कॉकरोच जनता पार्टी क्या सिर्फ एक छलावा मात्र है?

By संतोष कुमार पाठक | May 25, 2026

सत्य कभी-कभी कल्पना से भी कहीं ज्यादा विचित्र होता है। आज से पहले शायद ही कभी किसी ने ऐसा सोचा भी होगा कि एक दौर ऐसा आएगा जब लोगों में अपने आपको कॉकरोच कहने की होड़ लग जाएगी। देश भर में 'मैं भी कॉकरोच' जैसा एक बड़ा अभियान शुरू हो जाएगा। लोग, खासतौर से लाखों युवा 'मैं भी कॉकरोच' जैसे मीम्स और बैनरों के जरिए न केवल अपने आपको कॉकरोच कहने में गर्व महसूस करेंगे बल्कि हैशटैग के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसे ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय बनाने की भी कोशिश करेंगे।लेकिन ऐसा हुआ और इतनी तेजी से हुआ कि किसी को भी सोचने-समझने का मौका तक नहीं मिला। 

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देशभर में सरकारी सिस्टम से नाराज लाखों युवा अलग-अलग अंदाज में लगातार अपना गुस्सा तो जाहिर कर ही रहे थे लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से लगभग 11,500 किमी दूर बैठे एक भारतीय युवा अभिजीत दीपके ( जो महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले हैं) के दिमाग में एक आइडिया आया और उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तुरंत 'कॉकरोच जनता पार्टी' बना दी। इसके बाद देखते ही देखते भारत के लोकतंत्र में कुछ ऐसा होता हुआ नजर आया , जो इससे पहले किसी ने सोचा तक नहीं होगा। 

देखते-देखते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के फॉलोअर्स की संख्या 2 करोड़ 30 लाख तक पहुंचने वाली है। यह दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की कुल संख्या 93 लाख से लगभग ढाई गुणा ज्यादा है।

  

इस बीच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी लगातार चर्चा में रहे। पार्टी के एक्स अकाउंट पर कभी रोक लगाई गई तो कभी वेबसाइट को डाउन करने का आरोप लगाया गया। जैसे ही लोगों ने इस पार्टी के इतिहास-भूगोल को खंगालना शुरू किया, सकते में आए अभिजीत दीपके ने तुरंत सफाई शुरू कर दी। इस बीच उन्होंने पार्टी के आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज को हैक करने का दावा भी किया और जब यह ठीक हुआ तो विवाद पैदा करने वाले पार्टी के संस्थापक मेघनन्द को उनकी ही पार्टी फॉलो करना बंद कर चुकी थी। 

मतलब कहीं न कहीं, कुछ तो गड़बड़ है। कुछ तो ऐसा हो रहा है जो फिलहाल सामने से नजर नहीं आ रहा है लेकिन जिसका आभास तो हो ही रहा है। बीजेपी इस पार्टी को विदेशी धरती से चलने वाले विपक्षी दल का टूलकिट बता रही है तो वहीं कई वरिष्ठ पत्रकार और बौद्धिक जमात के लोग इसे बीजेपी की बी टीम के रूप में पेश कर रहे हैं। अभिजीत दीपके की भी कई हरकतें, संदेह पैदा कर रही है। अभिजीत द्वारा एक खास पार्टी के समर्थक माने जाने वाले पत्रकारों को ही इंटरव्यू देना, विवादित व्यक्ति को अनफॉलो कर पहले कुछ खास पत्रकारों को फॉलो करना और फिर उन्हें भी अनफॉलो कर देना। सोचिए जो व्यक्ति शुरुआत से ही इतना ज्यादा सेलेक्टिव हो,उसके पीछे कितनी बड़ी टीम या कितना बड़ा दिमाग काम कर रहा होगा जो भारत के लोकतांत्रिक आंदोलन के मिज़ाज, भारत की मेनस्ट्रीम और नई मीडिया( यूटूबर्स) की आदतों को कितनी अच्छी तरह से समझता है। आंदोलन के जरिए, देश में एक माहौल पैदा करने में बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों को महारत हासिल है। दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश पर सबसे ज्यादा राज किया है और जो वर्तमान में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है वो कांग्रेस बड़े स्तर पर आंदोलन चलाना और इसे लोकप्रिय बनाने के तौर-तरीके भूल चुकी है। यह भी गौर करने वाली बात है कि कॉकरोच जनता पार्टी को चंद बड़े पत्रकार अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर जितना स्पेस दे रहे हैं उससे भी कहीं ज्यादा स्पेस मेनस्ट्रीम मीडिया दे रहा है। हाल के वर्षों में ऐसा कब हुआ था, याद करने की कोशिश कीजिए। 

इस लेख के लेखक ने अरविंद केजरीवाल के आंदोलन को बहुत ही शुरुआत से कवर किया था जिसकी सबसे खास बात यह थी कि प्रेस कांफ्रेंस के लिए आने वाले न्यौते में जिस केजरीवाल का नाम सबसे लास्ट में 'और अरविंद केजरीवाल' लिखा आता था,उस पार्टी में अब सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही बचे रह गए हैं। याद कीजिएगा कि, उस दौर में भी अन्ना-अरविंद के आंदोलन पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को करप्ट व्यक्ति के तौर पर ही देखा जाने लगा था और आज भी अगर आप कॉकरोच जनता पार्टी से सवाल पूछते हैं तो एक खास इको-सिस्टम के लोग ( पत्रकार भी) तुरंत सामने आकर आपकी निष्ठा पर सवाल उठाते हुए पूछने लगते हैं कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी से किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? 

लेकिन ऐसा कहने वाले लोग पुरानी कहावत को भूल  जाते हैं कि ' दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है'। वैसे भी लोकतंत्र की पहली शर्त तो यही होती है,' सवाल पूछने की आज़ादी' और सवालों से ऊपर कोई भी नहीं हो सकता है। जो भी नेता या संगठन अपने आपको सवालों से ऊपर उठाने की कोशिश करता है,उसका एक ही संदेश निकलता है कि उसकी नियत साफ नहीं है।

यह बात बिल्कुल सही है कि सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में खासकर युवाओं में बहुत गुस्सा है। लेकिन यह देश इससे पहले भी ऐसे अनुभवों से गुजर चुका है जब देश के युवाओं के गुस्से का इस्तेमाल कुछ खास लोगों ने अपने-अपने राजनीतिक हित को साधने के लिए किया। ऐसे लोगों ने युवाओं को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए, ऐसे-ऐसे झूठे और लुभावने वादे किए जिन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं था। इसलिए इस बार भारत के लोगों खासकर युवाओं को सावधान रहने की जरूरत है। देश में बदलाव लाने का कोई भी अभियान देश की धरती से ही चलना चाहिए और किसी भी तरह के नए व्यक्ति या संगठन पर भरोसा करने से पहले लोगों को आंख बंद करके अपने आप से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि उस नए संगठन, आंदोलन या व्यक्ति के अभियान से सबसे ज्यादा फायदा किस राजनीतिक दल अथवा नेता को होगा? 

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

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