Gyan Ganga: भगवान शंकर के श्रृंगार में मानों पूरी सृष्टि का योगदान था

By सुखी भारती | Feb 20, 2025

भगवान शंकर के सुंदर श्रृंगार में मानों संपूर्ण सृष्टि का ही योगदान हो रहा था। उनके पावन दिव्य तन पर भस्म का लेपन भी हो चुका था। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, कि भगवान शंकर के अब तक ऐसे भिन्न-भिन्न श्रृंगार हो चुके थे-

‘ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।

नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।

गरल कंठ उर नर सिर माला।

असिव बेष सिवधाम कृपाला।।’

अर्थात शिवजी के सुंदर मस्तक पर चनद्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं।

भगवान शंकर के मस्तक पर चन्द्रमा को सुशोभित कर दिया गया। किसी ने पूछा, कि हे भोलेनाथ! आपने उस चन्द्रमा को सीस पर स्थान क्यों दिया, जो कि मन की भाँति चँचल है। गौतम नारि अहल्या का जिसने शील भँग करने का कुप्रयास किया हो, क्या उसे सीस पर सजाना उचित है?

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भगवान शंकर प्रश्नकर्ता की यह जिज्ञासा सुन मुस्करा पड़े। तब उन्होंने बताया कि समुंद्र मंथन के पश्चात, अमृत कलश को लेकर, जब असुर और देवताओं में संघर्ष हो रहा था, तो राहु चन्द्रमा का वध करने के लिए उसके पीछे लगा था। निःसंदेह चन्द्रमा से पाप तो हुआ था, किंतु उसके पश्चात उसने गहन पश्चाताप भी किया था। चन्द्रमा को जब राहु से कहीं चैन न मिला, तो रक्षार्थ वह अन्ततः मेरी ही शरण में आया था। हे जिज्ञासु! सदैव याद रखना, कि नाला कीचड़ में कितना भी मलिन क्यों न हो, अगर वह गंगाजी में स्वयं को नयौछावर कर देता है, तो उसकी संपूर्ण मलिनता धुल जाती है। वह गंदा नाला साक्षात गंगा जी का ही रुप हो जाता है।

ठीक इसी प्रकार से अगर कोई पापवृति धारक, कैसे भी हमारी शरण में आता है, और अपने पापों से मुक्तिभाव रखते हुए, हमारी शरणागत होता है। तो हम उसे अत्यंत प्रेम भाव से अपनाते हैं। भले ही वह हमारे चरणों में ही क्यों न अर्पित हुआ हो, किंतु हम उसे उठाकर अपने सिर पर बिठा लेते हैं। कहने का तात्पर्य आप चन्द्रमा की भाँति शीतल भाव तो अपनाओ, औरों को रात्रि होने के पश्चात भी मार्ग दिखाने का पुनीत कार्य करके तो दिखायो, फिर देखिए, हम कैसे उसे अपने सिर पर बिठाते हैं।

प्रश्नकर्ता ने कहा, कि प्रभु चन्द्रमा को आपने भले ही सीस पर बिठा लिआ हो, किंतु उसे आप टेढ़ा तो न रखते, कम से कम उसे सीधा तो कर लेना चाहिए था।

भगवान शंकर ने प्रेम से कहा-हे जिज्ञासु! आपने संसार में यह विचार बड़े प्रबल भाव से श्रवण किया होगा, कि हमारे चरणों में किसी को आना हो, तो उसे मन, वचन एवं कर्म से बिल्कुल सीधा होना चाहिए। उसका तनिक सा भी टेढ़ापन, उसे हमारी शरण से च्युत कर सकता है। किंतु हमारे सीस पर सुशोभित टेढ़े चन्द्रमा के माध्यम से, हम संसार को बताना चाहते हैं, कि हमारा दरबार ऐसा है, कि यहाँ सीधे भी स्वीकार किये जाते हैं, और टेढ़े भी। आप कैसे हैं, यह सोच कर मन छोटा मत कीजिए। यह भी न सोचिए, कि आप प्रभु को स्वीकार होंगे अथवा नहीं? आप तो बस चले आईये। ऐसा तो बिल्कुल भी मत सोचिए, कि आपको पावन पवित्र होकर ही हमारे पास आना है। क्योंकि पावन होना आपके वश की बात नहीं। हम ही अपनी महती कृपा से आपको पवित्र करेंगे। मलिन वस्त्र धोबी के पास जाने से पूर्व, क्या यह सोचता है, कि वह तो मैला है। वह धोबी के पास भला क्योंकर जा पायेगा? क्या मैले वस्त्र को पहले सापफ़ होने की आवश्यक्ता होती हैं? क्या मैले वस्त्र का इतना सामर्थ है, कि वह स्वयं से ही साफ हो पाये? नहीं न? वह स्वयं कभी भी नहीं धुल सकता। धोबी ही उसे धोता है। वह तो केवल समर्पण करता है। उसे सिला पर पटका जाये, अथवा दोनों हाथों में पकड़ कर बलपूर्वक निचोड़ दिया जाये। वह कभी कुछ नहीं बोलता। धोबी उसे बार-बार पानी में डूबोता है। वह कभी नहीं कहता, कि मेरा दम घुट रहा है। धोबी उसे कड़क धूप में भी डाल देता है। इतने संघर्षों के बाद कहीं जाकर वह वस्त्र सवच्छ हो पाता है। तो बताईये इस पूरे घटनाक्रम में वस्त्र की क्या भूमिका रही? भूमिका तो पूरी की पूरी धोबी की होती है। वस्त्र तो केवल समर्पण होता है।

ठीक इसी प्रकार से जीव तो बेचारा मैले वस्त्र की ही भाँति है। वह चन्द्रमा की भाँति हमें समर्पित तो हो, फिर देखना हम कैसे उसे अपने मस्तक पर सजाते हैं।

क्रमशः

- सुखी भारती

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