श्रीलंका विद्रोह: क्या यह शक्तिशाली राजपक्षे वंश की राजनीतिक यात्रा का अंत है

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jul 11, 2022

कोलंबो| श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे की लोकप्रियता केवल 30 महीनों की अल्प अवधि के भीतर कम होकर घृणा के प्रतीक के रूप में बदल गई और आर्थिक संकट का सामना कर रहे लोग उनके इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आये।

सिंहला बौद्ध बहुसंख्यकों के 60 प्रतिशत बहुमत के साथ निर्वाचित व्यक्ति को छिपने को मजबूर होना पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के भाई गोटबाया राजपक्षे ने नवंबर 2019 में चुने जाने के बाद 20वें संशोधन के माध्यम से पद ग्रहण किया था।

एक राजनीतिक टिप्पणीकार और कोलंबो के लेखक कुसल परेरा ने कहा, ‘‘लोकप्रिय समर्थन और राष्ट्रपति के रूप में उनकी संवैधानिक क्षमता के मामले में गोटबाया राजपक्षे अपने भाइयों में सबसे शक्तिशाली हो सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी पार्टी, श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (एसएलपीपी) में कभी भी मजबूत पकड़ नहीं थी।’’

उन्होंने कहा कि इसका कारण गोटबाया थे, जो कभी राजनेता नहीं रहे थे लेकिन अपने भाई महिंदा के करिश्मे और राजनीतिक कौशल के कारण उनका आधार बना रहा।

परेरा ने कहा, ‘‘उनकी राजनीतिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है। यहां तक ​​कि उनके अपने कर्मचारी भी अब उनके साथ खड़े नहीं होंगे। राष्ट्रपति पद का कार्यभार फिर से शुरू करने के लिए उनके पास वापसी करने का कोई मौका नहीं है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘महिंदा अब एक कारक नहीं होंगे, वह उम्र के साथ शारीरिक रूप से कमजोर हो गये हैं और ऐसी कोई संभावना नहीं है कि उनके पास राजनीतिक रूप से वही शक्तिशाली करिश्माई बल होगा जैसा पहले होता था।’’ एक अन्य स्तंभकार/विश्लेषक एमएसएम अयूब ने 2025 के चुनावों में वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसी भी राजपक्षे के उभरने से इनकार किया।

उन्होंने कहा कि आर्थिक संकट के असर का मतलब है कि युवा पीढ़ी की उम्मीदें धराशायी हो गई हैं। गोटबाया राजपक्षे ने घोषणा की थी कि 13 जुलाई को वह इस्तीफा दे देंगे।

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