By नीरज कुमार दुबे | Apr 15, 2026
अमेरिका, चीन और रूस के पास चूंकि अंतरिक्ष में भी शक्ति है इसलिए वह अपने आप को महाशक्तिशाली मानते हैं। लेकिन अब अंतरिक्ष में एक और शक्ति का उदय होने जा रहा है और धरती की तरह अब आकाश में भी शक्ति संतुलन बदलने वाला है। हम आपको बता दें कि भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में अपनी बादशाहत कायम करने की दिशा में तेजी से कदम आगे बढ़ाये हैं। इसी कड़ी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो ने वर्ष 2035 तक अपने स्वदेशी अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण का लक्ष्य तय किया है और इस महत्वाकांक्षी परियोजना में रूस के साथ सहयोग की इच्छा जताई है। देखा जाये तो भारत और रूस के बीच अंतरिक्ष सहयोग एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
बताया जा रहा है कि भारत रूस से कक्षीय मॉड्यूल, जीवन समर्थन प्रणाली, संचार और ट्रैकिंग जैसी उन्नत तकनीकों में सहयोग चाहता है। हम आपको यह भी याद दिला दें कि भारत और रूस के बीच अंतरिक्ष सहयोग का इतिहास भी बेहद मजबूत रहा है। वर्ष 1975 में भारत के पहले उपग्रह आर्यभट का प्रक्षेपण सोवियत संघ की सहायता से हुआ था। इसके अलावा राकेश शर्मा को अंतरिक्ष में भेजना, क्रायोजेनिक इंजन तकनीक उपलब्ध कराना और गगनयान मिशन के लिए प्रशिक्षण देना इस सहयोग की मिसालें हैं। यह संबंध दोनों देशों के बीच विशेष सामरिक साझेदारी का आधार रहा है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में इस परियोजना का महत्व और बढ़ जाता है। वर्तमान में कार्यरत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को वर्ष 2030 के आसपास सेवा मुक्त किए जाने की संभावना है, जबकि चीन का अपना अंतरिक्ष स्टेशन पहले से सक्रिय है। ऐसे में भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना उसे वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित करेगा और अंतरिक्ष में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा।
सामरिक दृष्टि से यह परियोजना भारत को अंतरिक्ष में स्थायी उपस्थिति प्रदान करेगी। इससे भारत न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान में अग्रणी बनेगा बल्कि अंतरिक्ष आधारित रक्षा और निगरानी क्षमताओं को भी मजबूत कर सकेगा। देखा जाये तो आधुनिक युद्ध और सुरक्षा तंत्र में अंतरिक्ष की भूमिका लगातार बढ़ रही है, ऐसे में यह स्टेशन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संपत्ति साबित होगा। सुरक्षा के नजरिये से भी भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंतरिक्ष आधारित संचार, नेविगेशन और निगरानी प्रणाली किसी भी देश की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी हैं। लगभग 80 उपग्रहों पर चल रहा कार्य आपदा प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा और संचार व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करेगा।
रणनीतिक रूप से यह परियोजना भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाएगी। गगनयान मिशन के अंतर्गत विकसित तकनीकों का उपयोग इस स्टेशन में किया जाएगा, जिससे देश में उच्च स्तरीय वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं का विकास होगा। साथ ही यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर भी खोलेगी। हम आपको यह भी बता दें कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की व्यापकता भी इस दिशा में उसकी गंभीरता को दर्शाती है। पृथ्वी अवलोकन मिशन, नेविगेशन प्रणाली, डेटा रिले उपग्रह प्रणाली और अन्य ग्रहों के मिशन इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है।
खासतौर पर आर्यभट की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अंतरिक्ष विज्ञान की ओर प्रेरित किया जा रहा है। यह प्रयास भविष्य के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन परियोजना केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं बल्कि भारत की सामरिक शक्ति, सुरक्षा क्षमता और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम है। रूस के साथ सहयोग इस मिशन को और अधिक प्रभावी बनाएगा और भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।