By रेनू तिवारी | Jun 03, 2026
क्या आपका बच्चा भी स्कूल के खेल दिवस (Sports Day), दौड़ प्रतियोगिता या क्लास के सामने स्पीच देने वाले दिन सुबह-सुबह चिड़चिड़ा या अड़ियल रवैया अपनाने लगता है? क्या वह स्कूल जाने या कक्षा के सामने बोलने से साफ मना कर देता है? अगर हाँ, तो माता-पिता के तौर पर आप अकेले नहीं हैं जो इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। कई बच्चों के लिए ऐसे मौके गहरी चिंता, घबराहट और मानसिक दबाव का कारण बन जाते हैं। उनके मासूम मन में कई तरह के डरावने सवाल उठते हैं—‘अगर मैं सबसे पीछे रह गया तो?’, ‘अगर सब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे तो?’, ‘अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो?’
डर से भागना समस्या को और बढ़ाता है: साइकोलॉजी क्या कहती है?
जब हम किसी ऐसी चीज़ से बचते हैं जिससे हमें डर लगता है, तो हमारे दिमाग को तुरंत राहत महसूस होती है। यह तात्कालिक राहत (Instant Relief) बहुत असरदार होती है, जो बच्चे के मस्तिष्क को यह गलत संदेश देती है कि 'चुनौती से बचना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।'
डर का चक्र: समय के साथ डर और ज्यादा बड़ा होता जाता है और उससे भागने की प्रवृत्ति मजबूत हो जाती है। इसीलिए बच्चों के लिए यह बेहतर है कि वे अपने डर का सामना जल्द करें, इससे पहले कि वह उनकी आदत बन जाए।
नोट: इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बच्चे को उसकी घबराहट के बावजूद जबरन किसी मुश्किल स्थिति में धकेल दिया जाए। अत्यधिक दबाव उसके मन में इस डर को स्थायी बना सकता है।
स्टेप-बाय-स्टेप गाइड: बच्चे की घबराहट को कैसे दूर करें?
परेशानी की असल वजह को पहचानें
अगर आपको पहले से अंदेशा है कि स्कूल में कोई ऐसा कार्यक्रम है जिससे बच्चा असहज हो सकता है, तो पहले ही शांत माहौल में उससे बात करें। सहज तरीके से यह समझने की कोशिश करें कि वह वास्तव में किस बात से डर रहा है:
क्या पिछली बार उसके साथ कुछ बुरा हुआ था?
क्या दोस्तों या क्लासमेट्स से जुड़ी कोई परेशानी है?
क्या उसे असफल होने या मज़ाक उड़ाए जाने का डर है?
टिप: बच्चों से हमेशा आमने-सामने (Eye Contact) बैठकर बात करने के बजाय सोने से पहले, टहलते समय या गाड़ी में सफर के दौरान बात करें। जब सीधा आंखों का संपर्क नहीं होता, तो बच्चे अपनी कठिन भावनाओं को ज्यादा आसानी से व्यक्त कर पाते हैं। तुरंत यह न कहें कि "चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा"—इससे बच्चे को लगता है कि उसकी परेशानी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
उसकी भावनाओं को स्वीकार करें (Validation)
समाधान सुझाने से पहले बच्चे को यह महसूस कराएं कि उसका डरना बिल्कुल स्वाभाविक है। आप कह सकते हैं, "मैं समझ सकता हूँ कि यह बात अभी तुम्हें बहुत बड़ी लग रही है। ऐसे में चिंतित होना बिल्कुल नॉर्मल है।" इसके बाद थोड़ा मौन रहें, यदि बच्चा रोता है तो उसे रोने दें। उसे गले लगाकर कहें, "यह सचमुच मुश्किल लग रहा है, लेकिन हम साथ हैं।"
मिलकर बनाएं 'माइक्रो-प्लान' (Micro-Planning)
बच्चे के साथ मिलकर एक ऐसी योजना बनाएं जो उसे सुरक्षित और सहज महसूस कराए। उससे पूछें, "वहां जाना थोड़ा आसान कैसे हो सकता है? ऐसा कौन सा छोटा कदम है जिसे तुम संभाल सकते हो?"
यदि वह दौड़ने से डरता है, तो उसे दौड़ने के बजाय केवल पैदल चलकर रेस पूरी करने का विकल्प दें।
यदि वह स्टेज पर बोलने से डरता है, तो पूरी क्लास के बजाय पहले किसी एक भरोसेमंद टीचर को अपना भाषण सुनाने की योजना बनाएं।
शुरुआत में केवल कार्यक्रम में उपस्थित रहना और दूसरों को देखना भी एक बड़ा कदम हो सकता है।
कार्यक्रम या प्रतियोगिता वाले दिन क्या करें?
