महात्मा गांधी के नाम पर राजनीति हुई तेज, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुकाबले ममता बनर्जी ने पेश किया संवैधानिक राष्ट्रवाद!

By नीरज कुमार दुबे | Dec 18, 2025

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बड़ा राजनीतिक और वैचारिक बयान देते हुए राज्य सरकार की रोजगार योजना ‘कर्मश्री’ का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात पर “शर्म” महसूस होती है कि राष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी के नाम को कल्याणकारी योजनाओं से हटाया जा रहा है। ममता बनर्जी का इशारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के नाम में किए गए कथित बदलावों की ओर था, जिसे लेकर विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर हमलावर है।

इसे भी पढ़ें: बंगाल विश्व का नेतृत्व करेगा, फर्जी खबरें राज्य को बदनाम नहीं कर सकतीं, ममता बनर्जी ने भरी हुंकार

उन्होंने केंद्र सरकार पर परोक्ष हमला करते हुए कहा कि अगर केंद्र महात्मा गांधी को सम्मान नहीं देगा तो बंगाल देगा। ममता ने कहा, “अगर आप महात्मा गांधी का सम्मान नहीं करेंगे, तो हम करेंगे।” अपने भाषण में ममता बनर्जी ने महात्मा गांधी के साथ-साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सरदार पटेल और लाल-बाल-पाल का भी उल्लेख किया। उन्होंने बंगाल की “समावेशी संस्कृति” की बात करते हुए कहा कि राज्य हर समुदाय और हर विचारधारा का सम्मान करता है। देखा जाये तो यह बयान ऐसे समय आया है जब MGNREGA के नाम और पहचान को लेकर देशभर में राजनीतिक बहस चल रही है और तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र सरकार की “इतिहास और प्रतीकों को बदलने की राजनीति” बता रही है।

इसके अलावा, ममता बनर्जी का यह फैसला सिर्फ एक योजना का नाम बदलने का एलान नहीं है, बल्कि यह आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की राजनीतिक पटकथा का पहला स्पष्ट अध्याय भी है। ममता बनर्जी जानती हैं कि बंगाल की राजनीति केवल विकास के आंकड़ों से नहीं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक मुद्दों से संचालित होती है। और गांधी से बड़ा प्रतीक भारतीय राजनीति में शायद ही कोई हो।

कर्मश्री योजना को महात्मा गांधी के नाम से जोड़कर ममता बनर्जी ने एक साथ कई निशाने साधे हैं। पहला, उन्होंने खुद को गांधीवादी मूल्यों की रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरा, केंद्र सरकार पर यह आरोप मजबूती से चस्पा किया है कि वह राष्ट्रपिता की विरासत को हाशिए पर डाल रही है। और तीसरा, ग्रामीण, गरीब और श्रमिक वर्ग के साथ एक भावनात्मक रिश्ता फिर से गढ़ने की कोशिश की है। यह वही वर्ग है जो कभी वाम मोर्चे की ताकत हुआ करता था और आज तृणमूल की राजनीति की रीढ़ है।

बहरहाल, आगामी चुनावों को देखते हुए ममता बनर्जी साफ तौर पर राजनीति को “संविधान बनाम सत्ता”, “गांधी बनाम विचारधारा” और “राज्य बनाम केंद्र” की धुरी पर ले जाना चाहती हैं। यह वही रणनीति है जिसने उन्हें पहले भी भाजपा के आक्रामक चुनावी अभियान के सामने खड़ा रखा। ममता जानती हैं कि बंगाल में सीधे हिंदुत्व की राजनीति को जवाब देना कठिन है, इसलिए वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्रवाद का विकल्प पेश कर रही हैं।

प्रमुख खबरें

दिल्ली की रफ्तार थमने के आसार! किराये में बढ़ोतरी की मांग को लेकर 21 से 23 मई तक ऑटो-टैक्सी की तीन दिवसीय हड़ताल

Ujjain Express Derail In Rishikesh | ऋषिकेश: योग नगरी स्टेशन के पास उज्जैन एक्सप्रेस के 3 डिब्बे पटरी से उतरे, टला बड़ा हादसा, जांच के आदेश

Bihar में Gautam Adani की बड़ी सौगात, 150 करोड़ से बनेगा Eye Hospital, हर साल 3.3 लाख ऑपरेशन

NEET Paper Leak की Inside Story: Sikar के एक Teacher ने WhatsApp PDF से खोला पूरा राज