भगवान जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व और इतिहास जानिए

By शुभा दुबे | Jul 12, 2021

आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को ओडिशा के पुरी नामक स्थान और गुजरात के द्वारका पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली जाती है। इस उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं का भक्ति भाव देखते ही बनता है क्योंकि जिस रथ पर भगवान सवारी करते हैं उसे घोड़े या अन्य जानवर नहीं बल्कि श्रद्धालुगण ही खींच रहे होते हैं। पुरी में श्री जगदीश भगवान को सपरिवार विशाल रथ पर आरुढ़ कराकर भ्रमण करवाया जाता है फिर वापस लौटने पर यथास्थान स्थापित किया जाता है। यह उत्सव अद्वितीय होता है। इस अवसर पर देश विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां एकत्र होते हैं।

दस दिवसीय यह रथयात्रा भारत में मनाए जाने वाले धार्मिक उत्सवों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार 'जगन्नाथ' की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। बलराम जी का रथ 'तलध्वज' के नाम से पहचाना जाता है। रथ के ध्वज को 'उनानी' कहते हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है वह 'वासुकी' कहलाता है। सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' कहलाता है। रथ ध्वज 'नदंबिक' कहलाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को 'स्वर्णचूडा' कहते हैं।

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रथयात्रा आरंभ होने से पहले पुराने राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को साफ करते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ रथयात्रा शुरू होती है। सर्वप्रथम बलभद्र का रथ तालध्वज प्रस्थान करता है। थोड़ी देर बाद सुभद्रा की यात्रा शुरू होती है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। लोग मानते हैं कि रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष मिलता है, अत: सभी श्रद्धालु कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। 'गुंडीचा मंदिर' वहीं पर स्थित है जहां विश्वकर्मा जी ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। यहां भगवान एक सप्ताह प्रवास करते हैं और इस दौरान यहीं पर उनकी पूजा की जाती है। आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है। शाम तक रथ जगन्नाथ मंदिर पहुंच जाते हैं लेकिन प्रतिमाओं को अगले दिन ही मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में फिर से स्थापित किया जाता है।

-शुभा दुबे

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