शांत रहें: उस दिन सुबह शांत भाव से उसे पहले हुई बातचीत और बनाई गई योजना की याद दिलाएं।
दबाव न डालें: आप कह सकते हैं, "स्कूल जाने का समय हो गया है। मुझे पता है कि यह आसान नहीं है और तुम्हारा मन वहां जाने का नहीं कर रहा है।"
साथ होने का अहसास: उसकी पीठ पर हल्का हाथ रखना या सिर्फ इतना कहना, "मैं तुम्हारे साथ हूँ", बच्चे को बहुत हिम्मत देता है। साहस का मतलब डर का न होना नहीं है, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ पाना है।
क्या पिछली बार कुछ बुरा हुआ था?
क्या दोस्तों से जुड़ी कोई परेशानी है? क्या उसे असफल होने, दूसरों के फैसले का सामना करने या मजाक उड़ाए जाने का डर है? आप कह सकते हैं, ‘‘जब पापा ने खेल दिवस का जिक्र किया था, तब मैंने देखा कि तुम अचानक चुप हो गए थे। क्या इसकी कोई बात तुम्हें परेशान कर रही है?’’ बच्चे हमेशा तुरंत अपने मन की बात शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उन्हें समय दें। अक्सर आमने-सामने बैठकर बात करने के बजाय सोने से पहले, टहलते समय या साथ गाड़ी में सफर करते हुए ऐसी बातचीत करना ज्यादा आसान होता है। आंखों में सीधा संपर्क न होने पर बच्चों को कठिन भावनाओं के बारे में सोचना और बताना अपेक्षाकृत आसान लगता है। कोशिश करें कि तुरंत यह न कहें, ‘‘सब ठीक हो जाएगा’’ या ‘‘चिंता की कोई बात नहीं है’’।
बच्चे को यह लग सकता है कि उसकी भावनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कई बार सिर्फ ध्यान से सुनना ही बच्चे को खुलकर बात करने में मदद करता है। उसकी भावना को स्वीकार करें जब आपको स्थिति की कुछ समझ हो जाए, तो समाधान सुझाने से पहले बच्चे को यह महसूस कराएं कि उसकी भावना स्वाभाविक है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनी गई है, तब वे समाधान के बारे में सोचने के लिए ज्यादा तैयार होते हैं। आप कह सकते हैं, ‘‘मैं समझ सकता हूं कि यह बात अभी तुम्हें बहुत बड़ी लग रही है।
ऐसे में चिंतित होना बिल्कुल स्वाभाविक है।’’ इसके बाद कुछ क्षण चुप रहें। संभव है बच्चा रोने लगे। कई बार डर और चिंता को समझने तथा स्वीकार करने की प्रक्रिया का यह भी हिस्सा होता है। यही वह समय होता है जब माता-पिता का मन बच्चे को तुरंत बचाने या ढांढस बंधाने का करता है। लेकिन इसके बजाय उसके साथ बने रहने की कोशिश करें। आप उसे गले लगाकर बस इतना कह सकते हैं, ‘‘यह सचमुच मुश्किल लग रहा है।’’ फिर मिलकर योजना बनाएं अब बच्चे की मदद करें ताकि वह सोच सके कि किसी गतिविधि में शामिल होने का ऐसा कौन-सा तरीका हो सकता है जो उसे सुरक्षित और सहज महसूस कराए।
आप पूछ सकते हैं, ‘‘तुम्हें क्या लगता है, वहां जाना थोड़ा आसान कैसे हो सकता है? ऐसा कौन-सा छोटा कदम है जिसे तुम संभाल सकते हो?’’ संभव है वह दौड़ने के बजाय क्रॉस-कंट्री में पैदल चलना चाहे, या पूरी कक्षा के सामने बोलने से पहले अपना भाषण किसी भरोसेमंद शिक्षक को सुनाना चाहे। कभी-कभी शुरुआत में केवल कार्यक्रम में उपस्थित रहना और दूसरों को देखना भी एक अच्छा कदम हो सकता है। कुछ मामलों में शिक्षक से भी बात करना उपयोगी रहता है, ताकि स्कूल और घर दोनों जगह एक जैसी योजना पर काम हो सके।
उद्देश्य यह नहीं है कि बच्चा शानदार प्रदर्शन करे, बल्कि यह है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार भागीदारी कर सके। जल्दबाजी या दबाव से बचें। अगर बच्चा कहे, ‘‘मुझे नहीं पता’’, तो यह स्वीकार करें कि चिंता की स्थिति में सोचना मुश्किल होता है। कई बार थोड़ी देर का विराम लेकर बाद में विकल्पों पर चर्चा करना बेहतर रहता है। कार्यक्रम वाले दिन क्या करें उस दिन शांत भाव से उसे पहले हुई बातचीत और योजना की याद दिलाएं।
