''तिरंगा लहरा कर आऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटा आऊँगा''

By डॉ. नीलम महेन्द्र | Jul 26, 2019

26 जुलाई 2019, 20वाँ कारगिल विजय दिवस वो विजय जिसका मूल्य वीरों के रक्त से चुकाया गया, वो दिवस जिसमें देश के हर नागरिक की आँखें विजय की खुशी से अधिक हमारे सैनिकों की शहादत के लिए सम्मान में नम होती हैं। 1999 के बाद से भारतीय इतिहास में जुलाई का महीना हम भारतीयों के लिए कभी भी केवल एक महीना नहीं रहा और इस महीने की 26 तारीख कभी अकेली नहीं आई। 26 जुलाई की तारीख़ अपने साथ हमेशा भावनाओं का सैलाब लेकर आती है।

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बेबसी का भाव उस अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मचलते हृदय के लिए कि क्यों आज तक हम अपनी सीमाओं और अपने सैनिकों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाए ? उस माँ के सामने असहाय होने का भाव जिसने अपने जवान बेटे को तिरंगे में देख कर भी आँसू रोक लिए क्योंकि उसे अपने बेटे पर अभिमान था कि वह अमर हो गया। उस पिता के लिए निशब्दता और निर्वात का भाव जो अपने भीतर के खालीपन को लगातार देशाभिमान और गर्व से भरने की कोशिश करता है। उस पत्नी से क्षमा का भाव जिसके घूँघट में छिपी आँसुओं से भीगी आँखों से आँख मिलाने की हिम्मत आज किसी भी वीर में नहीं।

26 जुलाई अपने साथ यादें लेकर आती है टाइगर हिल, तोलोलिंग, पिम्पल काम्पलेक्स जैसी पहाड़ियों की। कानों में गूँजते हैं कैप्टन सौरभ कालिया, विक्रम बत्रा, मनोज पाण्डे, संजय कुमार जैसे नाम जिनके बलिदान के आगे नतमस्तक है यह देश। 12 मई 1999 को एक बार फिर वो हुआ जिसकी अपेक्षा नहीं थी। दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में लड़ी गई थी वो जंग, 160 किमी के कारगिल क्षेत्र में एलओसी पर चला था वो युद्ध, 30000 भारतीय सैनिकों ने दुश्मन से लोहा लिया, 527 सैनिक व सैन्य अधिकारी शहीद हुए, 1363 से अधिक घायल हुए, 18000 फुट ऊँची पहाड़ी पर 76 दिनों तक चलने वाला यह युद्ध भले ही 26 जुलाई 1999 को भारत की विजय की घोषणा के साथ समाप्त हो गया लेकिन पूरा देश उन वीर सपूतों का ॠणी हो गया जिनमें से अधिकतर 30 वर्ष के भी नहीं थे।

"मैं या तो विजय के बाद भारत का तिरंगा लहरा के आऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटा आऊँगा", शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के यह शब्द इस देश के हर युवा के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। कारगिल का पाइन्ट 4875 अब विक्रम बत्रा टाप नाम से जाना जाता है जो कि उनकी वीरता की कहानी कहता है। और 76 दिन के संघर्ष के बाद जो तिरंगा कारगिल की सबसे ऊँची चोटी पर फहराया गया था वो ऐसे ही अनेक नामों की विजय गाथा है।

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हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे सैनिकों की है जिसे वे बखूबी निभाते भी हैं लेकिन हमारे सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है। हमारी सरकारें चाहे केंद्र की हो चाहे राज्य की, क्या वे अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं ? अगर हाँ तो हमारे सैनिक देश की सीमाओं के भीतर ही वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं ? क्या सरकार की जिम्मेदारी खेद व्यक्त कर देने और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने भर से समाप्त हो जाती है ? कब तक बेकसूर लोगों की बलि ली जाती रहेगी ? समय आ गया है कि कश्मीर में चल रहे इस छद्म युद्ध का पटाक्षेप हो। सालों से सुलगते कश्मीर को अब एक स्थायी हल के द्वारा शांति की तलाश है।

जिस दिन कश्मीर की वादियाँ फिर से केसर की खेती से लहलहाते हुए खेतों से खिलखिलाएँगी, जिस दिन कश्मीर के बच्चों के हाथों में पत्थर नहीं लैपटॉप होंगे और कश्मीर का युवा वहाँ के पर्यटन उद्योग की नींव मजबूत करने में अपना योगदान देकर स्वयं को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा उस दिन कारगिल शहीदों को हमारे देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

-डॉ. नीलम महेन्द्र

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