बच्चे ज़्यादा हों तो अच्छा (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Dec 18, 2024

विकास की अति के साथ ज़माना बिगड़ चुका है। अब तो हमारे पवित्र, महान देश में भी युवा शादी किए बिना, साथ रहना चाहते हैं। क्या कहते हैं, लिव इन कनेक्शन में, अरे नहीं, लिव इन रिलेशन में। पता नहीं चलता इंसानी संबंधों का रंग, रूप और चरित्र कब बदल जाए। मां बाप के आशीर्वाद सहित या बिना आशीर्वाद के शादी हो जाए तो बच्चे पैदा नहीं करना चाहते। अभिभावकों के भावनात्मक दबाव से पहला बच्चा पैदा हो जाए तो दूसरा नहीं चाहते जी।  


पिछले दिनों कहा गया, ज्यादा बच्चे पैदा करिए। एक परिवार में दो या तीन बच्चे तो होने चाहिएं। इस कहने का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है। इतिहास में यह कहा गया है कि हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है जो हमेशा जीवित रहना चाहिए। लेकिन इस बात का बच्चे पैदा करने वाली सलाह से दूर दूर का सम्बन्ध नहीं है। हमारे देश में खाने पीने की कोई परेशानी नहीं है। सभी जानते हैं कि अधिकांश आबादी को सरकार मुफ्त अनाज देती है। बढ़ी हुई आबादी को भी देगी जिससे दोनों पक्षों का फायदा होगा।

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‘पता नहीं कब तक’ खबर देने वाले चैनल बता रहे थे कि वैश्विक स्तर पर कुपोषित बच्चों में से एक तिहाई भारतीय बच्चे हैं। खाना इतना महंगा है कि ज़्यादातर लोग स्वस्थ आहार नहीं ले पाते । लेकिन इन सच या झूठ ख़बरों  से क्या फर्क पड़ता है। बच्चे ज़्यादा होंगे तो दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी की साख हमारी बनी रहेगी। हमारे यहां जितने भी धर्म, सम्प्रदाय, जातियां, मत डेरे हैं उनमें ज़बर्दस्त प्रतिस्पर्धा की भावना रहेगी जिससे आम लोगों और राजनीति को फायदा होगा। 

 

विश्वगुरुओं के देश में यदि पहला शिशु लड़की पैदा हो तो अभी भी ज़्यादा अच्छा नहीं माना जाता। भाग्य और दुर्भाग्य दोनों को पटाया जाता है कि दूसरा बच्चा लड़का ही हो। पढ़े लिखे और ज़्यादा पढ़े लिखे लोग भी हर तिकड़म भिड़ाते हैं कि किसी तरह एक लड़का पैदा हो जाए। लड़के की चमक, दमक, खनक, गमक और नमक  कमाल होती है जी। अगर दो बच्चियां पैदा हो जाएं तो संपन्न परिवारों में तीसरी कोशिश भी की जाती है। कई परिवारों में तो लड़कियों का पैदा होना बंद ही नहीं होता। लडकी, लड़के का विकल्प नहीं होती जी। गनीमत है सख्त क़ानून की वजह से, किसी भी जगह टेस्ट नहीं हो पाता, नहीं तो ... । गरीबी, बढ़ती आबादी, सामाजिक और आर्थिक असमानता, रोज़गार की कमी बचपन से ही परेशानी बनी रहती है। उचित स्वास्थ्य सेवाएं, समान शिक्षा की अनुपलब्धता का खासा रोल रहता है फिर भी बच्चे तो भगवान् का रूप होते हैं जी, जितने हों उतने अच्छे। बच्चे मन के सच्चे, सारी जग के आंख के तारे।  

    

कुछ गलत लोग, हमारे देश को, ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ जिसे हिंदी में ‘विश्व भूख सूचकांक’ कहते हैं, में हमारा बहुत असहनीय, एक सौ सत्ताईस देशों में एक सौ पांचवां स्थान बताते हैं जोकि मानवीय ईर्ष्या के कारण है। यह इतनी ज़्यादा गंभीर बात नहीं है जितना कि विकसित, बुद्धिमान, सांस्कृतिक समाज को ज्यादा से ज्यादा आबादी से समृद्ध करना। इसलिए हम सबको सब कुछ भूलकर जुट जाना चाहिए और खूब बच्चे पैदा करने चाहिए। हमारा रखवाला वही पुराना बांसुरीवाला है जो बांसुरी की मधुर धुनें छेड़ता रहेगा और हम अस्त, व्यस्त और मस्त रहेंगे।


- संतोष उत्सुक

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