आपातकाल के स्याह दिनों को याद करना जरूरी

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Jun 25, 2026

25 जून 1975 की रात 11 बजकर 45 मिनट पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी के अध्यादेश पर दस्तखत किए। इसी के साथ नागरिक अधिकार, स्वतंत्र विचरण, असहमति-विरोध के अधिकार, मुक्त लेखन आदि के दरवाजे बंद कर दिए गए। 26 जून की सुबह तानाशाही अमावस्या की काली अंधेरी रात की तरह छा चुकी थी। लगभग सभी प्रमुख नेता एवं लाखों कार्यकर्ता बिना कारण बताए जेल में डाल दिए गए। कई स्थानों पर पुलिस की ज्यादती देखने को मिली। उन दिनों लोकतंत्र की रक्षा करने लायक कोई संस्था नहीं बची। आपातकाल का विरोध करने वाले मीडिया का दमन किया गया। न्यायपालिका सत्ताधारी दल को नाखुश करने में संकोच करती दिखी। नौकरशाहों की चापलूसी के चलते प्रशासनिक संस्थाएं पंगु सी हो र्गई। उन दिनों स्थिति यह थी कि इंदिरा गांधी के करीबियों को छोड़कर अन्य सभी संदेह के घेरे में थे।

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कहा जाता है कि उस दौर में देश प्रधानमंत्री कार्यालय से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री आवास से चलता था, जहां संजय गांधी रहते थे। विपक्ष की आवाज को दबाने के बाद इंदिरा गांधी ने संसद के दोनों सदनों में प्रश्नकाल पर भी रोक लगा दी। आपको बता दें कि संसद के दोनों सदन यानी लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही के पहला घंटे में संसद सदस्य कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। इसे प्रश्नकाल बोलते हैं। लेकिन इंदिरा गांधी को उस दौर में प्रश्न पूछना भी बर्दाश्त नहीं था। इंदिरा गांधी के इस फैसले पर तब के लोकसभा अध्यक्ष जीएस ढिल्लों आंखें बंद किए रहे। इसके बाद इंदिरा गांधी ने संविधान में अपने हिसाब से संशोधन करने शुरू किए।

इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले के खिलाफ कई लोगों ने कोर्ट में अपील की। तो 22 जुलाई 1975 को इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन कर न्यायपालिका यानी कोर्ट से आपातकाल के फैसले पर सुनवाई का अधिकार ही छीन लिया। इसे 38वां संशोधन कहा जाता है। इसके बाद 39वां संविधान संशोधन कर कोर्ट से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया गया। यानी इंदिरा गांधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव में धांधली के मामले की सुनवाई कर ही नहीं सकता था।

इमरजेंसी में अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया गया था। सरकार अपने खिलाफ कोई भी आवाज नहीं सुनना चाहती थी। अब हम आपको बताते हैं कि किस तरह इमरजेंसी के रोड-रोलर से प्रेस की आजादी को कुचला गया। 25 जून 1975 की आधी रात को इमरजेंसी लगाई गई और अखबारों के दफ्तरों में उसी रात को पावर सप्लाई जानबूझकर काट दी गई ताकि ज्यादातर अखबार अगले दिन आपातकाल का समाचार ना छाप सकें। अखबारों के दफ्तरों को दो दिन बाद पावर सप्लाई की गई।

संजय गांधी ने इमरजेंसी के दो दिन बाद ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को हटाकर अपने करीबी विद्याचरण शुक्ल को मंत्री बना दिया और विद्याचरण शुक्ल के जरिए सरकार ने मीडिया पर मनमानी की। कड़ी सेंसरशिप की वजह से कई अखबारों का प्रकाशन बंद हो गया। पत्रकारों के लिए सरकार ने कोड ऑफ कंडक्ट बना दिया। अखबारों के बोर्ड में सरकारी अफसर बैठा दिए गए। जो हर खबर पर नजर रखते थे। देश की चार बड़ी न्यूज एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती का विलय करके सरकार ने एक समाचार एजेंसी बना दी थी। ताकि खबर का हर स्रोत पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में रहे। रायटर सहित कई विदेशी न्यूज एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं खत्म कर दी गईं। 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छीन ली गई। 29 विदेशी पत्रकारों को भारत में एंट्री देने से मना कर दिया गया।

