By नीरज कुमार दुबे | Aug 29, 2026
ओडिशा की राजनीति में जुएल ओराम का नाम कोई नया नहीं है। छह बार के सांसद, लंबे समय से भाजपा के आदिवासी चेहरे और केंद्र में जनजातीय कार्य मंत्री के तौर पर उनकी राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनके बयानों ने भाजपा के भीतर चल रही उस खींचतान को सतह पर ला दिया है, जिसे अब तक पर्दे के पीछे की राजनीति माना जा रहा था। दरअसल, जुएल ओराम ने सीधा आरोप लगाया है कि भाजपा के भीतर ही कुछ लोग पैसे खर्च कर उनकी छवि खराब करने की मुहिम चला रहे हैं, ताकि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाया जा सके और उनकी जगह किसी दूसरे नेता के लिए रास्ता बनाया जा सके।
और यहीं से कहानी का दूसरा सिरा जुड़ता है। यानि राउरकेला का सर्किट हाउस विवाद। हम आपको बता दें कि जुएल ओराम के प्रतिनिधि प्रकाश पासवान की गिरफ्तारी के बाद मामला राजनीतिक रूप से गरम हुआ। आरोप है कि पासवान ने सर्किट हाउस में उन सात लोगों के लिए कमरे बुक कराए थे, जिन्हें बाद में पुलिस ने हथियार और गोला-बारूद के साथ गिरफ्तार किया। पासवान ने आरोपों से इनकार किया है। ओराम ने पहले ही कहा था कि अगर उनके सहयोगी के खिलाफ आरोप साबित होते हैं तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की बात भी कही थी।
लेकिन अब घटनाक्रम ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। पासवान की गिरफ्तारी के ठीक बाद ओराम का यह कहना कि उन्हें हटाने के लिए भीतर से साजिश हो रही है, कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि क्या सर्किट हाउस विवाद को लेकर उठे सवालों का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है? क्या वाकई भाजपा के भीतर कोई धड़ा जुएल ओराम को कमजोर करना चाहता है? या फिर ओराम को लग रहा है कि उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने की तैयारी हो चुकी है? इन सवालों के जवाब फिलहाल उनके आरोपों के पीछे ही छिपे हैं, क्योंकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया है।
सबसे दिलचस्प बदलाव तो ओराम के राजनीतिक रुख में आया है। कुछ समय पहले उन्होंने घोषणा की थी कि वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। लेकिन अब उन्होंने पलटकर कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में वह 2029 का लोकसभा चुनाव जरूर लड़ेंगे। यानी जिस नेता ने चुनावी राजनीति से पीछे हटने का संकेत दिया था, वही नेता अब अपने राजनीतिक विरोधियों को चुनौती देते हुए मैदान में उतरने की बात कर रहा है। देखा जाये तो यह सिर्फ चुनाव लड़ने का ऐलान नहीं है; यह उस राजनीतिक लड़ाई को स्वीकार करने का संकेत भी है, जिसकी ओराम खुद चर्चा कर रहे हैं।
हम आपको यह भी बता दें कि ओराम की नाराजगी की तीव्रता उनके शब्दों से भी साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने खिलाफ अभियान चलाने वालों को चेतावनी देते हुए बेहद आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया और कहा कि वह ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ा जवाब देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ी तो वह मामला भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व तक ले जाएंगे। यानी मामला अब सिर्फ व्यक्तिगत शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है; ओराम इसे पार्टी के भीतर अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है कि ओराम बार-बार अपने लंबे राजनीतिक योगदान का हवाला दे रहे हैं। 1998 से लोकसभा चुनाव लड़ रहे ओराम ने 2009 को छोड़कर हर चुनाव में सुंदरगढ़ से जीत दर्ज की है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भी वह मंत्री रह चुके हैं और नरेंद्र मोदी सरकार में 2014 तथा 2024 में उन्हें फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। इसलिए उनका मौजूदा बयान किसी ऐसे नेता का बयान नहीं है, जिसकी राजनीतिक जमीन कमजोर हो चुकी हो।
यही वजह है कि जुएल ओराम का गुस्सा महज एक नेता की नाराजगी मानकर खारिज करना जल्दबाजी होगी। उनके बयान में भाजपा के भीतर चल रही सत्ता की उस स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा की झलक दिखाई देती है, जहां हर मजबूत पद अपने साथ कई दावेदार पैदा करता है। मंत्री पद जितना बड़ा होता है, उसे लेकर राजनीति भी उतनी ही तीखी होती है।
बहरहाल, ओराम ने किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन उन्होंने इतना जरूर बता दिया है कि लड़ाई अब बंद कमरों में नहीं रहने वाली। सर्किट हाउस विवाद, उनके सहयोगी की गिरफ्तारी, छवि खराब करने के आरोप और 2029 में फिर चुनाव लड़ने का ऐलान, इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो ओडिशा भाजपा के भीतर एक बड़ा राजनीतिक मुकाबला आकार लेता दिखाई देता है। और इस मुकाबले में जुएल ओराम ने साफ कर दिया है कि वह पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।