युद्ध से किसी का भला नहीं होता, इजराइल-हमास की तरह रूस-यूक्रेन को भी संघर्षविराम करना चाहिए

By ललित गर्ग | Nov 22, 2023

इजरायल-हमास के बीच जारी युद्ध किस करवट बैठेगा, इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। डेढ़ माह से चल रहे इस युद्ध को विराम देने की कामना पूरी दुनिया कर रही है। सब शांति चाहते हैं, अयुद्ध चाहते हैं, अमन-चैन की भावना सभी के दिलों में है। लेकिन शांति एवं अयुद्ध की कामना के साथ कहीं-न-कहीं सोच में भयंकर भूल है। प्रतीत ऐसा हो रहा है बात युद्ध-विराम की हो और कार्य हों युद्ध के तो युद्ध-विराम कैसे होगा? इतने लम्बे युद्ध की विडम्बना यही है कि इजरायल पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाया है। न तो वह हमास को खत्म कर पाया है और न ही बंधक बनाए गए अपने लोगों को छुड़ा पाया है। 47 दिन से चल रहे इस युद्ध का एक और सार तत्व जो सामने आ रहा है वह यह कि करीब चौदह हजार लोगों की मौत हो चुकी है और इससे दोगुने घायल हुए हैं। इस युद्ध की एक और बड़ी विसंगति यही है कि मरने वालों में अधिकतर आमजन, महिलाएं और बच्चे हैं। युद्ध अनिवार्य हो सकता है, फिर भी युद्ध के बारे में उसका अंतिम सुझाव या निर्णय यही है कि युद्ध में किसी भी पक्ष की जीत निश्चित हो। लेकिन इस युद्ध में तो कोई भी जीतता हुआ प्रतीत ही नहीं हो रहा है।


हिंसा एवं जनसंहार तो निश्चित है पर यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। युद्ध आज के विकसित मानव समाज पर कलंक का टीका है। युद्ध करने वाले और युद्ध को प्रोत्साहन देने वाले किसी भी पक्ष को आज तक ऐसा कोई महत्वपूर्ण प्रोत्साहन नहीं मिला, जो उसे गौरवान्वित कर सके। निश्चित ही युद्ध तो बर्बादी है, अशांति है, विकास का अवरोध है, अस्थिरता है और जानमाल की भारी तबाही है। ऐसे युद्ध का अन्तिम निर्णय जब समझौते की टेबल पर ही होना है तो क्यों नहीं पहले ही टेबल पर बैठा जाये?

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युद्ध तो एक आग है, जो सब कुछ भस्म कर देती है। हम इजरायल-हमास एवं रूस-यूक्रेन के युद्ध में ऐसी ही भारी तबाही, जनसंहार एवं विभीषिका देख रहे हैं। इन दोनों युद्ध से जुड़े अनेक सवाल अहम हैं, लेकिन इनका जवाब देने वाला कोई नहीं है। दो देशों के बीच युद्ध में निर्णायक अथवा मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला संयुक्त राष्ट्र भी युद्ध समाप्त करने की अपील से अधिक कुछ नहीं कर पा रहा। भारत ने भी ऐसे अनूठे प्रयास किये, लेकिन उनकी निर्णायक भूमिका नहीं बन पायी। भले ही भारत के प्रयास सफल न हो रहे हों, लेकिन ऐसे ही प्रयासों की आज प्रासंगिकता है। इन्हीं में युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला है, जो विश्व मानवता के हित में है। भारत ने युद्ध विराम की कोशिशों के साथ मानवीय दृष्टिकोण भी दर्शाया है। भारत ने लगातार पीड़ित लोगों की सहायता के लिये राहत सामग्री एवं दवाइयां भिजवाई हैं। भारत की पहल की संयुक्त राष्ट्र महासभा में रुचिरा कंबोज ने प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय नेतृत्व का संदेश स्पष्ट और सुसंगत रहा है। हम आतंकवाद के सभी स्वरूपों का दृढ़ता से विरोध करते हैं। इस्राइल और हमास के बीच पिछले कई दिनों से युद्ध जारी है, कम्बोज ने भारत के मानवीय आधार पर युद्ध विराम के प्रयासों को सराहा। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के उन प्रयासों की भी सराहना की है जिनका उद्देश्य तनाव कम करना और फिलीस्तीन के लोगों को तत्काल मानवीय सहायता प्रदान करना है। कंबोज ने 70 टन आपदा राहत सामग्री पहुंचाने सहित फिलीस्तीन के लोगों को मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। इनमें दो किस्तों में 17 टन दवाएं और चिकित्सा आपूर्ति शामिल हैं।


