Jinping का राष्ट्रपति मुर्मू को सीक्रेट लेटर, फिर बना ट्रंप की हेकड़ी निकालने का प्लान, 5 बड़े खुलासे से US में मचा हड़कंप

By अभिनय आकाश | Aug 29, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों कूटनीति के उस विसात पर चालें चल रहे हैं। जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ चुकी है। मोदी पहले जापान पहुंच रहे हैं, जहां 15वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन को लेकर टोक्यो में बड़ी बैठक हो रही है। लेकिन असली हलचल तब मचेगी जब वो सीधे चीन पहुंचकर एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। 31 अगस्त को पीएम मोदी और शी जिनपिंग आमने सामने बैठेंगे। वहीं 1 सितंबर को पुतिन से भी उच्चस्तरीय बातचीत होगी। यानी एक ही मंच पर भारत, रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष एक साथ होंगे। ऐसा मौका सालों बाद आया है और यही तस्वीर ट्रंप के माथे पर पसीना लाने वाली है। दरअसल, रूस ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि हालात अनुकूल रहे तो त्रिपक्षीय बैठक यानी भारत-रूस और चीन का साझा मंच भी देखने को मिल सकता है। ये वही सीन होगा जिसका ख्वाब ट्रंप कभी नहीं देखना चाहते थे। अगर ये तीन ताकतें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर साथ खड़ी हो गई तो अमेरिका की टैरिफ डिप्लोमेसी का खेल वहीं ध्वस्त हो जाएगा। 

ट्रोइका से अमेरिका भी डरता है

यूएस टैरिफ के खिलाफ न सिर्फ चीन, रूस, बल्कि ब्राजील के राष्ट्रपति जिस तरह से सामने आए उसने ब्रिक्स के देशों के विरोध को आरआईसी मेकेनिजम के जरिए रखने की भी एक संभावना को सामने रखा है। हाल के वक्त मे भारत की ओर से आरआईसी मैकेनिजम को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता दिखी नही है। साथ ही शांति की कथित कोशिशों को लेकर अमेरिका की भूमिका के चलते फिलहाल रूस भी यूएस के खिलाफ पहले जैसा आक्रामक रुख दिखाने से परहेज करेगा। पूर्व रूसी पीएम प्रिमकोव ने सबसे पहले 1998 में इस फोरम के विचार को प्रस्तावित किया था, लेकिन ये साल 2001 में ही अस्तित्व में आया था। दूसरे बहुपक्षीय मंचों की ही तरह ये फोरम भी तीनों में से हर देश को अपनी विदेश नीति को ज्यादा अच्छे से समझाने का मौका देता है। हालांकि भारत और चीन के बीच विश्वास कायम करने को लेकर ये फोरम ज्यादा कामयाब नहीं रहा है।

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ग्लोबल साउथ का सूत्रधान भारत

अमेरिका ने अपनी क्रेडिब्लिटी को खो दिया है। अब उसपर कोई विश्वास करे तो कैसे करे। लेकिन हिंदुस्तान के ऊपर कोई सवाल नहीं उठा सकता। हिंदुस्तान किसी भी मुल्क के साथ कभी भी तलवार कि जोर पर अपना काम नहीं करते हैं। हम एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर के साथ मिलकर चीजों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हिंदुस्तान कितना भी ताकतवर था, दुनिया की 50 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियां हिंदुस्तान से होती थी, लेकिन फिर भी हमने कहीं जाकर कब्जा नहीं किया। म्युअल रिस्पेक्ट के साथ हिंदुस्तान डिप्लोमेसी करता है। लेकिन ये बात डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग में नहीं गई। भारत ने दुनिया में जिसके पास आवाज नहीं थी ग्लोबल साउथ उसे खड़ा किया। 

40 देशों का गठबंधन

भारत ने टैरिफ के बदले एक अलग किस्म का परस्पर 40 देशों का गठबंधन तैयार किया। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ लगाया। इस मुसीबत से निपटने के लिए रणनीति में बदलाव करते हुए ग्लोबल मार्केट में कपड़े के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। कुल 40 देशों में डेडिकेटेड आउटरीच प्रोग्राम चलाएगा। इन देशों में ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, पोलैंड, बेल्जियम, कनाडा, मेक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, तुर्किए, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। इस पहल से भारत गुणवत्तापूर्ण टिकाऊ और इनोवेशन बेस्ड क्लोथ प्रोडक्ट का सप्लाई चेन स्थापित करने की कोशिश करेगा।

ट्रंप का फोन नहीं उठा रहे मोदी

जर्मन अखबार ने दावा किया कि भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के चार फोन कॉल नहीं उठाए। सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप ने अपने निजी नंबर करीब आधा दर्जन विश्व नेताओं को दिए थे, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों के दबाव में ट्रंप को एक-दो बार अपने नंबर बदलने पड़े। हो सकता है कि अगर उन्होंने मोदी को नए निजी नंबर से कॉल किया, तो मोदी यह न पहचान पाए कि फोन किसका है। एक वजह ये भी हो सकती है। अब ट्रंप पर अक्सर झूठ गढ़ने के आरोप लगते हैं, जैसे भारत-पाक तनाव के दौरान उन्होंने लड़ाकू विमानों गिरने और युध्द रोकने के दावे किए, नई दिल्ली, जो नियम और प्रोटोकॉल को अहमियत देती है, उसे लगा कि ट्रंप अप्रत्याशित और गैर-गंभीर बयानबाजी करने वाले नेता हैं।

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