भाजपाई हुए कैलाश गहलोत, केजरीवाल के लिए बहुमत पाना होगा मुश्किल

By संतोष पाठक | Nov 19, 2024

रविवार को दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने वाले कैलाश गहलोत ने सोमवार को भाजपा का दामन थाम लिया। हालांकि गहलोत के आतिशी मंत्रिमंडल और आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने के साथ ही यह तय माना जा रहा था कि उनका अगला ठिकाना भाजपा ही होने जा रहा है।


इसी के साथ अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि कैलाश गहलोत कुछ महीनों बाद ही दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कितना फायदा पहुंचा सकते हैं। सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि क्या कैलाश गहलोत का कद वाकई इतना बड़ा है कि 'शीशमहल' सहित उनके द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों से अरविंद केजरीवाल की छवि को कुछ नुकसान पहुंच सकता है। 

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यह बात बिल्कुल सही है कि कैलाश गहलोत आज जो आरोप लगा रहे हैं,लगभग उसी तरह के आरोप भाजपा पिछले लंबे समय से लगा रही है। दूसरी बात यह है कि , यह सब जानते हैं और मानते भी हैं कि आज की तारीख में आम आदमी पार्टी वन मैन पार्टी बन कर रह गई है। आप का मतलब, आज की तारीख में सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही रह गया है। ऐसे में बाकी मुद्दे लगभग गौण हो जाते हैं। 


अरविंद केजरीवाल की दिल्ली में सबसे बड़ी ताकत वो लाभार्थी वर्ग है जो उन्होंने महिलाओं को फ्री डीटीसी बस सेवा और दिल्लीवासियों को फ्री बिजली और पानी देकर तैयार किया है। इसके साथ ही केजरीवाल ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले लोगों के साथ-साथ जाट और मुस्लिम समुदाय के सॉलिड वोट बैंक का इतना मजबूत किला बना रखा है कि जिसे ढहाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

यही वजह है कि भाजपा इस बार अरविंद केजरीवाल के मजबूत मोहरों के सहारे ही उन्हें विधानसभा चुनाव में मात देना चाहती है। कैलाश गहलोत का भाजपा में आना तो महज एक शुरुआत माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में केजरीवाल के कई कद्दावर नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं। ये सभी नेता आप सरकार की विफलताओं के साथ- साथ केजरीवाल की छवि पर भी चोट करेंगे।

कैलाश गहलोत को पार्टी में शामिल कराकर भाजपा ने दिल्ली के जाट समुदाय को बड़ा संदेश देने का प्रयास किया है। आने वाले दिनों में भाजपा , आप में और ज्यादा तोड़-फोड़ कर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले दिल्ली के मतदाताओं को भी लुभाने का प्रयास करेगी। 


अगर वाकई भाजपा, अपनी रणनीति में कामयाब हो जाती है तो निश्चित तौर पर इसका असर आम आदमी पार्टी पर पड़ेगा। आप के लिए इस बार बड़ी चुनौती सिर्फ भाजपा की तरफ से ही नहीं आ रही है बल्कि कांग्रेस खासकर राहुल गांधी भी इस बार दिल्ली में पार्टी को मजबूत देखना चाहते हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से प्रेरित होकर कांग्रेस की दिल्ली प्रदेश ईकाई प्रदेश में 'दिल्ली न्याय यात्रा' निकाल रही है। यह माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस मजबूती से दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ती है तो फिर मामला पूरी तरह से त्रिकोणीय हो जाएगा। 


'शीशमहल' को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों अरविंद केजरीवाल की छवि पर लगातार चोट कर रहे हैं। ऐसे माहौल में यह तय माना जा रहा है कि 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में 70 में से 62 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी के लिए इस बार बहुमत तक पहुंचना काफी मुश्किल होने जा रहा है। 


हम सबको दिल्ली में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों को जरूर ध्यान रखना चाहिए जब भाजपा को 32 (सहयोगी के साथ), आप को 28 और कांग्रेस को 8 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।


- संतोष पाठक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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