आप कह सकते हैं, ‘‘चलने का समय हो गया है। मुझे पता है कि यह आसान नहीं है और तुम्हारे मन में अब भी वहां जाने के लिए मना कर रहा है।’’ अगर बच्चा परेशान हो जाए, तो उसके साथ बने रहें और उसकी भावनाओं को समझें। आपको हर समस्या का तुरंत समाधान ढूंढ़ने या उसे जल्दी संभालने की जरूरत नहीं है। पीठ पर हल्का हाथ रखना या सिर्फ इतना कहना, ‘‘मैं तुम्हारे साथ हूं’’, अक्सर काफी होता है। बच्चों को कई बार अपने डर को महसूस करने की जरूरत होती है, तभी वे उससे आगे बढ़ पाते हैं। यहीं से साहस पैदा होता है।
साहस का मतलब डर का न होना नहीं है, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ पाना है। जब बच्चे यह अनुभव करते हैं कि वे अपनी चिंताओं के साथ भी किसी गतिविधि में हिस्सा ले सकते हैं, तो चुनौतियों का सामना करने की उनकी क्षमता पर विश्वास बढ़ने लगता है। क्या कभी बच्चे की इच्छा के अनुसार चलना ठीक है? कुछ परिस्थितियों में हां। अगर बच्चा बहुत ज्यादा परेशान है, तो कभी-कभी एक कदम पीछे हटना उसे दोबारा नियंत्रण महसूस करने में मदद कर सकता है।
किसी एक अवसर पर भाग न लेना कोई बड़ी समस्या नहीं है। बच्चों को कुछ चीजें पसंद न हों, यह भी स्वाभाविक है। चिंता तब होती है जब यह एक आदत बन जाए—जब बच्चा बार-बार बचने लगे या उन गतिविधियों से भी दूर रहने लगे जिन्हें वह वास्तव में करना चाहता है। अगर वह परेशान किए जाने (बुलिंग) का डर महसूस कर रहा है तो हो सकता है उसके साथ कुछ बुरा अनुभव रहा हो, तो किसी मनोवैज्ञानिक से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है। उपलब्धि और भागीदारी को लेकर घर में कैसी सोच विकसित करें बच्चे को किसी गतिविधि में भाग लेने के लिए प्रेरित करने वाली अधिकांश बातें कार्यक्रम वाले दिन नहीं, बल्कि घर की रोजमर्रा की बातचीत में होनी चाहिए। यह धीरे-धीरे ऐसी सोच विकसित करने का विषय है जिसमें बच्चा समझे कि हर बार जीतना, सबसे बेहतर होना या बिल्कुल सही करना जरूरी नहीं है। कुछ बातें बार-बार दोहराना उपयोगी होता है।
पहली बात, हर व्यक्ति का शरीर और मस्तिष्क अलग होता है। कुछ काम किसी को आसानी से आते हैं, तो किसी को नहीं। अलग होना सामान्य बात है और इसकी तुलना करने के बजाय इसकी सराहना की जानी चाहिए। आप कह सकते हैं, ‘‘आज मैंने अपने सहकर्मी पेनी से बहुत कुछ सीखा। उन्हें पर्यावरण के बारे में बहुत जानकारी है।’’ दूसरी बात, कौशल जन्मजात नहीं बल्कि अभ्यास का परिणाम होता है। बच्चे अक्सर सोचते हैं कि खेल, संगीत या मंच पर प्रदर्शन जैसी चीजें केवल प्रतिभा पर निर्भर हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि क्षमता अभ्यास से विकसित होती है। जो बच्चा रोज खेलता है, उसके लिए खेल दिवस पर दौड़ना आसान होगा, क्योंकि उसने उसके लिए मेहनत की है, केवल इसलिए नहीं कि वह जन्म से ही ऐसा था। तीसरी बात, बच्चों को दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने पुराने प्रदर्शन की तुलना खुद से करना सिखाएं।
उदाहरण के लिए, ‘‘पिछले सप्ताह तुम 20 मीटर तैर पाए थे, और अब लगभग 30 मीटर तैर रहे हो।’’ चौथी बात, कठिन काम पर डटे रहना ही वास्तविक उपलब्धि है। जो काम पहले से आता हो, उसे करना आसान होता है। लेकिन जो काम कठिन लगता है, उसमें लगे रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है और जब बच्चा ऐसा करे तो उसकी सराहना की जानी चाहिए। लक्ष्य निडर बच्चा बनाना नहीं है वास्तविक लक्ष्य बच्चे में ऐसे गुण विकसित करना है जो धीरे-धीरे और छोटे-छोटे कदमों के माध्यम से यह सीख सके कि वह कठिन काम कर सकता है, और यह कि उसके बगल में खड़े बच्चे से अलग होना जीवन का एक सामान्य और स्वीकार्य हिस्सा है।