युद्ध की स्थितियां लगातार विकराल होती जा रही हैं, इस संघर्ष में एक तरफ है इजरायल की सेना और दूसरी तरफ है आतंकी संगठन हमास, जो फिलीस्तीन को फिर से जिंदा करने के पक्ष में हैं। इजरायल ने हमास को नेस्तनाबूत करने की घोषणा की है, जबकि हमास ने दशकों पहले दुनिया के नक्शे से इजरायल का नामो-निशान मिटा देने की कसम खा रखी है। इस संघर्ष को लेकर दुनिया के देश भी अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं, विरोधाभासी सोच सामने आ रही है। सब इस बात को भलीभांति जानते हैं कि ऐसे युद्ध के विनाश से उपजे हालात सदियों तक मानवता को भोगने पड़ते हैं। युद्ध भौतिक हानि एवं विनाश के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने में भी बहुत बड़ा कारण है। इससे पर्यावरण इतना प्रदूषित हो जाता है कि सालों तक इंसानों को शुद्ध सांस और भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिक इस बात की घोषणा कई बार कर चुके हैं कि युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वाले कम और दुष्परिणामों का शिकार बनने वाले संसार के सभी प्राणी होते हैं।


युद्ध कितना भी लम्बा चले, उसका अंत समझौते से ही संभव है, यह अन्तिम शरण प्रारंभिक शरण बननी चाहिए। इसके लिये दुनिया की महाशक्तियों को सच्चे एवं शुद्ध मन से प्रयास करने चाहिए। गाजा पट्टी में मानवीय सहायता की अपील करने वाला अमेरिका, इजरायल को हथियार और गोला-बारूद मुहैया करवा रहा है। वहीं गोला-बारूद गाजा पट्टी के निहत्थे लोगों पर दागा जा रहा है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इजरायल पर अचानक हुए हमले में ईरान का हाथ हो सकता है। ईरान के नेता हमास के हमले को प्रोत्साहन और समर्थन के साथ युद्ध को आक्रामक बनाये रखने और इजरायल को ध्वस्त करने पर बल दे रहे हैं। हालातों को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि हालिया जंग के पीछे ईरान है और वो अपने मंसूबे में कामयाब होता दिख रहा है। निश्चित ही दोनों पक्षों के हजारों लोग पीड़ित होंगे, लेकिन जब धुआं शांत हो जाएगा, तो केवल एक ही देश के हित पूरे होंगे और वो देश है ईरान। इन हालातों में युद्ध को समाप्त करने की कोई भी पहल सार्थक साबित हो तो कैसे?


इजरायल-हमास की ही तरह रूस और यूक्रेन युद्ध भी 600 से अधिक दिन से चल रहा है। इस युद्ध में दस हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। इस युद्ध में एक तरफ रूस है तो दूसरी तरफ यूक्रेन है, जिसके पीछे अमेरिका खड़ा है। निःसंदेह हमास ने इजरायल पर जिस तरह की बर्बरता, क्रूरता एवं अमानवीयता की, उसकी जितनी निंदा की जाए उतनी ही कम है। सवाल यह है कि गाजा पट्टी पर इजरायली हमलों में निर्दोष लोग जिस तरह से मारे जा रहे हैं, क्या बदले की कार्रवाई की आड़ में वह भी हमास जैसी बर्बरता एवं अमानवीयता नहीं है? शरणार्थी शिविरों, स्कूलों और अस्पतालों पर बमबारी को तो किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। यह भी बर्बरता ही है, जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता। इजरायल पर हमले के लिए हमास दोषी है, तो उसे सबक सिखाया जा सकता है। लेकिन, जवाबी कार्रवाई के नाम पर निहत्थे लोगों को निशाना बनाने का तो कोई समर्थन कैसे कर सकता है? ऐसी स्थितियां तो युद्ध नीति के भी विरुद्ध हैं। हिंसा, उन्माद एवं आतंक की धरती पर शांति की पौध नहीं उगायी जा सकती। अशांत विश्व को शांति का सन्देश देने के लिये भारत को अधिक प्रयत्न करने होंगे। क्योंकि युद्ध के भयावह दुष्परिणामों से समस्त विश्व भयाक्रांत है, इसीलिये अब इजरायल-हमास और रूस तथा यूक्रेन में युद्ध-विराम की आवाज चारों ओर से उठ रही है। इन दोनों युद्धों के भयंकर कदमों के पीछे बहुत छोटे कारण, संकीर्णताएं एवं वैचारिक मतभेद रहे हैं। संसार में आज तक कोई भी अच्छा युद्ध एव बूरी शांति कभी नहीं हुई, जब शांति ही अच्छी और युद्ध ही बुरा है तो यह समझ व्यापक बननी ही चाहिए।


-ललित गर्ग

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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