सोशल मीडिया एजेंसियों को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाना जरूरी है: लोकसभा अध्यक्ष

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jan 09, 2020

ओटावा (कनाडा)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 25वें सम्मेलन (सीएसपीओसी) के दौरान 'संसदीय और अन्य संदर्भों में व्यक्तियों की सुरक्षा' विषय पर आयोजित कार्यशाला में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इंटरनेट और विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साधनों के आने से लोगों के संसद से जुड़ने के तौर-तरीकों में नए परिवर्तन आए हैं। उन्होने यह विचार व्यक्त किया कि इंटरनेट का विकास निसंदेह संसदों के लिए एक वरदान रहा है क्योंकि डिजिटल टेक्नोनलॉजी ने उन्हें अधिक जटिल कार्य करने तथा उन्हें निरंतर आधुनिक बनाने में समर्थ बनाया है जिनके फलस्वरूप सदस्य विधायी कार्य पर लगातार नज़र रखने में सफल हो पा रहे हैं। उन्होने कहा कि भारतीय संसद की सक्रिय वेबसाइट हैं जिन पर विधायी कार्यवाहियों, प्रश्नों और वाद-विवाद, विधेयकों, सदस्यों, संसदीय समिति के प्रतिवेदनों आदि के बारे में व्यापक जानकारी उपलब्ध है।  इसके अलावा, ई-संसद और ई-विधान के विकास से सदस्यों की कार्यकुशलता और बढ़ गई है और जन प्रतिनिधियों के रूप में उनके दायित्वों के निर्वहन का तौर-तरीका ही बदल गया है।

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बिरला ने इस बात पर बल दिया कि यह बहुत जरूरी है कि संबंधित देशों के कानूनों का पालन करने के लिए सोशल मीडिया एजेंसियों को अधिक जवाबदेह तथा उत्तरदायी बनाया जाए। बिरला ने कहा कि इस संबंध में भारत में हमारी अपनी सुसंगत साइबर सुरक्षा नीति है जो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के अनुरूप है। इस क्षेत्र में बढ़ती हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए देश नई इंक्रिप्शन प्रौद्योगिकियाँ और निजता संबंधी नीतियाँ तैयार कर रहा है। लोक सभा अध्यक्ष ने यह उल्लेख किया कि भारत में बालकों के यौन उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए विद्यमान कानूनों में कई परिवर्तन किए जा रहे हैं ताकि ऐसे कृत्यों के अपराधियों को कड़ा दंड मिल सके। इसके अलावा, चाइल्ड पोर्नोग्राफी को भी दंडनीय बनाया गया है। उन्होने अंतर्राष्ट्रीय  समुदाय से चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर वैश्विक प्रतिबंध लगाए जाने के लिए सहमति बनाने का भी आह्वान किया। लोक सभा अध्यक्ष, ओम बिरला और राज्य सभा के उप सभापति, हरिवंश ने 'लाइटनिंग ऑवर' में आयोजित चर्चा में भी भाग लिया जहाँ राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों ने संवादपरक सत्रों में विधानमंडलों की वित्तीय स्वायत्तता, संसदीय प्रक्रियाएं और पद्धतियां, आदि जैसे विभिन्न विषयों पर अपने विचारों का आदान-प्रदान किया।

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