देश में अनाज की बर्बादी को रोकना बेहद जरूरी

By राजेश कश्यप | Sep 20, 2016

भण्डार गृहों के अभाव और सरकारी मशीनरी की घोर लापरवाही से देश का बेशकीमती अनाज बर्बाद हो रहा है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान खुले आसमान के नीचे पड़े अनाज की बर्बादी के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। आजादी के सात दशक बाद भी देश में अनाज के पर्याप्त भण्डारों का निर्माण नहीं हो पाया है, भला इससे बढ़कर और विडम्बना क्या हो सकती है? एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्र ने आरटीआई से प्राप्त सूचना के माध्यम से चौंकाने वाला खुलासा किया है कि गत चार वित्तीय वर्षों के दौरान 20 हजार 776 मीट्रिक टन अनाज, जिसमें गेहूं व चावल शामिल हैं, बर्बाद हो गया। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के मुख्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के कारण वित्तीय वर्ष 2012-13 में 955 मीट्रिक टन, वर्ष 2013-14 में 2135 मीट्रिक टन, वर्ष 2014-15 में 15,526 मीट्रिक टन और वर्ष 2015-16 में 2,157 मीट्रिक टन गेहूं व चावल बर्बाद हो गए। बेहद अफसोस का विषय है कि अनाज की यह बर्बादी लंबे समय से बदस्तूर जारी है और यह रूकने का नाम ही नहीं ले रही है।

इसी तरह का एक चैंकाने वाला खुलासा देवाशीष भट्टाचार्य द्वारा सूचना के अधिकार के तहत एफसीआई से मांगी गई एक जानकारी के द्वारा हुआ। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), नई दिल्ली द्वारा मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 1997 से अक्तूबर, 2007 तक की दस वर्षीय अवधि के बीच एफसीआई के गोदामों में 10 लाख, 37 हजार 738 मीट्रिक टन अनाज सड़ा। इससे भी बड़ी अजीब बात यह रही कि इस दौरान अनाज के सुरक्षित भण्डारण के लिए 243 करोड़, 21 लाख 59 हजार, 726 रूपये भी खर्च किए गए। तब और भी कमाल हो गया जब यह तथ्य सामने आया कि इस दस वर्षीय अवधि में सड़े इस अनाज को ठिकाने लगाने के लिए 2 करोड़, 61 लाख, 40 हजार, 490 रूपये अलग से खर्च करने पड़े। गत यूपीए सरकार में केन्द्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री तारिक अनवर ने निफ्टम के तीन दिवसीय अंतराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन के अवसर पर यह स्वीकार किया था कि देश में विभिन्न कारणों के चलते हर साल 50 हजार करोड़ का खाद्यान्न नष्ट हो जाता है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि अनाज बर्बादी के यह सब आंकड़े तो वे हैं जो कि सरकारी खातों में दर्ज हैं। वास्तविक आंकड़े तो और भी भयंकर और चौंकाने वाले हो सकते हैं। अनाज बर्बादी को लेकर सरकारें बिल्कुल भी गंभीर नजर नहीं आती हैं। मेहनती किसान अपने खून-पसीने से अनाज का उत्पादन करते हैं। जब वे मण्डियों में अपनी फसल को ले जाते हैं तो उन्हें अपना अनाज रखने की जगह तक नहीं मिल पाती है। इसके चलते उन्हें खुले आसमान में ही सड़कों, गलियों और चैराहों पर अपना अनाज रखने को विवश होना पड़ता है। कहने को सरकार किसानों के सहायतार्थ कस्बाई व अस्थायी मण्डियों की व्यवस्था करती है। लेकिन, इन मण्डियों की बदहाली को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। जब किसान अपने खून-पसीने से सींचे हुए अनाज को मिट्टी में मिलता और खराब मौसम की मार से बर्बाद होता हुआ देखता है तो वह खून के घूंट पीकर रह जाता है। कर्ज उठाकर खेती करने वाले किसानों को मन मसोसकर अपनी फसल को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर होना पड़ता है। किसानों की इस दुःखद कहानी का कोई अंत दिखाई नहीं दे रहा है। जब किसानों को अपनी मेहनत का फल समुचित रूप में नहीं मिल पाता तो उस पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जाता है। ऐसे विकट हालातों में देश का पेट पालने वाले अन्नदाता को आत्महत्या के सिवाय और कोई मार्ग नहीं सूझता। निःसन्देह यह पूरे राष्ट्र के लिए सबसे बड़े शर्म का विषय है।

आखिर सरकार का अनाज की बर्बादी को रोकने के लिए इतना घोर उदासीन रवैया क्यों है? अनाज की बर्बादी के आंकड़ों से सरकार कोई सबक क्यों नहीं लेती है? बेहद दुःख और विडम्बना का विषय है कि सरकारें अनाज का समुचित भण्डारण नहीं कर पा रही हैं। एक तरफ देश में करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है और दूसरी तरफ लाखों टन अनाज सड़कों और सरकारी गोदामों में सड़ रहा है। एक तरफ देश में रिकार्ड़ खाद्यान्न उत्पादन हो रहा है और दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र के फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (एफ.ए.ओ.) अपनी रिपोर्ट में भारत को विश्व की केपिटल ऑफ हंगर (भूख की राजधानी) की संज्ञा तक दे चुका है।

अन्न की अनंत बर्बादी के मामले की गंभीरता को देखते हुए अगस्त, 2010 में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति दलबीर भण्डारी और दीपक वर्मा की बेंच ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की जनहित याचिका पर खाद्यान्न की बर्बादी पर केन्द्र सरकार को जबरदस्त फटकार लगाई थी और साथ ही आदेशात्मक सुझाव भी दिया था कि अनाज को सड़ाने की बजाय गरीबों को मुफ्त में ही बांट दो, जिसके लिए ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ (पीडीएस) को जरिया बनाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी पर तत्कालीन यूपीए सरकार ने शर्मसार होने की बजाय सीधा सपाट जवाब दे दिया था कि गरीबों को अनाज मुफ्त में नहीं बांटा जा सकता।

निःसन्देह, अब मोदी सरकार के समक्ष इस अन्न की बर्बादी को रोकने की बहुत बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी है। किसानों के हितों के लिए केन्द्र सरकार ने कई रचनात्मक प्रयास किए हैं। ऐसे में पूर्ण उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार का ध्यान अनाज की इस अनंत बर्बादी को रोकने की तरफ भी जरूर होगा और प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये अनाज की होने वाली बर्बादी पर अंकुश लगाने के लिए समुचित कदम उठाए जाएंगे। इन उम्मीदों को जगाने वाले आंकड़े भी आरटीआई के माध्यम से हासिल हुए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2015-16 में कम से कम बाढ़ की वजह से तो गेहूं व चावल खराब नहीं हुए हैं। आरटीआई के मुताबिक नए वित्तीय वर्ष के दौरान 1 जुलाई, 2016 तक महज 0.8 मीट्रिक टन चावल खराब हुआ है और गेहूं का कोई नुकसान नहीं हुआ है। अगर, इन आंकड़ों में सच्चाई है तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अनाज की बर्बादी के दंश से देश को जल्द ही छुटकारा मिल सकता है।

- राजेश कश्यप

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