By नीरज कुमार दुबे | Nov 29, 2025
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में जारी कार्यक्रमों की श्रृंखला के बीच ही राष्ट्रीय गीत को लेकर एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। दरअसल, राज्यसभा सचिवालय द्वारा जारी एक प्रोटोकॉल नोट को विपक्षी दलों ने ‘‘वंदे मातरम विरोध’’ की कोशिश बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। यह विवाद उस समय उभरा जब एक संसदीय बुलेटिन में सांसदों को यह याद दिलाया गया कि सदन के भीतर किसी भी प्रकार के नारे— चाहे ‘जय हिंद’, ‘वंदे मातरम’ हो या अन्य, लगाना संसदीय शिष्टाचार के विरुद्ध है। विपक्ष ने इसे आधार बनाकर केंद्र सरकार पर राष्ट्रगीत और देशभक्ति के नारों पर रोक लगाने का आरोप लगाया।
इस बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस विवाद में कूदते हुए चिंता जताई कि संसद में ‘‘जय हिंद’’ और ‘‘वंदे मातरम’’ पर कथित रोक क्या बंगाल की पहचान को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने कहा, ''वंदे मातरम हमारा राष्ट्रगीत है, इसे कैसे भुलाया जा सकता है?’’
दूसरी ओर, विवाद के बीच, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह दिशानिर्देश नया नहीं है बल्कि संसद की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। 1948 में संविधान सभा के अध्यक्ष ने सदन में किसी भी प्रकार के नारे— ‘थैंक यू’, ‘जय हिंद’, ‘वंदे मातरम’, को अनुपयुक्त बताया था। 1962 में लोकसभा में भी यही परंपरा दोहराई गई, जब स्पीकर ने नारेबाज़ी को ‘‘जनसभा जैसा व्यवहार’’ करार दिया था। ये नियम दशकों से प्रचलित हैं और हर सत्र से पहले जारी होने वाले बुलेटिन में इनका उल्लेख किया जाता रहा है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह तथ्य भी स्पष्ट है कि बुलेटिन किसी भी सरकार के निर्देश पर नहीं बल्कि सदन के सभापति या अध्यक्ष की परंपरागत अधिकारिता के तहत जारी किया जाता है और इसका उद्देश्य केवल संसदीय मर्यादा बनाए रखना है।
देखा जाये तो राज्यसभा सचिवालय के एक नियमित नोट को लेकर जिस प्रकार विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और ममता बनर्जी, ने केंद्र सरकार पर ‘‘वंदे मातरम विरोध’’ का आरोप लगाया है, वह तथ्यहीनता और राजनीतिक अवसरवाद का उदाहरण है। संसदीय परंपराएँ किसी दल की ‘‘मर्जी’’ से नहीं, दशकों की संवैधानिक प्रक्रिया से बनती हैं। 1948 से लेकर आज तक सदन के भीतर नारे लगाने पर रोक सिर्फ इसलिए है कि संसद जनसभा नहीं; यहाँ तर्क, विमर्श और गरिमा की अपेक्षा होती है। यह परंपरा तब भी लागू थी जब कांग्रेस सत्ता में थी; आज भी लागू है।
फिर भी कांग्रेस का आक्रोश समझ से परे है। यह वही पार्टी है जिसने 1930–40 के दशक में वंदे मातरम को अपने भीतर ही विवाद का केंद्र बना दिया था और अंततः 1935 में इसे ‘‘छाँट’’ कर अपनाया, ताकि वह कुछ विशेष तबकों को नाराज़ न कर दे। आज वही कांग्रेस इस गीत को लेकर ‘‘आहत भाव’’ का दावा करते हुए दिखाई दे रही है।
ममता बनर्जी का रुख भी कोई नया संदेश नहीं देता। वे वर्षों से राष्ट्रीय प्रतीकों और नारों से सावधानी बरतती रही हैं, यह सोचकर कि कहीं उनका राजनीतिक आधार इससे प्रभावित न हो जाए। किंतु जब पुरानी संसदीय परंपरा पर आधारित एक बुलेटिन सामने आता है, तो अचानक उन्हें ‘‘बंगाल की पहचान’’ की चिंता सताने लगती है। यह चिंता वास्तविक से अधिक राजनीतिक प्रतीत होती है।
यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि कौन ‘‘वंदे मातरम’’ के पक्ष में है और कौन नहीं, वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और समस्त राष्ट्र इसका सम्मान करता है। असली प्रश्न है कि क्या राष्ट्रीय भावनाओं का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना चाहिए? देखा जाये तो राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों पर झूठा विवाद खड़ा करना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। संसद की परंपराओं पर उंगली उठाने से पहले विपक्ष को अपने ऐतिहासिक रुख पर भी नजर डालनी चाहिए। वंदे मातरम का 150वाँ वर्ष हमें यह याद दिलाता है कि यह गीत विभाजन नहीं, संघर्ष, समर्पण और एकता का प्रतीक है। राजनीतिक आरोपों की धूल हटाकर देखें तो यही संदेश सबसे साफ दिखाई देता है।
-नीरज कुमार दुबे