Jadavpur University में Azadi के नारे लगाने वालों पर भड़के Suvendu Adhikari, बोले इस बीमारी की दवा और इलाज जानता हूं

By नीरज कुमार दुबे | Aug 29, 2026

पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक समय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था, लेकिन आज कैंपस से ज्ञान, शोध और अकादमिक विमर्श की बजाय ‘आजादी’ के नारे और विवादित राजनीतिक गतिविधियों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। यहां सवाल उस मानसिकता का है जो भारत में रहते हुए भारत से ही ‘आजादी’ की मांग करने तक पहुंच जाती है। देखा जाए तो ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे उद्घोष और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लिखे नारों ने एक बेहद असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विश्वविद्यालय के भीतर किस तरह की राजनीति और किस तरह की मानसिकता को जगह दी जा रही है? 

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देखा जाए तो जादवपुर की घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक स्वतंत्रता का केंद्र बनाए रखा जाए या ऐसी राजनीति का अखाड़ा बनने दिया जाए, जो धीरे-धीरे पूरे अकादमिक माहौल को विषाक्त कर देती है।

यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘आजादी’ शब्द अपने आप में समस्या नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन जब ‘आजादी’ का नारा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल उठाने वाले नारों के साथ जुड़ता है, तब उसे महज छात्र राजनीति या वैचारिक असहमति कहकर टाल देना भी उचित नहीं होगा। जादवपुर में उठे नारों के संदर्भ में यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर किससे और किस चीज से आजादी मांगी जा रही है?

शुभेंदु अधिकारी ने इसी सवाल को बेहद तीखे अंदाज में उठाया है। विश्वविद्यालय के बाहर करीब दस हजार लोगों की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम्’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षा परिसरों में इस तरह के नारे बंद होने चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जिस आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, भगत सिंह, मातंगिनी हाजरा और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया, उस आजादी को हासिल किए दशकों बीत चुके हैं।

शुभेंदु अधिकारी के इस कड़े रुख की तारीफ इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने उस असहज सवाल को उठाने का साहस किया है जिसे अक्सर राजनीतिक शुद्धता के नाम पर दबा दिया जाता है। विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्र-विरोधी हिंसक विचारधाराओं का सुरक्षित अड्डा नहीं बन सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की अखंडता को चुनौती देने के बीच एक स्पष्ट रेखा है। उस रेखा को जानबूझकर धुंधला करना लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि उनका दुरुपयोग है।

सबसे चिंता की बात यह है कि जादवपुर की घटना को अलग-थलग घटना मानकर छोड़ देना वास्तविक समस्या से आंखें मूंदना होगा। देश के कई विश्वविद्यालयों में पिछले वर्षों में ऐसे नारे और ऐसी राजनीति कैंपस के अकादमिक वातावरण पर भारी पड़ी है। जेएनयू हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या दूसरे परिसरों में उभरे अतिवादी छात्र राजनीतिक संघर्ष हों, जब विश्वविद्यालय में पढ़ाई से ज्यादा पहचान की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण, हिंसक टकराव और उकसाऊ नारों को महत्व मिलने लगता है तो अंततः सबसे बड़ा नुकसान छात्रों की शिक्षा और संस्थान की प्रतिष्ठा को होता है। जादवपुर को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने इसी संदर्भ में जेएनयू और उस्मानिया विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कैंपस को ‘सुधारने’ की बात कही है।

यहां एक और सवाल पूछा जाना चाहिए। जो लोग हर मुद्दे पर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं, क्या वे देश के संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को भी उसी गंभीरता से स्वीकार करते हैं? क्या उन्हें उन सैनिकों की चिंता है जो देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते हैं? क्या उन्हें उन नागरिकों की चिंता है जो आतंकवाद का शिकार होते हैं? और यदि उनकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है तो वह लड़ाई विश्वविद्यालय की कक्षाओं, शोध और लोकतांत्रिक बहस के जरिए क्यों नहीं लड़ी जाती?

बेशक, सरकार या मुख्यमंत्री को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वैध असहमति को दबाया न जाए। किसी छात्र को केवल विचार रखने के कारण देशद्रोही करार देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है। लेकिन यही सिद्धांत दूसरी तरफ भी लागू होना चाहिए कि विचारधारा के नाम पर देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाले नारों को भी ‘छात्र अधिकार’ का कवच नहीं मिल सकता।

देखा जाए तो जादवपुर का सवाल इसलिए सिर्फ एक विश्वविद्यालय का सवाल नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें देश के विश्वविद्यालय आगे बढ़ेंगे। क्या वे ज्ञान, शोध, तर्क और राष्ट्रनिर्माण के केंद्र बनेंगे या राजनीतिक कट्टरता के अखाड़े? शुभेंदु अधिकारी ने कम से कम इस बहस को सामने लाने का काम किया है। अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी साफ करे कि कैंपस में विचारों की आजादी होगी, लेकिन हिंसा, धमकी और देश की अखंडता के खिलाफ उकसावे के लिए कोई आजादी नहीं होगी।

बहरहाल, आखिर विश्वविद्यालय वह जगह है जहां आने वाली पीढ़ियां देश का भविष्य लिखती हैं। वहां अगर ‘आजादी’ का अर्थ भारत से आजादी तक पहुंचने लगे, तो सवाल नारे लगाने वालों से पूछा ही जाना चाहिए कि जिस देश ने आपको बोलने की आजादी दी, आखिर उसी देश से आपको किस आजादी की तलाश है?

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