Mother Teresa Birth Anniversary: 'एक्नेस' से 'मदर' बनने का सफर, जब आत्मा की पुकार पर शुरू हुआ Mission of Charity

By अनन्या मिश्रा | Aug 26, 2026

नोबेल पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा का 26 अगस्त को जन्म हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया था। वह साल 1929 में भारत आई थीं। उन्होंने जीवन के 68 साल भारत में रहकर लोगों की सेवा का काम किया था। हालांकि जहां उनको पूरी दुनिया में सम्मान मिला, तो वहीं उनके आलोचकों की भी कमी नहीं थी। लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को मानव सेवा में लगाए रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

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मजबूत हुआ इरादा

18 साल की उम्र में जब मदर टेरेसा विटिना लेटनाइस की ब्लैक मेडोना की समाधि पर प्रार्थना कर रही थीं, उसी दौरान उनका इरादा अधिक मजबूत हुआ। भारत आने के इरादे के बाद उन्होंने साल 1928 में आयरलैंड के इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी जाने का फैसला किया। यहां की सदस्यों को सिस्टर्स ऑफ लोरेटो कहा जाता है। यहां पर वह अंग्रेजी सीखने और मिशनरी बनने आई थीं।

आयरलैंड आने के बाद वह कभी अपने परिवार से नहीं मिलीं। साल 1929 में वह भारत आ गईं और दार्जलिंग में रहते हुए शुरूआती प्रशिक्षण कार्य किया। यहां पर उन्होंने बंगाली सीखी। साल 1931 में मदर टेरेसा ने धार्मिक प्रतिज्ञा ली। उनके बचपन का नाम एक्नेस था, लेकिन उन्होंने भारत आने के बाद टेरेसा चुना। क्योंकि वह संत थेरेस ऑस्ट्रेलिया और टेरेसा ऑफ अविला को सम्मान देना चाहती थीं।

आत्मा की आवाज सुनी

कलकत्ता में वह एनटैले में लोरेट कॉन्वेंट स्कूल में करीब 20 सालों तक पढ़ाती रहीं। साल 1944 में वह स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बनीं। लेकिन वह कलकत्ता की गरीबी देख कर व्यथित हो जाती थीं। साल 1943 में बंगाल में आए अकाल और अगस्त 1946 में कौमी हिंसा से होने वाले हालातों को लेकर दुखी रहीं। इस दौरान जब वह दार्जलिंग जा रही थीं, तो आत्मा की आवाज ने उनको झझकोरा। इसके बाद उन्होंने गरीबों की सेवा करने का फैसला किया।

गरीबों के लिए संघर्ष

मदर टेरेसा के लिए गरीबों की सेवा करना आसान नहीं था। क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन वह दो साड़ियों में गरीबों के बीच पहुंच गईं। इसके अलावा वह झोपड़ी में रहते लगीं। लोगों का पेट भरने के लिए भीख मांगने से भी पीछे नहीं हटीं। वह खुद संघर्ष करती रहीं, लेकिन कॉन्वेंट वापस नहीं गईं।

कारवां बनता गया

लोग उनसे जुड़ते रहे और गरीबों में भी अतिगरीब लोगों की सेवा का अभियान शुरू हुआ। फिर सरकारी अधिकारी से लेकर चर्च तक का ध्यान मदर टेरेसा के ऊपर गया। उनको अपने कार्यों में मदद मिलने लगी। वहीं मदर टेरेसा को चर्च से मिशिनरीज ऑफ चैरिटी खोलने की परमिशन मिल गई। इसके बाद उन्होंने कोढ़ रोगियों के लिए सेवा केंद्र खोला, जिसको शांतिनगर नाम मिला।

सम्मान

साल 1960 में मदर टेरेसा का काम विदेशों तक पहुंचा। साल 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मृत्यु

वहीं 05 सितंबर 1997 को कोलकाता में मदर टेरेसा का निधन हो गया।

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