Jan Gan Man: Dalai Lama की आवाज की ताकत 90 की उम्र में भी बरकरार, Grammy के मंच से Tibet का संदेश सुन कर China का तिलमिलाना स्वाभाविक है

By नीरज कुमार दुबे | Feb 03, 2026

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने नब्बे वर्ष की आयु में एक ऐसा सम्मान हासिल किया है जिसने धर्म, दर्शन और जन संस्कृति को एक साथ ला खड़ा किया है। लॉस एंजिलिस में हुए 68वें ग्रैमी समारोह में उन्हें सर्वश्रेष्ठ ध्वनि पुस्तक वाचन और कथा वाचन श्रेणी में सम्मान मिला। यह सम्मान उनकी ध्वनि पुस्तक मेडिटेशंस: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलिनेस दलाई लामा के लिए दिया गया, जिसमें उनकी अपनी आवाज में करुणा, शांति, सजगता और मानव एकता पर विचार दर्ज हैं।

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सम्मान मिलने के बाद दलाई लामा ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि वह इसे निजी उपलब्धि नहीं मानते, बल्कि साझा मानवीय जिम्मेदारी की पहचान मानते हैं। उनके अनुसार शांति, करुणा, पर्यावरण की रक्षा और मानवता की एकता को समझना, धरती पर बसे आठ अरब लोगों के कल्याण के लिए जरूरी है। उन्होंने आशा जताई कि यह सम्मान इन मूल्यों को दूर दूर तक पहुंचाएगा।

वहीं हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला के मैकलोडगंज स्थित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने इसे तिब्बती समाज के लिए गहरा सम्मान बताया। इस पहाड़ी नगर में खुशी का माहौल है, हालांकि दलाई लामा के कर्नाटक में होने के कारण औपचारिक उत्सव थोड़े समय बाद होंगे।

दूसरी ओर चीन इस सम्मान से तिलमिलाया हुआ है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि 14वें दलाई लामा केवल धर्मगुरु नहीं बल्कि निर्वासित राजनीतिक व्यक्ति हैं जो धर्म की आड़ में चीन विरोधी अलगाव गतिविधियों में लगे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस सम्मान का उपयोग चीन विरोधी राजनीतिक चाल के रूप में किया जा रहा है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब दलाई लामा को विश्व स्तर पर सम्मान मिला हो। उन्हें 1989 में शांति के लिए नोबेल सम्मान मिल चुका है। इसके अलावा भी उन्हें अनेक वैश्विक सम्मान और विश्वविद्यालयों से मानद उपाधियां मिली हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक असर भी है। एक ओर यह भारत में बसे तिब्बती समुदाय के मनोबल को मजबूत करता है, दूसरी ओर यह चीन को यह संदेश देता है कि दलाई लामा की वैश्विक नैतिक छवि अब भी प्रभावी है। सांस्कृतिक मंच पर मिली यह पहचान कूटनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

देखा जाये तो दलाई लामा के नाम से ही चीन को मिर्ची लगना कोई नई बात नहीं, पर इस बार चुभन कुछ अधिक है। कारण साफ है। यह सम्मान केवल कला का सम्मान नहीं, बल्कि विचार का सम्मान है। चीन की सत्ता संरचना दलाई लामा को एक ऐसे प्रतीक के रूप में देखती है जो तिब्बत की पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक स्मृति को जिंदा रखता है। बीजिंग को डर है कि जहां भी दलाई लामा का नाम आदर के साथ लिया जाएगा, वहां तिब्बत का सवाल फिर उठेगा।

ग्रैमी जैसे बड़े मंच पर मिला सम्मान दलाई लामा को नई पीढ़ी तक पहुंचाता है। आज का युवा शायद तिब्बत के इतिहास को न जानता हो, पर संगीत और ध्वनि पुस्तक के माध्यम से वह दलाई लामा की वाणी से जुड़ सकता है। यही बात चीन को बेचैन करती है। चीन चाहता है कि दलाई लामा का असर समय के साथ फीका पड़े, पर ऐसे सम्मान उस असर को नया जीवन देते हैं।

चीन का यह कहना कि यह राजनीतिक चाल है, अपने आप में उसकी घबराहट दिखाता है। यदि दलाई लामा की बातें केवल धर्म तक सीमित होतीं तो बीजिंग इतना तीखा रुख नहीं अपनाता। सच यह है कि करुणा, शांति और मानव एकता जैसे विचार किसी भी कठोर सत्ता के लिए चुनौती होते हैं, क्योंकि वे डर नहीं, संवाद की बात करते हैं।

भारत के लिए भी यह क्षण महत्वपूर्ण है। भारत ने दशकों से दलाई लामा और तिब्बती समुदाय को शरण दी है। ऐसे वैश्विक सम्मान भारत की उस परंपरा को रेखांकित करते हैं जिसमें विविध मतों को स्थान मिलता है। सामरिक दृष्टि से यह भारत की नैतिक स्थिति को मजबूत करता है, खासकर तब जब चीन सीमा और क्षेत्रीय दबाव की नीति अपनाता रहा है।

बहरहाल, आखिर में सवाल यह है कि क्या एक बुजुर्ग धर्मगुरु की करुणा भरी आवाज सचमुच किसी महाशक्ति को अस्थिर कर सकती है। यदि हां, तो यह उस आवाज की ताकत का प्रमाण है। दलाई लामा का संदेश सरल है पर गहरा है। शायद यही सरलता सत्ता को असहज करती है। दुनिया के लिए यह अवसर है कि वह शोर से ऊपर उठकर उस संदेश को सुने जो शांति और मानवता की बात करता है। चीन चाहे जितना विरोध करे, विचारों पर पहरा लगाना आसान नहीं होता।

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