By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 26, 2019
भारत में नारी उत्थान के प्रबल समर्थक व सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितम्बर 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर के ग्राम वीरसिंह में हुआ था। विद्यासागर का परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का था जिसके कारण उनको भी अच्छे संस्कार मिले। उन्होंने नौ वर्ष की अवस्था से लेकर 13 वर्ष की आयु तक संस्कृत विद्यालय में ही रहकर अध्ययन किया। घर की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए दूसरों के घरों में भोजन बनाया और बर्तन साफ किये। ईश्वरचंद्र अपनी मां के बड़े आज्ञाकारी थे तथा किसी भी हालत में वह उनका कहा नहीं टालते थे। उन्होंने काफी कठिन साधना की। रात में सड़क पर जलने वाले लैम्प के नीचे बैठकर पढ़ाई की। कठिन साधना के बल पर संस्कृत की प्रतिष्ठित उपाधि विद्यासागर प्राप्त हुई।
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जिन दिनों महर्षि दयानंद सरस्वती बंगाल के प्रवास पर थे तब ईश्वरचंद्र जी ने उनके विचारों को सुना। वे उनसे प्रभावित हो गये। उन दिनों बंगाल में विधवा नारियों की हालत बहुत दयनीय थी। बाल विवाह और बीमारी के कारण उनका जीवन बहुत कष्ट में बीतता था। ऐसे में उन्होंने नारी उत्थान के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया।
उन्होंने धर्मग्रंथों द्वारा विधवा विवाह को शास्त्र सम्मत सिद्ध किया। वे पूछते थे कि यदि विधुर पुनर्विवाह कर सकता है तो विधवा क्यों नहीं। उनके प्रयास से 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह को बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने स्वीकृति दे दी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ। इससे बंगाल के परम्परावादी लोगों में हड़कम्प मच गया। ईश्वरचंद का सामाजिक बहिष्कार होने लगा। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये गये। लेकिन इसी बीच उन्हें बंगाल की एक अन्य महान विभूति श्रीरामकृष्ण परमहंस का समर्थन भी मिल गया। उन्होंने नारी शिक्षा का प्रबल समर्थन किया। उन दिनों बंगाल में राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में काम कर रहे थे। ईश्वरचंद्र जी ने उनका भी साथ दिया और फिर इसके निषेध को भी शासकीय स्वीकृति प्राप्त हुई। नारी शिक्षा और उत्थान के प्रबल समर्थक ईश्वरचंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई 1891 को हृदयरोग से निधन हो गया।