जगदीप धनखड़ ने जो टेंशन ममता बनर्जी को दी थी वही मोदी को भी देने चले थे

By नीरज कुमार दुबे | Jul 24, 2025

जगदीप धनखड़ का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और संवैधानिक दायित्वों के टकराव का एक दिलचस्प उदाहरण बन गया है। पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में और फिर उपराष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल राजनीतिक विवादों और विचारधारात्मक टकरावों से भरा रहा। 2019 में जब जगदीप धनखड़ को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, तब से ही उनका कार्यकाल ममता बनर्जी सरकार के साथ लगातार टकरावों से भरा रहा। वह विधानसभा की कार्यवाही से लेकर विश्वविद्यालयों के संचालन तक, हर मोर्चे पर राज्य सरकार पर सवाल उठाते रहे। उन्होंने ममता सरकार की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियाँ की थीं। यह सब राज्यपाल के संवैधानिक व्यवहार से भिन्न था। धनखड़ राज्यपाल रहते हुए बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार पर संवैधानिक उल्लंघन, प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते रहे। ममता बनर्जी ने इस पर पलटवार करते हुए उन्हें “बीजेपी का एजेंट” कहा और यह आरोप लगाया कि वह अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। मगर तब भाजपा और केंद्र सरकार ने हर बार धनखड़ का खुला बचाव किया और ममता बनर्जी की नाराज़गी को राजनीतिक दुर्भावना बताया था।

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इस सबके चलते वह भाजपा, जो कभी ममता बनर्जी द्वारा लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज करती थी, अब खुद वैसी ही स्थिति में आ गई थी। अब धनखड़ "अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रहे हैं", "संविधान का मनमाना अर्थ निकाल रहे हैं", जैसे पुराने आरोप नए संदर्भ में भाजपा की तरफ से सुनाई देने लगे थे। पार्टी के अंदरूनी हलकों से पहले भी इस तरह की खबरें आई थीं कि सरकार और उपराष्ट्रपति के बीच समन्वय नहीं बन पा रहा है। अंततः इस असहमति की परिणति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के रूप में हुई, जो यह दिखाता है कि संवैधानिक स्वतंत्रता तब तक ही सहनीय है, जब तक वह सत्ता के हितों के विरुद्ध न जाए।

देखा जाये तो जगदीप धनखड़ के दो कार्यकाल- एक बार राज्यपाल के रूप में ममता बनर्जी को असहज करना और फिर उपराष्ट्रपति के रूप में केंद्र सरकार को चुनौती देना, दिखाता है कि सत्ता कभी भी किसी संवैधानिक पदाधिकारी की ‘निष्पक्षता’ को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाती। यह मामला भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक मर्यादाओं, संस्थागत स्वायत्तता और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच के जटिल रिश्तों को भी उजागर करता है। जगदीप धनखड़ का राजनीतिक सफर इसका सबसे सटीक उदाहरण है।

दूसरी ओर विपक्ष का दोहरापन भी देखने लायक है। हम आपको याद दिला दें कि विपक्षी दलों ने 10 दिसंबर को राज्यसभा सचिवालय में प्रस्तुत किए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में जगदीप धनखड़ पर तमाम आरोप लगाये थे। यही नहीं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि धनखड़ उन्हें सदन में बोलने नहीं देते। वहीं जयराम रमेश ने कहा था कि धनखड़ एक निष्पक्ष अंपायर की तरह नहीं बल्कि सरकार के चीयरलीडर की तरह व्यवहार करते हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने तो संसद परिसर में ही जगदीप धनखड़ की मिमिक्री की थी और सारे विपक्षी सांसद वह सब देखकर ठहाके लगा रहे थे। यही नहीं, कल्याण बनर्जी की ओर से की जा रही मिमिक्री का राहुल गांधी वीडियो बना रहे थे। लेकिन हैरानी की बात है कि वही सब विपक्षी नेता आज धनखड़ के प्रति अपने रुख में अचानक बदलाव लाते हुए उन्हें किसान पुत्र बता रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके साथ अन्याय किया गया है। विपक्ष के नेताओं को समझना होगा कि जनता की याददाश्त कमजोर हो सकती है, लेकिन इतनी भी नहीं कि वो इतनी जल्दी भूल जाए कि विपक्षी दल धनखड़ के इस्तीफे से पहले तक उनके बारे में क्या-क्या कह रहे थे।

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