Vanakkam Poorvottar: भागते हैं घुसपैठिये, भगाने वाला चाहिए, Bangladeshi Infiltrators के बीच हड़कंप, देशभर में चल रही ताबड़तोड़ कार्रवाई

By नीरज कुमार दुबे | Jun 04, 2026

भारत के सामने आज सबसे बड़ा संकट सुनियोजित जनसंख्या घुसपैठ का है। बंगाल से लेकर असम, गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का जाल जिस तेजी से फैलाया गया, उसने राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब पहली बार देश के कई राज्यों में इस समस्या के खिलाफ जिस कठोर और समन्वित अभियान की शुरुआत हुई है, उसने साफ कर दिया है कि भारत अब घुसपैठियों और उनके संरक्षकों के प्रति नरमी दिखाने के मूड में नहीं है।

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हम आपको बता दें कि उत्तर 24 परगना के हकीमपुर चेक पोस्ट पर तो हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सैकड़ों बांग्लादेशी अपने देश वापसी के इंतजार में पंक्तिबद्ध दिखाई दे रहे हैं। प्रशासन उनके दस्तावेज, फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक पहचान की जांच कर रहा है। बादुरिया और स्वरूपनगर के होल्डिंग सेंटरों में सैकड़ों घुसपैठियों को रखा गया है। पूछताछ में यह भी सामने आया कि इनमें से कई लोग बंगाल की सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे थे और फर्जी पहचान पत्रों के सहारे वर्षों से भारतीय व्यवस्था में घुस चुके थे। यह केवल सीमा पार करने का मामला नहीं, बल्कि भारत की प्रशासनिक संरचना में सेंध लगाने की संगठित साजिश थी।

उधर, गुजरात में चल रहा “ऑपरेशन डेल्टा हंट” इस बात का उदाहरण बन गया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो घुसपैठ के नेटवर्क को जड़ से हिलाया जा सकता है। गुजरात पुलिस ने राज्यव्यापी अभियान चलाकर पांच सौ एक अवैध बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया और सात सौ बयासी से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। अहमदाबाद, सूरत, भरूच और कच्छ जैसे औद्योगिक इलाकों में एक साथ छापेमारी कर पुलिस ने फर्जी आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोहों का पर्दाफाश किया। जांच में सामने आया कि अधिकतर घुसपैठिये पहले बंगाल के रास्ते भारत में दाखिल हुए और फिर दलालों की मदद से गुजरात तक पहुंचे।

गुजरात पुलिस ने दूरसंचार आंकड़ों और साइबर विश्लेषण के आधार पर छह हजार से अधिक संदिग्ध मोबाइल संपर्कों की सूची तैयार की। यह दिखाता है कि घुसपैठ अब केवल सीमा पार करने तक सीमित नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज और मानव तस्करी का विशाल कारोबार बन चुका है। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि केवल घुसपैठिये ही नहीं, बल्कि उन्हें पनाह देने वाले, रोजगार देने वाले और फर्जी कागजात तैयार करने वाले लोग भी कठोर कार्रवाई से नहीं बचेंगे।

पूर्वोत्तर भारत में यह मुद्दा और भी संवेदनशील है। असम लंबे समय से अवैध घुसपैठ का सबसे बड़ा शिकार रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने खुलकर कहा कि बांग्लादेश सीमा से लगातार हो रही घुसपैठ के खिलाफ राज्य “पुश बैक” नीति अपना रहा है। असम सरकार का मानना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाये गये, तो सीमावर्ती जिलों का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। यही कारण है कि असम में घुसपैठियों की पहचान, हिरासत और वापसी के लिए विशेष अभियान लगातार चलाये जा रहे हैं।

अरुणाचल प्रदेश में भी अवैध प्रवासन को लेकर भारी चिंता उभर चुकी है। वहां छात्र संगठनों और स्थानीय समूहों ने साफ कहा है कि बाहरी घुसपैठ राज्य की सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय अधिकारों के लिए खतरा बन रही है। राज्य पहले से इनर लाइन परमिट व्यवस्था के अंतर्गत आता है, फिर भी स्थानीय समाज का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले संदिग्ध लोगों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। अरुणाचल सरकार ने जिला स्तर पर टास्क फोर्स बनाने और निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिये हैं।

झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में जनसंख्या बदलाव को लेकर गंभीर जांच चल रही है। प्रवर्तन निदेशालय ने ऐसे गिरोहों पर छापे मारे हैं जो सीमा पार से लोगों को लाकर फर्जी आधार कार्ड और स्थानीय पहचान पत्र तैयार करते थे। ओडिशा ने भी बारह राज्य स्तरीय और उन्नीस जिला स्तरीय निरोध केंद्र बनाकर साफ कर दिया है कि अब घुसपैठ के मामलों में ढिलाई नहीं बरती जायेगी।

इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दो टूक कहा है कि देश में अवैध घुसपैठ को लेकर शून्य सहनशीलता की नीति लागू है। सीमा निगरानी मजबूत की जा रही है और हजारों लोग दबाव बढ़ने के बाद स्वेच्छा से वापस लौट रहे हैं। देखा जाये तो यह अभियान केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की निर्णायक लड़ाई है।

बहरहाल, स्पष्ट है कि बंगाल और पूर्वोत्तर में दशकों से पनपी घुसपैठ की समस्या विस्फोटक रूप ले चुकी थी। लेकिन अब देश का माहौल बदल रहा है। गुजरात का ऑपरेशन, बंगाल की सख्ती, असम का अभियान और पूर्वोत्तर राज्यों की चेतावनी इस बात का संकेत हैं कि भारत अब अपनी सीमाओं, अपनी पहचान और अपनी सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शने वाला नहीं। घुसपैठियों के खिलाफ चल रहा यह राष्ट्रव्यापी अभियान केवल कानून व्यवस्था की कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का निर्णायक संघर्ष बन चुका है।

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