरोध शुरू कर दिया। उनके मीडिया प्रभारी ने दावा किया कि उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पहले ही शंकराचार्य घोषित किया जा चुका था और प्रशासन द्वारा रोका जाना अनुचित है। दूसरी ओर मेला प्रशासन का कहना है कि स्वामी और उनके समर्थकों ने बैरिकेड तोड़ कर संगम नोज तक पहुंचने की कोशिश की, जिससे भगदड़ जैसी स्थिति बन सकती थी। प्रशासन के अनुसार मुख्य स्नान पर्व पर किसी भी वाहन या पालकी की अनुमति नहीं थी और सुरक्षा कारणों से हस्तक्षेप करना आवश्यक था।

मेला अधिकारी ने यह भी कहा कि कई अन्य साधु संतों ने शांतिपूर्ण ढंग से स्नान किया और किसी के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं हुआ। प्रशासन का जोर इस बात पर है कि करोड़ों श्रद्धालुओं और कल्पवासियों की सुरक्षा सर्वोपरि है और नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं।

उधर, इस पूरे प्रकरण पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं, जहां कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधते हुए इसे संत के अपमान का मुद्दा बनाया है वहीं कुछ साधु संतों की ओर से भी इस मुद्दे पर सरकार के विरोध में प्रदर्शन किया गया है।

देखा जाये तो इस पूरे विवाद को भावनाओं की बजाय तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के आधार पर देखने की आवश्यकता है। शंकराचार्य की उपाधि केवल धार्मिक सम्मान नहीं, बल्कि एक संस्थागत पद है, जिसकी परंपरा, विधि और स्वीकृति का एक स्पष्ट ढांचा है। जब इस पद को लेकर विवाद न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हो, तब किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वयं को शंकराचार्य घोषित करना न केवल विवाद को बढ़ाता है, बल्कि विधि के शासन की भावना के भी विरुद्ध जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य कहने पर रोक इसलिए लगाई क्योंकि उनके चयन और अभिषेक की प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। अदालत के समक्ष यह प्रश्न है कि क्या उन्हें परंपरागत और मान्य प्रक्रिया के अनुसार ज्योतिष पीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था या नहीं? जब तक इस प्रश्न का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक यथास्थिति बनाए रखना न्यायिक विवेक का हिस्सा है। इसे किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान पर आघात के रूप में नहीं, बल्कि संस्था की गरिमा और परंपरा की रक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।

वहीं प्रयागराज माघ मेला प्रशासन की भूमिका भी इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए। माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विश्व के बड़े जनसमागमों में से है, जहां सुरक्षा, व्यवस्था और अनुशासन का पालन जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाता है। प्रशासन यदि यह कहता है कि मुख्य स्नान पर्व पर कोई विशेष प्रोटोकॉल या अपवाद संभव नहीं है, तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं है। नियमों का पालन संत और सामान्य श्रद्धालु दोनों के लिए समान होना चाहिए, तभी व्यवस्था पर लोगों का विश्वास बना रहता है।

वहीं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि उन्हें पहले ही शंकराचार्य घोषित किया जा चुका था। लेकिन जब इस दावे को लेकर ही न्यायिक विवाद है और अन्य पीठों की ओर से भी समर्थन का अभाव बताया गया है, तब इस तर्क का वजन अपने आप कम हो जाता है। न्यायालय का अंतिम निर्णय आने तक अंतरिम आदेश ही मान्य होता है और इसे मानने से ही संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहती है।

वहीं राजनीतिक दलों द्वारा इस मुद्दे को अपने हित में भुनाने की कोशिश भी दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी संत का समर्थन या विरोध इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह किस दल के विचारों से सहमत या असहमत रहा है। धर्म और राजनीति के इस मिश्रण से न तो धर्म की मर्यादा बचती है और न ही राजनीति की साख।

बहरहाल, यह पूरा प्रकरण हमें यही सिखाता है कि आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन आवश्यक है। आस्था तभी सुरक्षित रह सकती है जब वह नियम और कानून के दायरे में हो। प्रयागराज माघ मेला प्रशासन ने यदि सुरक्षा और न्यायालय के आदेश को प्राथमिकता दी है, तो उसे सही ही कहा जाएगा। वहीं शंकराचार्य जैसे गरिमामय पद से जुड़े विवाद का समाधान भी टकराव से नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान से ही निकल सकता है।

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