ये भी बड़ी हैरानी की बात है कि आज हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के लिए इमरजेंसी वाली कहानी एक सुपरहिट स्क्रिप्ट नहीं है। यानी इमरजेंसी का अनुभव फिल्म इंडस्ट्री के लिए इतना कड़वा रहा कि तमाम फिल्मकार इस विषय को फिल्मों में उठाने से बचते रहे। अभिव्यक्ति की आजादी को जिस तरह इमरजेंसी के दौरान कुचला गया। वैसा आजाद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था। लेकिन तब भी फिल्मी दुनिया का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा था जो इंदिरा गांधी की अवहेलना नहीं करना चाहता था।

1975 में आपातकाल के इस काले अध्याय की नींव इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी ने मिलकर रखी थी। ये परिवारवाद का दौर था। तब भी मां-बेटे ही मिलकर सरकार चला रहे थे। और आज भी मां-बेटे मिलकर ही देश की सबसे पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस चला रहे हैं। यह कांग्रेस के शासन का इतिहास है, किन्तु बहुत से कांग्रेसी दिखावा करते हैं कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं या फिर वह लोगों की स्मृति से लोप हो गया है, किन्तु वे लोग जिनका लोकतंत्र में अटल विश्वास है, फिर से ऐसा नहीं होने देना चाहते। आतंक के दिनों को भूलना मुसीबतों को फिर से न्योता देने के समान है। इसलिए लोकतंत्र की खातिर आपातकाल की वर्षगांठ 25 जून पर इनके स्याह दिनों को याद करना जरूरी है। पीएम नरेंद्र मोदी नीत मौजूदा केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर 25 जून को ''संविधान हत्या दिवस'' घोषित कर दिया है। यह आपातकाल के दौरान शासन की ज्यादतियों की पुनः याद दिलाने और सबक लेने के लिए मनाया जाता है।

आपातकाल के दौरान समूचा देश जिस तरह सरकारी जुल्म-ज्यादती का शिकार बना, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। आपातकाल की वर्षगांठ पर हमें उन भयावह संवैधानिक संशोधनों पर भी नजर डालनी चाहिए जो कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान किए थे। इनमें प्रधानमंत्री को संविधान से ऊपर स्थापित करना, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की शक्तियों को कम करना और राष्ट्रपति को कार्यकारी आदेशों के माध्यम से संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान करना शामिल था। इन संशोधनों ने संविधान के मूलभूत सिद्धान्तों को ही ध्वस्त कर दिया था। कांग्रेस के रवैये में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया है, इसलिए अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

करीब 21 महीने तक चले आपातकाल की घटनाओं को लेकर भारत में वैसी वितृष्णा नहीं दिखाई देती, जैसी यूरोप में हिटलरशाही को लेकर दिखती है। समूचा यूरोप पिछले 79 वर्षो से हिटलर की तानाशाही के विरुद्ध विजय दिवस मनाता आ रहा है। वहां हिटलर, मुसोलिनी आदि की पराजय को नुक्कड़ नाटकों, नाजीवाद पर आधारित फिल्मों और अन्य आयोजनों के जरिये आम लोगों को उस काले-भयावह दौर से परिचित कराया जाता है। ऐसा ही भारत में किया जाना चाहिए, ताकि भावी पीढ़ी भारत के इस काले अध्याय से अवगत हो। हमें विरोध से घृणा करने वाली कांग्रेस द्वारा आपातकाल के दौरान मारे गए, सताए गए और जेल में ठूंस दिए गए लाखों लोगों का स्मरण करना चाहिए।

-डॉ. आशीष वशिष्ठ

लेखक-पत्रकार

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