लगता है कोरोना काल में गांवों को सिर्फ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है ?

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | May 11, 2021

हमारे टीवी चैनल और अंग्रेजी अखबार शहरों की दुर्दशा तो हमें काफी मुस्तैदी से बता रहे हैं लेकिन देश के एक-दो प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के हिंदी अखबार हमें गांवों की भयंकर हालत से भी परिचित करवा रहे हैं। मैं उन बहादुर संवाददाताओं को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने पत्रकारिता का धर्म सच्चे अर्थों में निभाया है। पहली कहानी है- ललितपुर जिले (उप्र) के 13 गांवों की। इन गांवों की आबादी 1 से 7 हजार तक की है। इन सभी गांवों में लोग थोक में बीमार पड़ रहे हैं। 500 आदमियों के गांव में 400 आदमी बीमार हो गए हैं।

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ऐसा लगता है कि इस कोरोना काल में हमारी सरकारों और राजनीतिक दलों को बेहोशी का दौरा पड़ गया है। जनता की लापरवाही इतनी ज्यादा है कि उप्र के पंचायत चुनावों में सैंकड़ों चुनावकर्मी कोरोना के शिकार हो गए लेकिन जनता ने कोई सबक नहीं सीखा। ऐसा ही मामला राजस्थान के सीकर जिले के खेवरा गांव में सामने आया। गुजरात से 21 अप्रैल को एक संक्रमित शव गांव लाया गया। उसे दफनाने के लिए 100 लोग पहुंचे। उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती। उनमें से 21 लोगों की मौत हो गई। ऐसी हालत उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कई अन्य गांवों में भी हो रही है लेकिन उसका ठीक से पता नहीं चल रहा है। देश के गांवों को सिर्फ सरकारों के भरोसे कोरोना से नहीं बचाया जा सकता। न ही उन्हें भगवान भरोसे छोड़ा जा सकता है। देश के सांस्कृतिक, राजनीतिक, समाजसेवी, धार्मिक और जातीय संगठन यदि इस वक्त पहल नहीं करेंगे तो कब करेंगे ? 

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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