By नीरज कुमार दुबे | Sep 18, 2026
कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता और नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। कलबुर्गी में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की नौ फीट ऊंची प्रतिमा का रातोंरात स्थापित होना और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के पहुंचने से पहले ही नगर निगम द्वारा उसे हटाया जाना इसी अंदरूनी उथल-पुथल का नया प्रतीक बन गया है।
इस बार मामला इसलिए ज्यादा राजनीतिक रंग ले गया क्योंकि प्रतिमा उसी रास्ते पर स्थापित की गई थी, जहां से मुख्यमंत्री शिवकुमार को कल्याण कर्नाटक उत्सव के कार्यक्रम के लिए गुजरना था। राहगीरों में भी भ्रम पैदा हुआ और कई लोगों को लगा कि प्रतिमा प्रशासन की अनुमति से लगाई गई है। प्रतिमा के साथ सिद्धरमैया के नाम पर चौराहे का संकेतक भी लगाए जाने की बात सामने आई। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी पर बहस को और तेज कर दिया है।
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इसी बीच, कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री के.एन. राजन्ना के बयान ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को और धार दे दी है। राजन्ना ने साफ कहा है कि कर्नाटक में केवल शिवकुमार के प्रभाव के आधार पर वोक्कालिगा मतों का आकलन नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मतदाता अब भी जनता दल सेक्युलर के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा की ओर देखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में अपने व्यक्ति के होने से कुछ अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त मत जुटाना अलग बात है।
राजन्ना ने सिद्धरमैया को कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि राज्य में समुदाय आधारित राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से सिद्धरमैया कांग्रेस के लिए, बी.एस. येदियुरप्पा भारतीय जनता पार्टी के लिए और देवगौड़ा जनता दल सेक्युलर के लिए मत जुटाने की क्षमता रखने वाले प्रमुख नेता हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सिद्धरमैया मजबूत हैं तो कांग्रेस मजबूत है और सिद्धरमैया कमजोर हैं तो कांग्रेस भी कमजोर होगी।
देखा जाये तो राजन्ना के ये बयान ऐसे समय आए हैं जब शिवकुमार खेमे से जुड़े नेताओं और सिद्धरमैया समर्थक नेताओं के बीच मतभेदों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। हाल में राजन्ना ने भी संगठनात्मक नियुक्तियों और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए थे। इसके अलावा राज्य कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद और मुख्यमंत्री शिवकुमार के बीच भी सत्ता तथा संगठन को लेकर सार्वजनिक मतभेद सामने आ चुके हैं।
बहरहाल, कलबुर्गी की प्रतिमा भले ही कुछ घंटों में हटा दी गई हो, लेकिन उसने कर्नाटक कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का वह चेहरा फिर सामने ला दिया है जिसे पार्टी नेतृत्व लगातार नियंत्रित रखने की कोशिश करता दिखाई देता है। प्रतिमा हट गई, लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व, प्रभाव और सत्ता का असली संतुलन आखिर किसके हाथ में है? फिलहाल इतना साफ है कि कांग्रेस के भीतर मचा घमासान शांत नहीं हुआ है।