समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जाने जाते हैं ईश्वर चंद्र विद्यासागर

By अमृता गोस्वामी | Sep 26, 2020

विधवा पुर्नविवाह कानून हो या लड़कियों की शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने ऐसे महान कार्यों के प्रति देश-समाज में जागरूकता लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधवा पुनर्विवाह के लिए किए उनके प्रयासों से साल 1856 में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। विद्यासागर ने न सिर्फ विधवा विवाह के लिए कानून पारित कराया बल्कि उन्होंने स्वयं भी अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से ही किया। समाज में जात-पात, बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों को हटाने के लिए भी वे प्रतिबद्ध थे। 

संस्कृत भाषा और दर्शन में ईश्वर चंद्र बन्दोपाध्याय को विशेष योग्यता हासिल थी जिसके चलते विद्यार्थी जीवन में ही उन्हें संस्कृत कॉलेज ने ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की। यहां करीब 12 साल पढ़ाई करने के बाद वे संस्कृत के प्रोफेसर बने और बाद में इसी कॉलेज के प्रिंसिपल भी।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने कई प्रेरणात्मक किताबें लिखीं जिनमें बेताल पंचबिंशी, बंगला-आर इतिहास, जीभनचरित, बोधादय प्रकाशित, उपकारामनिका, बोर्नो पोरिचॉय, कोठा माला इत्यादि प्रमुख हैं। 

भारतीय समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले महान दार्शनिक, समाज सुधारक और लेखक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने आगे चलकर स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ 1872 में नार्थ कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना की जिसका नाम 1891 में उनके निधन के बाद 1917 में बदलकर विद्यासागर कॉलेज कर दिया गया। 

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29 जुलाई 1891 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर इस दुनिया को अलविदा कह गए किन्तु देश-समाज के लिए किए उनके कार्य आज भी प्रासंगिक है।

  

आज 26 सितम्बर, ईश्वर चंद्र विद्यासागर की जन्म तिथी पर आइये जानते हैं उनसे जुड़े कुछ उद्धरण-

समय के बहुत पाबंद थे ईश्वर चंद्र विद्यासागर- 

एक बार लंदन में विद्यासागर जी को एक सभा को संबोधित करना था। विद्यासागर वहां पहुंचे तो काफी लोग हॉल के बाहर खड़े थे। बाहर खड़े लोगों से उन्होंने पूछा क्या हुआ तब पता चला कि हॉल साफ नहीं है क्योंकि सफाई कर्मचारी पहुंचे नहीं हैं। कारण जानते ही ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने तनिक भी समय गंवाए बिना स्वयं झाड़ू उठाई और सफाई करने लग गए, उनको ऐसा करते देखकर और भी लोग सफाई करने को आगे आए और कुछ ही देर में सारा हॉल साफ हो गया। विद्यासागर ने तब लोगों से कहा समय का महत्व समझो, अगर आज सफाईकर्मी के अभाव में हम खुद सफाई नहीं करते तो यह कार्यक्रम टल गया होता।

अंग्रेज को सिखाई सभ्यता- 

विद्यासागर जी एक बार एक अंग्रेज ऑफिसर से किसी जरूरी काम से मिलने गए। उस समय वे संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल थे। अंग्रेज ऑफिसर जूता पहने हुए मेज पर पैर रखकर बैठा रहा। विद्यासागर को यह बात बड़ी अखरी लेकिन उस समय वे जरूरी बातचीत कर वापस लौट आए। पश्चात एक दिन संयोग से वह अंग्रेज ऑफिसर विद्यासागर से संस्कृत कॉलेज में मिलने आया तब उसे सबक सिखाने के लिए विद्यासागर ने भी चप्पल पहने हुए अपने पैरो को मेज पर रख लिया। अंग्रेज ऑफिसर गुस्से में तुरंत ही वहां से चला गया और इसकी शिकायत अपने वरिष्ठ अधिकारी से की। विद्यासागर जी से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं जब उनसे मिलने गया था तो वह भी इसी तरह से बैठे थे, मैंने समझा कि अंग्रेजों के शिष्टाचार का यही तरीका होगा। मैंने भी उसी तरह से उनका अभिवादन करना चाहा। तब अंग्रेज ऑफिसर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने विद्यासागर जी से क्षमा मांगी।

- अमृता गोस्वामी

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