By अनुराग गुप्ता | Jan 17, 2022
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जाने माने नेता ज्योति बसु अपनी ही पार्टी की वजह से प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे। 23 साल तक पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री रहने के साथ-साथ ज्योति बसु की विचारधारा अलग होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व का विपक्ष के सभी नेता लोहा मानते थे। तभी तो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह चाहते थे कि ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाया जाए। इसके लिए उन्होंने कई बार हरकिशन सिंह सुरजीत को पुनर्विचार करने का आग्रह किया था। लेकिन पूर्वी बंगाल में जन्में ज्योति बसु का प्रधानमंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया।
लोकसभा चुनावों में जनता दल तीसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने की बात भी कह दी थी। यह वो दौर था जब जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव हुआ करते थे। ऐसे में हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ हुई बैठक में वीपी सिंह के नाम पर आम सहमति बन गई। इसके बाद संयुक्त मोर्चा के नेता वीपी सिंह के आवास पहुंचे और उनका सुझाव मांगा। हालांकि, वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि मैं डेढ़ साल पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, ऐसे में दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता। इसके बावजूद उनसे प्रधानमंत्री पद के लिए पुनर्विचार करने को कहा गया और उन्होंने फिर से इनकार कर दिया।
वीपी सिंह ने सुझाया ज्योति बसु का नाम
जब संयुक्त मोर्चा ने वीपी सिंह को ही प्रधानमंत्री पद के लिए नाम सुझाने को कहा तो उन्होंने ज्योति बसु का नाम सुझाया। ज्योति बसु के नाम पर भी सभी ने सहमति जता दी और फिर अगले दिन अखबारों में खबर छप गई कि ज्योति बसु अगले प्रधानमंत्री होंगे...
खबर भी छप गई, संयुक्त मोर्चा भी ज्योति बसु के नाम पर अपनी मुहर लगा चुका था और ज्योति बसु भी खुश थे इसके बावजूद वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। अब आप लोग सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हुआ कि वह प्रधानमंत्री पद तक पहुंचते-पहुंचते रह गए ? दरअसल, ज्योति बसु की पार्टी सीपीएम ने सेंट्रल कमिटी की बैठक बुलाई और वहां पर ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
इसके बाद फिर से हरकिशन सिंह सुरजीत ने संयुक्त मोर्चा की बैठक बुलाई और नए नामों के लिए काफी विचार-विमर्श किया और अंतत: ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा का नाम सुझाया। जिस पर आपसी सहमति बनी।
संयुक्त मोर्चा ने एचडी देवेगौड़ा को दल का नेता चुन लिया और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को इसकी जानकारी देने के लिए राष्ट्रपति भवन गए हालांकि, संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस के समर्थन वाली चिट्ठी अभी तक सौंपी नहीं थी। कांग्रेस द्वारा देर-दराज किए जाने के बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दे दिया और फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बन गई। हालांकि, यह सरकार महज 13 दिनों की ही थी।
- अनुराग गुप्ता